मुंबई: मराठी लेखक ने महाराष्ट्र सरकार की पेंशन लेने से किया इनकार, बताई यह वजह

मराठी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता विनय हार्दिकर ने आपातकाल के दौरान जेल में गये लोगों के लिए भाजपा की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार की पेंशन पेशकश को नहीं लेने का फैसला किया है. 

मुंबई: मराठी लेखक ने महाराष्ट्र सरकार की पेंशन लेने से किया इनकार, बताई यह वजह
हार्दिकर ने कहा, ‘‘सरकार को कुछ मुद्दों पर सफाई देनी चाहिए.(फोटो-YouTube)

मुंबई: मराठी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता विनय हार्दिकर ने आपातकाल के दौरान जेल में गये लोगों के लिए भाजपा की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार की पेंशन पेशकश को नहीं लेने का फैसला किया है. हार्दिकर की 1978 की पुस्तक ‘जनाचा प्रवाहो चालिला’ आपातकाल पर प्रामाणिक टिप्पणी समझी जाती है. उन्होंने कहा कि सरकार का (पेंशन का) फैसला विभिन्न कारणों से अनैतिक है. उन्होंने जनवरी , 1976 में सत्याग्रह में हिस्सा लिया था और गिरफ्तारी दी थी. उन्हें पुणे के समीप यरवदा जेल में डाल दिया गया था. उन्होंने कहा, ‘‘ मैंने पेंशन नहीं लेने का फैसला किया है.

मैं मानता हूं कि इस फैसले का राजनीतिक पक्ष है जो भाजपा अध्यक्ष के संपर्क फोर समर्थन अभियान का हिस्सा जान पड़ता है. मैं उसमें फंसना नहीं चाहता. ’’ लेखक ने कहा कि आपातकाल लगाने के इंदिरा गांधी के फैसले का समर्थन करने वाली शिवसेना अब राज्य सरकार में घटक है अतएव पेंशन की यह पेशकश अनैतिक है. हार्दिकर ने कहा, ‘‘ सरकार को कुछ मुद्दों पर सफाई देनी चाहिए. पहला , जेल में गुजारे गये समय के अनुसार लोगों के बीच भेदभाव क्यों ?’’ उन्होंने कहा, ‘‘ जो जेल में डाले गये थे, वे दो प्रकार के लोग थे.

ऐसे लोग, जिन्होंने सत्याग्रह किया (और जिन्होंने गिरफ्तारी दी थी) तथा ऐसे लोग जिन्हें किसी विरोध प्रदर्शन से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था. मुस्लिम लीग और आनंद मार्ग जैसे सांप्रदायिक संगठनों के कार्यकर्ता भी थे. कुछ नक्सली भी हिरासत में लिये गये थे. क्या वे भी इस उदार पेंशन के हकदार हैं ?’’ उन्होंने सवाल किया, ‘‘ आपातकाल में जेल में डाल दिये गये अन्य लोगों की तुलना में आरएसएस के कार्यकर्ता अधिक थे.

क्या सराकर उन्हें नकद पुरस्कार देना चाहती है. क्या यह नैतिक है क्योंकि आरएसएस को गैर राजनीतिक संगठन होने का दावा करता है. ’’ हार्दिकर ने कहा, ‘‘ मैं आपातकाल खत्म और लोकतंत्र की बहाली चाहता था. मैं चाहता था कि इंदिरा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र के साथ जो ज्यादती की , उसके लिए उन्हें दंडित किया जाए. मेरे दोनों ही लक्ष्य मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव के साथ हासिल हो गये. ’’