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कोटा: आरोपी हेड कॉन्सटेबल से राज उगलवाने में नाकाम हुई पुलिस, 14 साल बाद केस बंद

कोटा के कैथूनीपोल थाने के मालखाने से 2001 -2004 के बीच 4 लाख 30 हजार 751 रुपए की नकदी और 8.630 ग्राम सोने-चांदी के जेवरात गायब हो गए थे.

कोटा: आरोपी हेड कॉन्सटेबल से राज उगलवाने में नाकाम हुई पुलिस, 14 साल बाद केस बंद
इसका सीधा आरोप तत्कालीन मालखाना इंचार्ज हेड कांस्टेबल बन्ना सिंह पर लगा था.

कोटा: डंडे के जोर पर बदमाशों से राज उगलवाने के किस्से अपने बहुत सुने होंगे, लेकिन राजस्थान पुलिस अपने ही हेड कॉन्सटेबल से मालखाने से नकदी और जेवरात के गबन का राज नहीं उगलवा सकी. थक हार कर गृह विभाग को 14 साल बाद मामले को रफा-दफा करना पड़ा.

क्या था मामला
कोटा के कैथूनीपोल थाने के मालखाने से 2001 -2004 के बीच 4 लाख 30 हजार 751 रुपए की नकदी और 8.630 ग्राम सोने-चांदी के जेवरात गायब हो गए थे. जिसके बाद सीधा आरोप तत्कालीन मालखाना इंचार्ज हेड कांस्टेबल बन्ना सिंह पर लगा था. हेड कांस्टेबल बन्ना सिंह के खिलाफ 10 जनवरी 2005 को  अमानत में ख्यानत का मामला दर्ज कराया गया था. मामले में जांच कर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में चालान पेश किया गया. कोर्ट ने भी 30 अगस्त 2012 को आरोपी हेड कांस्टेबल बन्ना सिंह को तीन साल की सजा के साथ पांच हजार रुपए का जुर्माने भी लगाया. सजा मिलने के बाद विभाग ने बन्ना सिंह को नौकरी से बर्खास्त कर दिया.

कहां हुई चूक
पुलिस गबन का राज उससे आज तक नहीं उगलवा सकी. सबसे पहले पुलिस मुख्यालय में हेड कांस्टेबल के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई. फिर वृत्ताधिकारी कोटा शहर पश्चिम को नकदी और सोने-चांदी की बरामदगी की जिम्मेदारी सौंपी. कोटा शहर एसपी की ओर से 15 जनवरी 2013 को जारी आदेश में बन्ना सिंह की स्थायी-अस्थायी सम्पत्तियों और मामले की वस्तुस्थिति रिपोर्ट मांगी गई. इधर वृत्ताधिकारी भी आरोपी हेड कांस्टेबल से वसूली करवाने में नाकाम रहे और उन्होंने 6 जनवरी 2014 को बन्ना सिंह के नाम किसी भी प्रकर की सम्पत्ति होने से इंकार कर दिया. इसके भी चार साल बाद कोई बरामदगी नहीं हो पाई. यानि की कुल मिलाकर कहा जाए तो विभागीय मामला होने के नाते पुलिस ने जांच के नाम पर लीपापोती ही करती रही.

कौन है जिम्मेदार
जांच के नाम पर खानापूर्ति कर पुलिस ने मामले से पल्ला झाड़ लिया. वहीं गृह विभाग को मामला रफा-दफा करने के लिए लिख दिया. गृह विभाग ने तीन दिन पहले मामले में अपलेखन की वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति दे दी. इस पूरे मामले से एक बात साफ हो गई कि विभागीय मामला होने के चलते पुलिस कोई ठोस कार्रवाई करने से बचती रही.