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कॉलेजियम की सिफारिशों को सरकार ने पहले कभी नामंजूर नहीं किया : जस्टिस के. जोसेफ

जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिशों पर अपनी असहमति प्रकट की हो. 

कॉलेजियम की सिफारिशों को सरकार ने पहले कभी नामंजूर नहीं किया : जस्टिस के. जोसेफ
उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस केएम जोसेफ की पद्दोन्नति पर अभी कॉलेजियम की बैठकें चल रही हैं
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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को सरकार द्वारा वापस करने का मुद्दा लगातार तूल पकड़ता जा रहा है. इस बार खुद सुप्रीम कोर्ट के जज के. जोसेफ ने कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम की सिफारिश को वापस किया हो. उत्तराखंड हाई कोर्ट के जज केएम जोसेफ की सुप्रीम कोर्ट में पद्दोन्नति की सिफारिश को सरकार द्वारा लौटाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज के. जोसेफ ने यह प्रतिक्रिया दी है.

उन्होंने कहा कि इस मामले में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि अभी कॉलेजियम की बैठकें चल रही हैं. पत्रकारों से बात करते हुए जस्टिस के. जोसेफ ने कहा कि न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिशों पर अपनी असहमति प्रकट की हो. शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ने कहा, ‘ऐसा कोई पूर्व उदाहरण नहीं है जब कॉलेजियम की सिफारिश वाले नामों को (केंद्र द्वारा) वापस भेजा गया हो. इसलिए इस मामले पर और अधिक चर्चा किए जाने की आवश्यकता है.’ 

बता दें कि 10 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम में उत्तराखंड हाई कोर्ट के जज केएम जोसेफ और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाए जाने की सिफारिश सरकार से की थी. केंद्र सरकार ने इंदु मल्होत्रा को नाम को तो मंजूरी दे दी, लेकिन केएम जोसेफ की सिफारिश को फिर से विचार करने की बात कहते हुए लौटा दिया था.

बैठक में नहीं हो सका फैसला
जस्टिस केएम जोसेफ के नाम पर फिर से विचार के लिए बीते बुधवार को कॉलेजियम की बैठक तो हुई, लेकिन बैठक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी. करीब 50 मिनट चली बैठक में सरकार द्वारा पेश की गई चिट्ठी पर ही चर्चा होती रही. सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में कॉलेजियम में जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और के. जोसेफ सदस्य हैं. 

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जम कर हो रही है राजनीति
सरकार ने जब से जस्टिस केएम जोसेफ की फाइल लौटाई है, मामले पर राजनीति होने लगी है. कांग्रेस ने केंद्र सरकार के इस फैसले को राजनीति से प्रेरित बताया. कांग्रेस ने कहा कि केंद्र सरकार ने जस्टिस जोसेफ को उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन की सिफारिशों को नामंजूर करने की सजा दी है. उधर, सरकार ने कहा कि उनके इस कदम पर उत्तराखंड के फैसले से कोई संबंध नहीं है. सरकार ने तर्क दिया कि वरिष्ठता के क्रम में जस्टिस जोसेफ अभी फिट नहीं हैं और इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में केरल का प्रतिनिधित्व है.

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केंद्र और न्यायपालिका में टकराव
केंद्र सरकार के इस कदम के बाद न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच भी तकरार पैदा हो गया है. 5 मई, शुक्रवार को कॉलेजियम की सिफारिशें लंबित रखने के लिए केंद्र सरकार पर हमला बोला. जस्टिस मदन बी लोकूर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से कहा, 'हमें बतायें, कितने नाम (कोलेजियम द्वारा की गयी सिफारिशें) आपके पास लंबित हैं.' अटॉर्नी जनरल ने इस पर कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है. इस पर खंडपीठ ने व्यंग्य करते हुये कहा, ‘जब यह सरकार पर आता है तो आप कहते हैं कि हम मालूम करेंगे.'

बता दें कि कॉलेजियम ने 19 अप्रैल को जस्टिस एम. याकूब मीर और जस्टिस रामलिंगम सुधाकर को मेघालय हाई कोर्ट और मणिपुर हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की थी जिन्हें अभी तक मंजूरी नहीं मिली है. इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है.

पीठ ने यह तल्ख टिप्पणी उस वक्त की जब अटॉर्नी जनरल ने कहा कि न्यायालय मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के रिक्त स्थानों के मामले की सुनवाई कर रही है, लेकिन तथ्य तो यह है कि जिन हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के 40 पद रिक्त हैं, वहां भी कॉलेजियम सिर्फ तीन नामों की ही सिफारिश की रही है. 

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