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आपसी सामंजस्य ने बदल दी इस 'कुष्ठ रोगी' गांव की किस्मत, पहले भीख मांग करते थे गुजारा

राउरकेला के नया बाजार स्थित लेप्रोसी कॉलोनी के 65 घरों में 169 लेप्रोसी पीड़ित (कुष्ठ रोग) और उनके परिवार रहते हैं. लेप्रोसी से पीड़ित होने के कारण यह लोग समाज से दूर रहते थे. दो वक्त का खाना खाने के लिए इन लोगों को दूसरों के आगे हाथ फैलाकर भीख मांगना पड़ता था.

आपसी सामंजस्य ने बदल दी इस 'कुष्ठ रोगी' गांव की किस्मत, पहले भीख मांग करते थे गुजारा
मशरूम की खेती करती महिलाएं

सुशांत कुमार दास, राउरकेला: जागरुकता और आपसी सामंजस्य के बल पर एक गांव के लोगों के हालात तो बदले ही साथ ही साथ पूरी तस्वीर ही बदल चुकी है. एक वक्त था जब ओडिशा के इस्पात नगरी राउरकेला के नया बाजार स्थित लेप्रोसी कॉलोनी के एक गांव में लोग समाज से कटे और भीख मांग कर गुजारा करते थे लेकिन आज उनका रहन-सहन पूरी तरह बदल चुका है. कभी ये लोग दया के पात्र थे लेकिन अभी ये लोगों को सामान मुहैया करा रहे हैं. जी हां, यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, यह एक सच्ची घटना है. 

राउरकेला के नया बाजार स्थित लेप्रोसी कॉलोनी के 65 घरों में 169 लेप्रोसी पीड़ित (कुष्ठ रोग) और उनके परिवार रहते हैं. लेप्रोसी से पीड़ित होने के कारण यह लोग समाज से दूर रहते थे. दो वक्त का खाना खाने के लिए इन लोगों को दूसरों के आगे हाथ फैलाकर भीख मांगना पड़ता था. लेकिन समय के साथ इन लोगों का रहन-सहन अब पूरी तरह बदल चुका है. कुछ सामाजिक संगठन और राउरकेला महानगर निगम के सहयोग से यह लोग भी अब साधारण लोगों के साथ शामिल हो रहे हैं. कॉलोनी की कुछ महिलाएं सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाकर बहुत सारे काम कर रही हैं. जिनमें से मशरूम की खेती सबसे प्रमुख है. इन लोगों ने पहले-पहल अपने-अपने घर में मशरूम की खेती की और फिर 900 वर्ग फुट जगह में चल रही इस खेती से उनको अच्छा मुनाफा मिल रहा है. सिर्फ मशरूम की खेती ही नहीं अपने इलाके के कचरे से भी यह लोग वर्मी कंपोस्ट बना रहे हैं. जिसको 10 से 12 रुपये किलो पैकेट बनाकर बेचा जा रहा है. इसके साथ ही ये लोग फिनाइल भी बनाकर बेच रहे हैं. इन चीजों की अच्छा क्वालिटी की वजह से बाहर के कई लोग अभी इन लोगों से जुड़ गए हैं.

कॉलोनी के लोगों की मदद करने वाली सामाजिक कर्मी प्रियंका अपना अनुभव शेयर करते हुए जी माडिया को बताती हैं, "जब 2017 में पहले हम लोग यहां आए तो हम लोग को यह लोग एक्सेप्ट ही नहीं कर रहे थे. लेकिन धीरे-धीरे हम लोग इनके साथ मिलते गए और ये लोग हम सब के साथ मिलते गए. 2018 में पहले उनके घर में उसके बाद हम लोगों ने यहां पर खेती शुरू किया. अभी मशरूम से लोगों को लगभग दोगुना मुनाफा हो रहा है. इसके साथ ही ये लोग अब कंपोस्ट और फिनाइल भी बना रहे हैं. जिसकी वजह से अब बहुत सारे लोग इनसे जुड़ रहे हैं."
 

कॉलोनी में रहने वाली सावित्री नायक अपनी बात साझा करते हुए कहती हैं, "पहले तो हम लोग कुछ नहीं कर रहे थे लेकिन बाद में हम कुछ महिलाओं ने सोचा कि कुछ काम किया जाए. फिर हमने यह मशरूम की खेती करना शुरू किया. इसमें से हम लोगों को अच्छा फायदा मिल रहा है. इसके साथ हम लोग घर के कचरा और यहां से निकलने वाले कचरे को लेकर खाद बना रहे हैं. इसके अलावा फिनाइल भी बना रहे हैं. इन सबसे अच्छा फायदा मिल रहा है."

सावित्री की तरह ही प्रभासिनी माझी भी बताती हैं, "पहले लोग हम लोगों से घृणा करते थे पर अब वह लोग हम लोग के पास आ रहे हैं. अच्छा लग रहा है. हम लोग कंपोस्ट मशरूम और फिनायल बेच कर अच्छा फायदा कमा रहे हैं."

कॉलोनी की रहने वाली लक्ष्मी विश्वाल भी कहती हैं, "पहले तो हम लोग घर में बैठे रहते थे. लेकिन इन लोगों ने आकर हमको मशरूम की खेती करना सिखाया. इसके बाद पहले लॉस हुआ लेकिन अब फायदा हो रहा है. हमको अच्छा लग रहा है. इससे हम लोग का घर खर्चा निकल जा रहा है."