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बाढ़ से तबाह हुए कोटा के कई गांव, लोगों को अब सरकार से उम्मीद

पन्द्रह अगस्त के बाद लगातार हुई बारिश से कई लोगों के कच्चे मकान भी धराशायी हो गए. जिलेभर में सैकड़ों मकान बारिश में टूट गए. 

बाढ़ से तबाह हुए कोटा के कई गांव, लोगों को अब सरकार से उम्मीद
बर्बादी का मंजर अब भी गांवों में लोगों को चेन की नींद नहीं सोने दे रहा.

कोटा: राजस्थान के कोटा जिले में इस बार भारी बारिश और नदियों में आई बाढ़ ने सैकड़ों लोगों के सिर से छत छीन ली. बाढ़ का पानी गांवों में बरबादी का मंजर छोड़ गया जिसे लोग भूल नहीं पा रहे हैं. नदियों में आई बाढ़ लोगों का सबकुछ बहा ले गई. बाढ़ ने कई परिवारों को बेघर कर दिया तो कई परिवारों लोगों के पास सिर छुपाने के लिए छत तक नहीं रही. अब ऐसे कई परिवार खुले आसमान तले जीवन बिताने को मजबूर है. अब इन परिवारों को सरकार से मदद की आस है.

जिलेभर में बारिश लोगों पर कहर बनकर बरसी. बांधों में पानी की आवक हुई तो नदियों ने भी रौद्र रूप दिखाया. हाड़ौती समेत मध्यप्रदेश में हुई भारी बारिश से जिलेभर की मुख्य नदियां उफान पर रही.कालीसिंध, चम्बल, उजाड़, पार्वती नदियां अपनी दहलीज लांघकर गांवों तक पहुंच गई. ऐसे में गांव के गांव बाढ़ की चपेट में आ गए. नदियों के मुहाने पर बसे गांव बाढ़ की चपेट में आ गए. कोटा जिले के सांगोद, इटावा व सुल्तानपुर में इस बार बाढ़ ने जमकर कहर ढाया. हजारों बीघा की फसलें बरबाद हो गई और सैकड़ों लोग बेघर हो गए.

पन्द्रह अगस्त के बाद लगातार हुई बारिश से कई लोगों के कच्चे मकान भी धराशायी हो गए. पक्के मकानों ने तो बारिश झेल ली लेकिन लोगों के कच्चे आशियाने बारिश की मार नहीं झेल सके. जिलेभर में सैकड़ों मकान बारिश में टूट गए. कच्चे घरों की छते टूट गई. लोगों को तिरपाल डालकर सिर छुपाना पड़ रहा है. बाढ़ में बेघर हुए कई परिवारों ने दूसरे लोगों के घर शरण ले रखी है. कोई तिरपाल के सहारे जिंदगी जी रहा है तो कोई टूटे मकानों में ही सिर छुपाने को मजबूर है. बाढ़ का पानी गांवों से भले ही उतर गया लेकिन बर्बादी का मंजर अब भी गांवों में लोगों को चेन की नींद नहीं सोने दे रहा.

इटावा पंचायत समिति की ग्राम पंचायत गेता का चम्बल किनारे बसा गांव किरपुरा पर कहर इस कदर टूटा की गांव के अधिकांश मकान धराशाही हो गए है. गांव में हालात यह है कि 80 फीसदी मकान धराशाही हो गए. मकानों में रखे समान बह गए इसके अलावा गांव के पशु भी इस बाढ़ में बह गए. गांव के बुजर्ग बताते है कि गांव की बसावट 60 वर्ष से अधिक पुरानी है, लेकिन चम्बल सबकुछ बहा ले गई. कुछ ऐसे ही हालात सुल्तानपुर एवं सांगोद पंचायत समिति के भी कई गांव के हैं. अब लोग अपने घरों के मलबे से सामान समेटने में जुटे है.

प्रशासनिक स्तर पर ऐसे लोगों का सर्वे कर उन्हें मुआवजे की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है लेकिन मुआवजे की राशि से इन परिवारों के लिए आशियाना बनाना तो दूर छत ढकने तक का बंदोबस्त नहीं हो सकता. ऐसे में अब पीडि़त परिवारों के लिए फिर से आशियाने बहाना किसी चुनौती से कम नहीं है. आशियाने ढ़हने के बाद अब मुआवजे की उम्मीद में ऐसे कई परिवार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने लगे है. लोगों को उम्मीद है कि अब सरकार ही उनकी तारणहार बनेगी.