close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

दीपावली: दीये बनाने वाले परिवारों के घर अंधेरा

सस्ती और आकर्षित होने के वजह से लोग चाइनीज लाइट का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. जिसकी वजह से परंपरागत तरीके से इस्तेमाल होने वाले दीयों का उपयोग कम हुआ है.

दीपावली: दीये बनाने वाले परिवारों के घर अंधेरा
प्रतीकात्मक तस्वीर

भूपेश आचार्य,बाड़मेर: दीपावली में चाइनीज लाइट और इलेक्ट्रिक आइटम्स का इस्तेमाल पिछले कुछ सालों में बढ़ा है. सस्ती और आकर्षित होने के वजह से लोग चाइनीज लाइट का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. जिसकी वजह से परंपरागत तरीके से इस्तेमाल होने वाले दीयों का उपयोग कम हुआ है. बाड़मेर जिले में पहले जहां दीपावली के मौके पर 10 लाख दियों का इस्तेमाल होता था अब वो सिमट कर महज दो या ढाई लाख तक पहुंच गया है.

दीपावाली पर वैसे तो मिट्टे के दियों में दीपक को जलाना शुभ माना जाता है. दिवाली में दीपक का अपना अलग ही महत्व होता है. दर्शन दिवाली के समय ऐसी मान्यता है कि मिट्टी के दियों में सरसो के तेल को जलाने से घर पर या परिवार पर आने वाली विपत्ति टल जाती है साथ ही वातावरण भी शुद्ध रहता है. लेकिन पिछले कुछ समय से लोगों ने दीपक का उपयोग करना कम कर दिया है. जिसके चलते दीपक बनाने वाले परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया है.

रोशनी की जगमगाहट में चार चांद लगाने के लिए इन दिनों कुम्हार अपने पूरे परिवार के साथ मिट्टी के दीये बनाने में जुटे हुए हैं. बाड़मेर शहर के बलदेव नगर सहित अन्य स्थानों पर रहने वाले कुम्हार इन दिनों चाक पर मिट्टी के दीए बनाने में व्यस्त हैं. हालांकि उनके चेहरों पर बरसों पहले जैसी खुशी तो नहीं है, फिर भी उम्मीद है कि उनकी मेहनत से बने ईको-फ्रेंडली दीपकों की अच्छी बिक्री होगी. मिट्टी के दिए तैयार करने वाले बताते हैं कि चाइनीज लाइट्स ने मिट्टी के दीयों की ब्रिकी पर असर डाला है धीरे-धीरे मिट्टी के दीयों की बिक्री में कमी आई है. लेकिन इन सबके बावजूद कुम्हार अपने पूरे परिवार के साथ चाक पर दीपक बनाने में जुटे हैं ताकि दीपकों के त्यौहार पर बाड़मेर वासियों को मिट्टी के दीये उपलब्ध हो सके.

मिट्टी के दीयों का व्यापार यूं तो पुराना है, कुम्हारों की माने तो एक दौर ऐसा था जब दीपक बनाने वाले 10 परिवारों में करीब 25 लाख दीपक हर दिवाली बिकते थे लेकिन अब हालात ये है कि यह आंकड़ा दो लाख तक सीमित हो गया है. मिट्टी के दाम भी बढ़ गए है, साथ ही मेहनत करने के बावजूद मेहनताना नहीं मिलता . ऐसे में अधिकतर परिवारों ने काम ही बंद कर दिया है.

हालांकि आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो इन परम्परागत दीयों का ही इस्तेमाल करते है. धीरे-धीरे लोगों में जागरुकता भी आ रही है. चाइनीज लाइट्स की जगह अब फिर से लोग मिट्टी के दियों की तरफ लौट रहे हैं ऐसे में लोगों को भी चाहिए कि वो ज्यादा से ज्यादा मिट्टी के दियों का इस्तेमाल करें ताकि दिवाली इको फ्रेंडली हो और कुम्हारों के घरों में भी दिवाली बन सके .