जानिए उम्र के किस पड़ाव में आप होते हैं सबसे अधिक खुश, कौन देता है सबसे ज्यादा दुख?

ताजा विश्लेषण से पता चला है कि जीवन में संतुष्टि और खुशी एक यू-शेप की तरह आती है. यानी उम्र बढ़ने के साथ जीवन से खुशी कम होने लगती है, और प्रौढ़ावस्था से इसमें एक बार फिर इजाफा होने लगता है. 

जानिए उम्र के किस पड़ाव में आप होते हैं सबसे अधिक खुश, कौन देता है सबसे ज्यादा दुख?
प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली: जीवन में खुशी और संतुष्टि कौन नहीं चाहता है, लेकिन हम जो चाहते हैं, क्या वो हमें मिलता है? अजीब बात ये है कि जीवन के जिस दौर में हम सबसे ज्यादा हासिल करते हैं, खुशी और संतुष्टि के लिए सबसे ज्यादा प्रयास करते हैं, उसी दौरान हम सबसे कम खुश रहते हैं. नेशलन ब्यूरो ऑफ इकनॉमिक रिसर्च के एक सर्वे के अनुसार जीवन में खुशी यू-शेप की तरह आती है. यानी हम बचपन से लेकर टीनएज तक सबसे खुश रहे हैं और 16 साल की उम्र से जीवन में खुशी लगातार कम होने लगती है. ढलान का ये सिलसिला करीब 50 साल तक चलता है और उसके बाद एक बार फिर जीवन में खुशी की वापसी होती है.

इस सर्वे के लिए 51 देशों के करीब 13 लाख लोगों की रायशुमारी की गई. सर्वे में शामिल ज्यादातर लोग अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के थे. इसके लिए सात अलग अलग सर्वे किए गए और सभी में कमोबेश एक जैसे नतीजे आए. कुछ सर्वे में पूछा गया था कि क्या वो संतुष्ट हैं जबकि सर्वे में पूछा गया कि क्या वो खुश हैं या दुखी. लगभग सभी सर्वे में यू-शेप वाला रुझान देखा गया. यानी नौजवानी और पौढ़ावस्था में हम अधिक खुश और संतुष्ट रहते हैं जबकि बीच की उम्र में जीवन में परेशानी अधिक रहती है. नतीजों में पाया गया कि 50 की उम्र से जीवन में सुधार आता है और फिर खुशी का सिलसिला चढ़ने लगता है. 

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सर्वे में पाया गया कि टीन-एज के बाद खुशी में कमी आने के दो सबसे बड़े कारण हैं - तलाक और नौकरी छूट जाना. इसके अलावा आमदनी और सेहत का भी खुशी तथा संतुष्टि पर असर पड़ता है. शोध के अनुसार 'इस बात के काफी प्रमाण है कि मनुष्य अधेड़ उम्र में मानसिक रूप से कमजोर होता है. इसके सही सही कारण अभी तक साफ नहीं हैं. लेकिन इसका एक कारण ये हो सकता है कि धनी देशों में उम्र का ये दौर तनाव से भरा होता है.' शोधकर्ताओं के अनुसार लोग 40 और 50 साल के बीच अपने कैरियर के चरम पर होते हैं. उन पर जिम्मेदारी भी सबसे ज्यादा होती है और तनाव भी. इस समय बच्चे भी सेटल नहीं होते हैं. इस बात का तनाव भी रहता है.

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हालांकि इस रिपोर्ट की कुछ लोगों ने आलोचना भी की है. उनका कहना है कि ये नतीजे धनी देशों के लिए सही हो सकते हैं, लेकिन कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के लिए ये सही नहीं है. वहां सुख दुख का स्तर लगभग एक जैसा बना रहता है, क्योंकि वहां जीवन का संघर्ष जन्म से मृत्यु तक चलता रहा है. इस पर शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके नतीजे सभी उम्र, आयस्तर और देश के लोगों के लिए हैं. ऐसे में अगर इन नतीजों को सच माना जाए और आप 20 से 50 साल के आयु वर्ग में आते हों, तो अपनी परेशानियों को सहज मानकर आगे बढ़िए और ये विश्वास रखिए कि अच्छे दिन आने वाले हैं.