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समान नागरिकता संहिता के लिए अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कहा, "देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए अभी तक कोई प्रयास नहीं किया गया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में कई बार कह चुका है."  

समान नागरिकता संहिता के लिए अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया: सुप्रीम कोर्ट
समान नागरिकता संहिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ी टिप्पणी की.

नई दिल्ली: समान नागरिकता संहिता (Uniform Civil Code) को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने शुक्रवार को बड़ी टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि समान नागरिकता संहिता अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने एक संपत्ति विवाद मामले में शुक्रवार को दिए एक फैसले में ये टिप्पणियां की. 

कोर्ट ने कहा, "देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए अभी तक कोई प्रयास नहीं किया गया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में कई बार कह चुका है."  कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गोवा भारतीय राज्य का एक चमचमाता उदाहरण है जिसमें समान नागरिक संहिता लागू है जिसमें सभी धर्मों की परवाह किए बिना ये लागू है वो भी कुछ सीमित अधिकारों को छोड़कर."

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कोर्ट ने कहा, "गोवा राज्य में लागू पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 है जो उत्तराधिकार और विरासत के अधिकारों को भी संचालित करती है. जबकि भारत में कहीं भी गोवा के बाहर इस तरह का कानून लागू नहीं है."

समान नागरिक संहिता लागू होने पर देश में सबके लिये एक क़ानून होगा, चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों ना हो. समान नागरिक संहिता एक सेक्युलर यानी पंथनिरपेक्ष कानून है...जो किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है. अनुच्छेद-44 के तहत संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करना राज्यों की ज़िम्मेदारी बताया गया है, लेकिन ये आज तक गोवा को छोड़कर देश में कहीं लागू नहीं हो पाया है. 

एक क़ानून होने से देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा. इससे वोट बैंक वाली सियासत कमज़ोर हो जाएगी. विधि आयोग ने 7 अक्टूबर 2016 को समान नागरिक संहिता पर लोगों से राय मांगी थी. इसमें 16 सवाल दिए गए थे. इसके बाद आयोग ने कहा कि अगर मौजूदा पर्सनल लॉ में सुधार कर दिया जाए और धार्मिक परंपराओं और मूल अधिकारों के बीच तालमेल बेहतर किया जाए तो समान नागरिक संहिता की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. एक तरफ भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस चल रही है, जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और मिस्त्र जैसे कई देश इस क़ानून को अपने यहां लागू कर चुके हैं.