अब SC के संविधान पीठ के हवाले हुआ 'जल्लीकट्टू मामला', इन सवालों पर होगा विचार

जल्लीकट्टू तमिलनाडु का 400 साल से भी ज्यादा पुराना पारंपरिक खेल है. यह खेल फसलों की कटाई के अवसर पर पोंगल के समय आयोजित किया जाता है.

अब SC के संविधान पीठ के हवाले हुआ 'जल्लीकट्टू मामला', इन सवालों पर होगा विचार
जल्लीकट्टू खेल फसलों की कटाई के अवसर पर पोंगल के समय आयोजित किया जाता है

नई दिल्ली (सुमित कुमार): सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अब तमिलनाडु के पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू, महाराष्ट्र के बैलगाड़ी दौड़ और कर्नाटक के कंबाला मामले की सुनवाई करेगी. जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस नवीन सिन्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने फैसले में जल्लीकट्टू, बैलगाड़ी दौड़ और कंबाला की संवैधानिक वैधता की जांच के लिए इसे पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया है. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अब जल्लीकट्टू को लेकर पांच सवालों पर विचार करेगी, जिनमें क्या राज्य लोगों के सांस्कृतिक अधिकार का हवाला दे सकता है? क्या संसद के बनाए पशु क्रूरता निरोधी कानून में बदलाव का विधानसभा को अधिकार है? क्या ये बदलाव केंद्रीय कानून का उल्लंघन करता है? जैसे पांच सवालों के जवाब तलाशेगी. दरअसल, पेटा और अन्य संस्थाओं ने जल्लीकट्टू को अनुमति देने के तमिलनाडु सरकार के नए कानून को लेकर अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

क्या है जल्लीकट्टू और उससे जुड़ा अध्यादेश
जल्लीकट्टू तमिलनाडु का 400 साल से भी ज्यादा पुराना पारंपरिक खेल है. यह खेल फसलों की कटाई के अवसर पर पोंगल के समय आयोजित किया जाता है. इसमें 300-500 किलो के सांड की सींग पर नोट फंसाकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है. इसके बाद कुछ लोग अपना बचाव करते हैं और कुछ लोग सांड की सींग पकड़कर उन्हें काबू में करते हैं. सांड को तेज दौड़ाने के लिए उनकी पूंछ मरोड़ी जाती है और शराब पिलाने से लेकर आंख में मिर्ची तक डाली जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने जानवरों के साथ हिंसक बर्ताव को देखते हुए साल 2014 में इस खेल को बैन कर दिया था. केंद्र सरकार ने 20 जनवरी 2017 को जल्लीकट्टू पर तमिलनाडु सरकार के अध्यादेश को हरी झंडी दे दी थी इस तरह तमिलनाडु में जल्लीकट्टू मनाए जाने का रास्ता साफ हो गया था. आपको याद दिला दें कि जल्लीकट्टू मनाए जाने पर उठे विवाद के बाद पिछले साल तमिलनाडु में प्रदर्शन का दौर को देखते हुए ये फैसला लिया गया था.

क्या है महाराष्ट्र का बैलगाड़ी दौड़ और विधेयक
महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के लोकप्रिय खेल बैलगाड़ी दौड़ को फिर से शुरू कराने का रास्ता साफ किया गया था. महाराष्ट्र विधानसभा ने राज्य में बैलगाड़ी दौड़ फिर से शुरू करने के लिए साल 2017 के अप्रैल में एक विधेयक पारित किया था. इससे पहले तमिलनाडु ने अपने सालाना आयोजन जल्लीकट्टू के नियमन के लिए एक कानून लागू किया था. पशुओं पर क्रूरता की रोकथाम (महाराष्ट्र संशोधन) विधेयक ग्रामीण महाराष्ट्र में लोकप्रिय खेल बैलगाड़ी दौड़ का नियमन करेगा. इस खेल पर वर्ष 2014 में इस आधार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था कि इससे बैलों को पीड़ा और तकलीफ होती है.

क्या है कर्नाटक का कंबाला और विधेयक
कर्नाटक विधानसभा ने 'भैंसों की दौड़' के पारंपरिक खेल कंबाला के आयोजन को मंजूरी देने के लिए साल 2017 के फरवरी में विधेयक पारित किया गया था. इसका आयोजन मुख्य रूप से कर्नाटक के तटीय जिलों में किया जाता है. कंबाला पर विधेयक तमिलनाडु में अध्यादेश के जरिए जल्लीकट्टू के आयोजन को मंजूरी दिए जाने के बाद आया था. कंबाला का आयोजन दो समानांतर रेसिंग ट्रैक्स पर होता है. ट्रैक में पानी फैलाकर कीचड़ कर दिया जाता है. ये ट्रैक 120 से 160 मीटर लंबे होते हैं और 8 से 12 मीटर तक चौड़े होते हैं. दो भैंसों को बांधा जाता है और उन्हें प्लेयर्स द्वारा हांका जाता है. भैंसे को लेकर पहले फिनिश लाइन तक पहुंचने वाला विजेता होता है. भैंसों को दौड़ाने के लिए रेसर उन्हें डंडे से पीटते भी हैं और कोशिश की जाती है कि भैंसे 12 सेकंड के भीतर 100 मीटर की दूरी तय कर लें. यह आयोजन कई दिनों तक चलते हैं और क्षेत्रीय स्तर पर ग्रैंड फिनाले का आयोजन होता है. इस फेस्टिवल की शुरुआत उद्घाटन समारोह के साथ होती है, जिसमें किसान अपने भैंसों के साथ जुटते हैं.