महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगने से क्या नफा-नुकसान, पढ़ें जानकारों की राय

पूर्व अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों का मानना है कि प्रशासनिक कार्यों में सुस्ती आएगी, क्योंकि सचिव और मुख्य सचिव के अनुशंसा पर कार्यों का अंजाम दिया जाएगा.

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगने से क्या नफा-नुकसान, पढ़ें जानकारों की राय
(फाइल फोटो)

मुंबई: महाराष्ट्र में राजनीतिक उठा-पटक के बाद जनता के जरिए चुने हुए प्रतिनिधियों ने जरिए सरकार नहीं बना पाने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन (President Rule) लागू कर दिया गया. महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू होने की तीसरी अवधि है. राष्ट्रपति शासन के दौरान नीति निर्धारण के कार्य तो नहीं होंगे लेकिन सामान्य प्रशासन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. पूर्व अधिकारी और जन प्रतिनिधियों का मानना है कि प्रशासनिक कार्यों में सुस्ती आएगी, क्योंकि सचिव और मुख्य सचिव के अनुशंसा पर कार्यों का अंजाम दिया जाएगा.

बता दें कि चुनाव से पहले एक साथ जनता के सामने जाकर कांग्रेस और एनसीपी के विरोध में चुनाव लडने वाले बीजेपी और शिवसेना एक साथ मिलकर, संख्याबल होने पर भी महाराष्ट्र में सरकार नहीं बना पाए. शिवसेना की नाराज़गी बीजेपी से इतनी बढ़ी कि इस मामले में अपने घोर विरोधी एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिल गई लेकिन सरकार बनाने का का दावा नहीं पेश कर सकी. राज्यपाल को विधायकों का समर्थन पत्र नहीं दे सकी.

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राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की स्थिति में राजनीतिक दलों की तरफ से आलोचना की जा रही है तो कई अटकलें भी लगाई जा रही है. लेकिन राष्ट्रपति शासन को लेकर आम धारणा से अलग जानकारों का कहना है कि इससे राज्य के नागरिकों को कोई तकलीफ नहीं होगी. ये जरुर है कि राज्य में नीति निर्धारण के फैसले नहीं लिए जा सकते हैं. राज्य वित्त और बजट प्रावधान के अतिरिक्त फैसले पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल पर निर्भरता रहेगी.

रिटायर्ड आईएएस और पूर्व सचिव सी.एस.संगीतराव ने ज़ी मीडिया को बताया, 'ऐसा नहीं है कि किसी काम में बाधा आएगी, जो भी रोज के काम होंगे वो सचिव और मुख्य सचिव की अगुवाई में होगी जिसमें राज्यपाल महोदय के अनुमति दी जाएगी. अगर ये राष्ट्रपति शासन ज्यादा अवधि तक होगा तो एक एडमिनिस्ट्रेटर की नियुक्ति कर दी जाएगी जो मुख्य सचिव के उपर होंगे.

महाराष्ट्र में तीसरी बार लगा है राष्ट्रपति शासन
महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन तीसरी बार लगाया गया है. सबसे पहले राष्ट्रपति शासन 17 फरवरी 1980 से  जून 1980 तक लगाया गया था. जब मुख्यमंत्री शरद पवार विधानसभा में अल्पमत में थे. दूसरी बार साल 2014 में 28 सितंबर से 30 अक्टूबर तक 32 दिनों का राष्ट्रपति शासन लागू हुआ जब कांग्रेस सरकार में शामिल एनसीपी और समर्थक दलों से अलग हो गई थी.

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दरअसल राष्ट्रपति शासन के दौरान कार्य कैसे होते हैं इस बात को समझना ज्यादा दिलचस्प है. राष्ट्रपति शासन से सीधा अर्थ है कि शासन का अधिकार सीधे राष्ट्रपति के हाथों में. राज्यों में राष्ट्रपति तो आकर शासन करने से रहे,  इसलिए राष्ट्रपति के नुमाइंदे राज्य के राज्यपाल के जरिए राज्य की शासन व्यवस्था चलाई जाती है.

कई ऐसे निर्णय हैं जिसे राज्यपाल नहीं ले सकते हैं.

--राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल किसी भी नए प्रोजेक्ट के सिलसिले में निर्णय नहीं ले सकते .
--किसी भी नीति निर्धारण के फैसले पर निर्णय नहीं लिया जा सकता
--राष्ट्पति शासन के दौरान सब्सिडी और दूसरे नीतियों पर निर्णय लंबित ही रहेगा
--नए बजट नहीं बनाए जा सकते
--कोई भी नया सरकारी प्रोजेक्ट की शुरुआत नहीं की जा सकती
---राष्ट्पति शासन के दौरान सचिव , राज्य के मुख्य सचिव के मार्फत राज्य के राज्यपाल के जरिए काम काज चलाया जाता है
--राज्य‌ को केन्द्र सरकार की तरफ चलाए जा रहे जनहित के कार्यक्रमों ‌‌का लाभ राज्यपाल के लिया जा सकता है

मूलतः ने सरकार के गठन तक कोई नए कार्य की अनुमति मिलेगी और ना ही कोई नई स्कीम लागू होगी.

सरकार को चलाने के लिए अधिकारियों का दल प्रभावी होगा
हालांकि अधिकारियों को पहले से ही अधिकार दिए गए हैं लेकिन सरकार से चुने हुए जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में सरकार का कोई बड़ा फैसला अधिकारी भी नहीं लेते हैं. यानि कुल मिलाकर अगर सरल भाषा में कहा जाए तो सरकार तो चलेगी, लेकिन महज काम चलाने और रोज रोज के काम के संपादन के लिए. महाराष्ट्र में राजनीतिक गतिरोध बनने से 6 महीने का राष्ट्रपति शासन घोेषित किया गया है. महाराष्ट्र के सामान्य प्रशासन विभाग की तरफ से मंत्री और उनके सहयोगी सहित व्यक्तिगत‌ सचिव के दफ्तर को खाली करने का आदेश जारी कर दिया गया है. महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद किसानों को‌ बेमौसम बरसात से खराब हुई फसलों का मुआवजा देने में बाधा आने की आशंका एनसीपी जता रही है.

एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष नवाब मलिक ने कहा, 'जनता के जरिए चुनी हुई सरकार नहीं होने से कई तरह की असुविधा होनी वाजिब है. किसानों के मुद्दे को लिजिए राज्यपाल केन्द्र पर किसानों के हक के लिए कोई दबाव नहीं बना सकते हैं. महज केन्द्र से अनुशंसा कर सकते हैं.इस दौरान नए प्रोजेक्ट को तो भूल ही जाइए.'

6 महीने से पहले ऐसा हटाया जा सकता है राष्ट्रपति शासन
प्रदेश में लगा राष्ट्रपति शासन छह महीने की मियाद तक है.‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ लेकिन इसके बीच में ही अगर सरकार बनाने के दावे, वाजिब संख्याबल के सबूत के साथ राज्यपाल के समक्ष पेश करने पर इसे हटाया जा सकता है. शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस आपस में कई स्तर की बातचीत कर सरकार बनाने की होड़ में हैं. हालांकि एक स्थायी सरकार ही जनता की समस्या पर गंभीरता से ध्यान दे सकती है. 3 अलग-अलग विचार के दलों को मिलाकर सरकार तो बनाया जा सकता है लेकिन इसकी कामयाबी पर संदेह ही है.