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राजस्थान: स्टांप पेपर की कालाबजारी को लेकर प्रशासन ने चलाया डिकॉय ऑपरेशन, खुली पोल

इन अधिकारियों को ही स्टांप वेंडर्स ने तीन गुणा दामों में स्टांप पेपर को बेचा. ये सबकुछ हुआ जयपुर कलेक्ट्रेट परिसर में जहां निगरानी लिए अफसर और जिले के हाकिम बैठते हैं.

राजस्थान: स्टांप पेपर की कालाबजारी को लेकर प्रशासन ने चलाया डिकॉय ऑपरेशन, खुली पोल
प्रतीकात्मक तस्वीर

जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्टांप पेपर की कालाबाजारी का खेल धड़ल्ले से चल रहा है. जी राजस्थान ने 7 सितंबर को कालाबाजारी के इस खेल का पर्दाफाश किया था. जिसके बाद मुद्रांक एवं पंजीयन विभाग के अफसरों की नींद टूटी. स्टांप विक्रेता ग्राहकों को ज्यादा कीमत पर स्टांप पेपर बेचकर कालाबाजारी करते हैं, लेकिन हद तो तब हो गई जब अजमेर से निरीक्षण के लिए पहुंचे पंजीयन विभाग के अधिकारी को ही स्टांप वेंडर्स ने चूना लगा दिया. 

इन अधिकारियों को ही स्टांप वेंडर्स ने तीन गुणा दामों में स्टांप पेपर को बेचा. ये सबकुछ हुआ जयपुर कलेक्ट्रेट परिसर में जहां निगरानी के लिए अफसर और जिले के हाकिम बैठते हैं. जी राजस्थान पर खबर चलने के बाद अजमेर मुद्रांक एवं पंजीयन विभाग के कलेक्ट्रेट परिसर में डिकॉय ऑपरेशन चलाया, और बोगस ग्राहक बनकर जब स्टांप वेंडर्स के पास पहुंचे तो पूरे खेल का पर्दाफाश हो गया.

केस नंबर-1
सीमा सक्सेना--स्टांप वेंडर, सीतारामपुरी, आमेर रोड. अधिकारियों की टीम ने 50 रूपए का स्टांप खरीदा. जिसके एवज में स्टांप वेंडर ने 140 रूपए वसूले.

केस नंबर-2
कृष्ण कुमार कुमावत, स्टांप वेंडर कलेक्ट्रेट कार्यालय. डिकॉय टीम ने 50 रूपए का स्टांप खरीदा. 20 प्रतिशत अधिभार सहित 60 रूपए होते हैं. जिसके एवज में टीम से 65 रूपए वसूल लिए.

केस नंबर-3
द्वारका प्रसाद, स्टांप वेंडर, कलेक्ट्रेट कार्यालय. डिकॉय टीम ने 50 रूपए का स्टांप खरीदा. 20 प्रतिशत अधिभारसहित 60 रूपए होते हैं. जिसके एवज में 70 रूपए लिए गए.

केस नंबर-4
रेखा शाह, स्टांप वेंडर. डिकॉय टीम ने पाया कि लाइसेंस किसी के नाम जबकि स्टांप विक्रय कोई और कर रहा था. एक ही चालान से कई स्टांप दिए जा रहे थे.

केस नंबर-5
खुशबू सैनी, स्टांप विक्रेता, जयपुर. पत्नी के नाम लाइसेंस और पति एसके कटारिया स्टांप बेच रहे थे.

केस नंबर-6
हितेश बलवानी, स्टांप विक्रेता,जयपुर. निर्धारित विक्रय स्थल से अन्य स्थान पर स्टांप बेचे रहे थे.

मुद्रांक एवं पंजीयन विभाग के अधिकारियों की मानें तो जयपुर में हर महीने आठ करोड़ के स्टांप मंगाए जा रहे हैं. इसके बावजूद भी कालाबाजारी हो रही है. पिछले दिनों 500 और 1000 रुपए के स्टांप की किल्लत देखी गई. 1000 रूपए का स्टांप जिला कलेक्ट्रेट में नहीं है और 500 रुपए का स्टांप भी करीब 10 दिन बाद वेंडर्स के पास पहुंचा है. 

वेंडर्स को 500 रूपए के स्टांप भी सीमित संख्या में दिए गए हैं. ऐसे में वेंडर्स स्टांप को बाजार में बेचते नहीं है. उन्हें दबा कर बैठ जाते हैं. जब स्टांप की किल्लत नजर आती है तो महंगे दाम पर कालाबाजीर कर बेच देते हैं. वर्तमान में स्टांप की सप्लाई भी वेंडर्स को 10 दिन बाद की जा रही है. स्टांप की दर के अतिरिक्त वेंडर्स को 20 फ़ीसदी सर चार्ज भी देना होता है.

आपको बता दें कि सरकार वेंडर्स को स्टांप बेचने के लिए 1 प्रतिशत कमीशन भी देती है. डिकॉय टीम ने कालाबाजारी करते हुए छह मामले में तीन स्टांप विक्रेताओं के लाइसेंस निलंबित कर दिए हैं और तीन स्टांप विक्रेताओं से नोटिस देकर स्पष्टीकरण मांगा गया है सोचिए शपथ पत्र, पावर ऑफ अटर्नी समेत तमाम कामों के लिए ग्राहकों को पापड़ बेलने पड़ रहे हैं. ई-स्टाम्पिंग पर 1 साल से भी ज्यादा समय से रोक लगी हुई है. जिसका फायदा ट्रेजरी अफसरों से लेकर स्टाम्प विक्रेता तक उठा रहे हैं.