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झुंझुनूं: माहवारी जागरूकता को लेकर शुरू हुआ 'हमारी लाडो सशक्त लाडो' अभियान

इस कार्यक्रम में महिला चिकित्सक के जरिए माहवारी प्रबंधन के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां और वो परंपराएं जो पुराने समय से चल तो रही है लेकिन वे किसी भी मायने में सही नहीं है. 

झुंझुनूं: माहवारी जागरूकता को लेकर शुरू हुआ 'हमारी लाडो सशक्त लाडो' अभियान
इस पहल की झुंझुनूं में काफी प्रशंसा हो रही है.

संदीप केडिया, झुंझुनूं: माहवारी ऐसा विषय है जिस पर यदि चर्चा शुरू हो जाती है तो कोई शर्माता है और कोई झिझकता है लेकिन महिलाओं के लिए यह काफी महत्वपूर्ण वक्त होता है. इसी माहवारी प्रबंधन को लेकर झुंझुनूं के महिला अधिकारिता विभाग ने शुरू किया हमारी लाडो सशक्त लाडो अभियान. जिसके तहत चुप्पी तोड़ो कार्यशाला में इन दिनों ग्रामीण परिवेशन की महिलाओं और बच्चियों को माहवारी के बारे में जागरूक किया जा रहा है. 

झुंझुनूं में ग्रामीण महिलाओं और बच्चियों को माहवारी प्रबंधन के लिए जागरूक करना और पुरानी अंधी और गलत परंपराओं को छोड़ने के लिए यह कार्यक्रम शुरू किया गया है. महिला अधिकारिता विभाग और महिला शक्ति केंद्र के सहयोग से आयोजित हो रहे इस कार्यक्रम के जरिए माहवारी प्रबंधन के अलावा मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर चर्चा हो रही है ताकि गांव में पैदा होने वाली बेटियां भी शहर की बेटियों के माफिक बराबरी में आकर खड़ी हों. इसके लिए चुप्पी तोड़ो नाम दिया गया है. ताकि वे झिझक दूर कर, खुद के बारे में बोलें और सोचे तो वास्तव में परिवर्तन होंगे.

इस कार्यक्रम में महिला चिकित्सक के जरिए माहवारी प्रबंधन के दौरान बरती जाने वाली सावधानियां और वो परंपराएं जो पुराने समय से चल तो रही है लेकिन वे किसी भी मायने में सही नहीं है. उन्हें लेकर जागरूक किया जा रहा है. महिला चिकित्सक कार्यक्रम में बच्चियों के साथ खुलकर चर्चा करती हैं और उनकी समस्याओं के समाधान भी करती हैं ताकि उनके साथ कोई सवाल खड़ा ही ना हो. इस तरह के सेमीनार इनदिनों ग्रामीण क्षेत्रों की कॉलेजों में हो रहे हैं ताकि ग्रामीण क्षेत्र की मेच्योर लड़कियों के साथ इस पर खुलकर चर्चा की जा सके. ऐसा ही पहला सेमीनार हुआ है बड़ागांव की एक निजी कॉलेज में.

इस मौके पर लड़कियों ने ना केवल इस चर्चा में हिस्सा लिया बल्कि माहवारी के साथ-साथ अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी चर्चा की. विभाग भी यही चाहता है कि लड़कियां ज्यादा से ज्यादा सवाल करें, ताकि उनके साथ काफी कुछ साफ हो और वो खुलकर जी सके. यही नहीं जो पुरानी परंपराएं आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में कायम हैं उसे दूर किया जा सके. इस पहल की झुंझुनूं में काफी प्रशंसा हो रही है. वहीं अब ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों के साथ-साथ महिलाओं के लिए भी अलग से कार्यशालाएं रखने की योजना बनाई जा रही है.

माहवारी शुरू होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लड़कियों के सामने खाने, नहाने, उठने, बैठने, सोने जैसे कामों में कई पाबंदिया लग जाती हैं. यही कारण है कि चुप्पी तोड़ो कार्यशालाएं शुरू करनी पड़ रही है. जबकि चिकित्सक ये बताते हैं कि यह सब पुरानी और अंधी परंपराएं हैं जिन्हें विज्ञान में कभी कोई तवज्जो नहीं दी गई है. ऐसे में माहवारी के दौरान भी लड़कियां आम जीवन जी सकती हैं. उन्हें हर कदम रखने से पहले सतर्क रहने की भी कोई जरूरत नहीं हैं.