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उदयपुर में मची लोक गवरी नृत्य की धूम, जानिए इसकी दिलचस्प कहानी...

आदिवासी समाज के लोगों की मानें तो समाज में खुशहाली आए इसके लिए वह वर्षो से गवरी नृत्य करते हुए कठोर तपस्या करते है. 

उदयपुर में मची लोक गवरी नृत्य की धूम, जानिए इसकी दिलचस्प कहानी...
गवरी नृत्य में शंकर-पार्वती, राधा-कृष्ण के खेल के साथ कई रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करते है.

अविनाश जगनावत/उदयपुर: आदिवासी बाहुल्य मेवाड़ संभाग की भील समाज की अटूट श्रद्धा और उपासना का प्रतीक पारम्परिक गवरी नृत्य की धूम इन दिनों परवान पर है. रक्षा बंधन के दूसरे दिन से शुरू हुआ गवरी नृत्य करीब सवा महीने तक चलता है. इस दौरन गवरी नृत्य करने वाले आदिवासी कलाकार अपने घर से दूर रह कर कठोर व्रत का पालन करते है. इस दौरान वे पूर्ण रूप से ब्रह्मचार्य व्रत का पालन करते है, पैरों में जूते नहीं पहनते है और हरि सब्जीयों के साथ मांस और मदिरा सेवन नहीं करते है. 

आदिवासी समाज के लोगों की मानें तो समाज में खुशहाली आए इसके लिए वे वर्षो से गवरी नृत्य करते हुए कठोर तपस्या करते है. गवरी नृत्य में शंकर-पार्वती, राधा-कृष्ण के खेल के साथ कई रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करते है. यही नहीं बदलते समय में आदिवासी कलकार अपने खेल के माध्यम से लोगों में बेटी पढाओं बेटी बचाओं और स्वच्छता के प्रति भी लोगों को जागरूक करते है. गवरी नृत्य के खास बात यह होती है कि इसमें प्रस्तुति देने वाले सारे कलाकार पुरूष ही होते है और आवश्यकता अनुसार वह महिलाओं का वेष भी धारण करते है.

सभी खिलाड़ी अपने घर नहीं जाते जब तक गवरी का समापन नहीं होता है. इसी के साथ यह गवरी के दिनों में जूते नहीं पहनते हरी-भरी सब्जी नहीं खाते कोई नशीले पदार्थ का सेवन नहीं करते. यह खिलाड़ी बंजारा खेल में बंजारन बनता है. कृष्ण भगवान के साथ में कजरी बनता है और काल कीर के साथ में कीर की भूमिका निभाता है. इसी के साथ शूरवीर पाव राठौड़ खेल में भी इसकी भूमिका रहती है. 

खिलाड़ी नावल राम के मुताबिक वह वीर धरी का खेल करता है. जिसमें इसकी भूमिका मीणा की रहती है. खेल में मीणा के बड़े भाई चोर होते हैं. जिनको राजा के द्वारा पकड़ लिया जाता है जिनको मीणा अपने साथियों के साथ जाकर छुड़वाता है. बता दें कि आधुनिकता के इस दौर में भी गवरी को लेकर लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है. जहां भी आदिवासी कलाकार अपनी प्रस्तुति देने के लिए पहुंचते है लोग वहां बड़ी संख्या में जमा हो जाते हैं. 

आदिवासी समाज की इस वर्षो पुरानी परम्परा को संरक्षण देने के लिए अब स्थानिय प्रशासन भी आगे आया है. आदिवासी समाज के इस लोक नृत्य को देश-दुनियां में पहचान दिलाने का लेकर प्रयास शुरू किए गए हैं. यही कारण है कि जिला प्रशासन की ओर से शहर के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर भी गवरी नृत्य का आयोजन किया जा रहा है. ताकि यहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक भी आदिवासी समाज की इस परम्परा से रूबरू हो पाए.