close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

राजस्थान: जानिए खींवसर और मंडावा विधानसभा सीट के उप-चुनाव में हार-जीत का समीकरण...

निकाय चुनाव से पहले राजस्थान में दो उपचुनाव सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है. दोनों ही सीटों को लेकर प्रत्याशियों को मैदान में उतारा जा चुका है. जिसके बाद तस्वीर बिल्कुल साफ हो चुकी है.

राजस्थान: जानिए खींवसर और मंडावा विधानसभा सीट के उप-चुनाव में हार-जीत का समीकरण...
यहां 28 अक्टूबर को उप-चुनाव होने जा रहा है. (फाइल फोटो)

जयपुर: राजस्थान (Rajasthan) में होने वाले दो-उपचुनाव को लेकर बिसात बिछ चुकी है. दोनों सीटों को लेकर प्रत्याशियों के नामों का ऐलान हो चुका है. बीजेपी (BJP) और उनकी सहयोगी पार्टी आरएलपी (RLP) एक-एक सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं, कांग्रेस(Congress) के लिए सत्ता में होने के बाद भी दोनों उप चुनाव जीतना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है.

निकाय चुनाव से पहले राजस्थान में दो उपचुनाव सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है. दोनों ही सीटों को लेकर प्रत्याशियों को मैदान में उतारा जा चुका है तस्वीर बिल्कुल साफ हो चुकी है. 

जानिए मंडावा सीट का हाल
अगर मंडावा सीट (Mandawa Vidhansabha Seat) की बात करें तो कांग्रेस की ओर से पूर्व विधायक रीटा चौधरी (Reeta Chaudhary) के सामने कांग्रेस की टिकट पर प्रधान रह चुकी और बीजेपी उम्मीदवार सुशीला सीगड़ा होंगी. जबकि खींवसर विधानसभा सीट (Khinwsar Vidhansabha Seat) से कांग्रेस के पूर्व मंत्री हरेंद्र मिर्धा के सामने आरएलपी प्रमुख हनुमान बेनीवाल के भाई नारायण बेनीवाल चुनावी मैदान में होंगे.

समीकरण हो गए हैं बेहद दिलचस्प
प्रत्याशियों का ऐलान होने के बाद दोनों ही सीटों को लेकर समीकरण बेहद दिलचस्प हो गए हैं. अगर मंडावा सीट की बात करें तो कांग्रेस लगातार यहां दो बार चुनाव हार चुकी हैं. रीटा चौधरी 2008 में यहां से विधायक रह चुकी हैं लेकिन 2013 के चुनाव में टिकट नहीं मिलने से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरी थी और उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

रीटा चौधरी की राह है मुश्किल
इस बार रीटा चौधरी को भी इसी तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा. क्योंकि बीजेपी ने झुंझुनू पंचायत समिति कि कांग्रेस के सिंबल पर प्रधान रही सुशीला सिगड़ा को बीजेपी ज्वाइन करा कर टिकट दिया है.

सुशीला सिगड़ा को किया गया था निष्कासित
सुशीला सिगड़ा को 2018 के विधानसभा चुनाव में रीटा चौधरी के खिलाफ चुनावी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में पार्टी से निष्कासित किया गया था. 

झुंझुनूं के सांसद के बेटे भी थे लिस्ट में शामिल
हालांकि पहले झुंझुनूं के सांसद नरेंद्र खींचड़ के बेटे अतुल खीचड़ का नाम बीजेपी की सूची में सबसे ऊपर था लेकिन अंतिम क्षणों में बीजेपी के नेता राजेंद्र राठौड़ की रणनीति के तहत टिकट बदला गया. इसकी एक बड़ी वजह महिला के सामने महिला चेहरे के होने के साथ-साथ झुंझुनू पंचायत समिति क्षेत्र में मंडावा के एक दर्जन गांव का आना भी है. जहां पर सुशीला सीगड़ा की पकड़ मजबूत मानी जाती है.

रीटा चौधरी के नाम पर नहीं था संशय
कांग्रेस में रीटा चौधरी के नाम को लेकर किसी तरह का कोई संशय नहीं था. विधानसभा चुनाव में उन्हें 2346 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था और उसके बाद भी वे काफी सक्रिय नजर आ रही थी हालांकि अपने क्षेत्र में बड़ी संख्या में तबादलों के चलते वह चर्चाओं में रही लेकिन पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रामनारायण चौधरी की विरासत को संभाले रीटा चौधरी ही कांग्रेस की सबसे मजबूत उम्मीदवार थी.

मुकाबला होगा दिलचस्प
पहले रीटा चौधरी के लिए यह सीट आसान मानी जा रही थी लेकिन सुशीला के मैदान में आने से आप मुकाबला मुश्किल होगा. वहीं अगर खींवसर विधानसभा सीट की बात करें तो कांग्रेस ने पूर्व मंत्री हरेंद्र मिर्धा को चुनावी मैदान में उतारा है.इसी पर उनका मुकाबला हनुमान बेनीवाल के भाई नारायण बेनीवाल से होगा.

कांग्रेस को खींवसर से मिली है लगातार हार
कांग्रेस खींवसर विधानसभा सीट पर लगातार तीन चुनाव हार चुकी है इस सीट को हनुमान बेनीवाल का मजबूत गढ़ माना जाता है. ऐसे में कांग्रेस ने इस किले में सेंध लगाने के लिए अनुभवी नेता हरेंद्र मिर्धा पर दांव खेला है.

मिर्धा परिवार का डेगाना और नागौर में रहा है दबदबा
नागौर जिले के कुचेरा कस्बे से संबंध रखने वाले मिर्धा परिवार का डेगाना व नागौर में बोलबाला रहा है और इसी परिवार से डॉ. ज्योति मिर्धा नागौर से सांसद भी रह चुकी है. मिर्धा परिवार प्रदेश की जाट राजनीति का बड़ा चेहरा है लेकिन परिवार के दो धड़ों में बंट जाने से नई पीढ़ी ऊहापोह के दौर से गुजर रही है.

हरेंद्र मिर्धा को मिल चुकी है मात
हरेंद्र मिर्धा 2013 के विधानसभा चुनाव में नागौर सीट से हार चुके हैं. पार्टी ने इस विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट नहीं दिया था लेकिन इस उपचुनाव के चलते उन्हें एक बार फिर से अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने का अवसर मिला है.

उप-चुनाव के बारे में यह रहता है अनुमान
कहा जाता है कि जिस दल की सरकार राज्य में होती है उपचुनाव में अधिकांश सीटों पर जीत उसी पार्टी की रहती है लेकिन जिस तरह से सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी थी. इन दोनों उपचुनाव में कांग्रेस के लिए राह आसान नहीं होगी.

कांग्रेस का बीजेपी गठबंधन से होगा मुकाबला
कांग्रेस को दोनों सीटों पर बीजेपी और आरएलपी दोनों का मुकाबला करना होगा और दोनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए सत्ता और संगठन में तालमेल की बेहद जरूरत होगी.