close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

राजस्थान उपचुनाव: गहलोत-पायलट, पूनिया-राजे या बेनीवाल कौन है कांग्रेस-BJP की जीत का असली हकदार!

सचिन पायलट ने पांच साल विपक्ष में रहते हुए पीसीसी चीफ के रूप में संघर्ष किया. बीजेपी की सरकार में चार सीटों पर हुए उपचुनाव से पायलट की परख शुरू हुई थी.

राजस्थान उपचुनाव: गहलोत-पायलट, पूनिया-राजे या बेनीवाल कौन है कांग्रेस-BJP की जीत का असली हकदार!
फाइल फोटो

जयपुर: राजस्थान में विधानसभा की दो सीट पर हुए उप चुनाव के नतीजे आ गए हैं. इन नतीजों में एक सीट कांग्रेस तो दूसरी एनडीए यानि बीजेपी-आरएलपी गठबंधन को गई है.

इस खबर की शुरूआत बधाई से करना वाजिब है. लिहाजा, सबसे पहले मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत को बधाई, फिर पीसीसी चीफ और उप-मुख्यमन्त्री सचिन पायलट को बधाई, आरएलपी के संयोजक हनुमान बेनीवाल को बधाई और साथ ही बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया को भी बधाई लेकिन यह बधाई इतनी अधूरी क्यों लग रही है? क्या इस बधाई में कुछ नाम छूट गए हैं? या फिर यह सब लोग इस बधाई के हकदार हैं ही नहीं? क्या इस बधाई में अरुण चतुर्वेदी का नाम भी आना चाहिए? क्या इस बधाई में चुनाव जीतने वाले आरएलपी के नारायण बेनीवाल और कांग्रेस की रीटा चौधरी का नाम भी आना चाहिए. या फिर इस बधाई में झुंझुनूं सांसद नरेन्द्र खीचड़ और विधानसभा चुनाव में खींवसर से कांग्रेस प्रत्याशी सवाई सिंह चौधरी का नाम भी आना चाहिए? आखिर इस बधाई में किस-किस का नाम लिया जाए और किसका नहीं? यह एक बड़ा सवाल है. आप सोच रहे होंगे कि जीत तो दोनों पक्षों के खाते में गई है. मुकाबला 1-1 से बराबर रहा है और इस नाते बधाई के हकदार भी दोनों पक्ष हैं लेकिन सवाल उठता है कि आखिर यह बधाई क्यों दी जाए? किसको दी जाए? और सवाल यह कि दी भी जाए या नहीं? 

सबसे पहले बात करते हैं मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत की
मुख्यमन्त्री ने पूरे चुनाव पर करीबी नज़र लगातार बनाए रखने की कोशिश की. हरेन्द्र मिर्धा को टिकिट मिलने के बाद पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा और पूर्व विधायक रिछपाल मिर्धा के साथ ही पूरे मिर्धाओं को एक खेमे में खड़ा कर दिया. मनमुटाव भुला कर मिर्धा उपनाम के सभी लोग एक साथ आ तो गए, लेकिन इसका असर कितना हुआ? क्या इस असर को जीत में बदला जा सकता था? क्या सभी ने दिल से हरेन्द्र मिर्धा को जिताने की कोशिश की? यह सवाल ऐसे हैं जो अब चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद जवाब मांगते हैं. 

इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने अपनी टीम के भरोसेमन्द नेताओं यानि हरीश चौधरी, लालचन्द कटारिया, धर्मेन्द्र राठौड़ जैसे नेताओं को लगातार वहां पर सक्रिय रहने के निर्देश दिए. सीएम के निर्देश पर काम भी हुआ, लेकिन क्या यह काम इस बधाई को सच्चे अर्थों में सार्थक बनाने के लिए किया जा सकता था? साथ ही एक सवाल यह भी कि हरेन्द्र मिर्धा के नामांकन की रैली में जाने के बाद पार्टी के बड़े चेहरे एक बार भी खींवसर के चुनावी समर में जनता के बीच क्यों नहीं गए? साथ ही सवाल यह भी कि मुख्यमन्त्री के निर्देश के बाद भी उप-मुख्य सचेतक महेन्द्र चौधरी और दूसरे नेताओं ने कितना दिल लगाकर काम किया? क्या कुछ नेताओं को इस बात की आशंका थी अगर हरेन्द्र मिर्धा जीत गए तो बड़े जाट नेता के कारण उन्हें ही मंत्रीमण्डल में तरजीह मिल सकती है? क्या आशंका यह भी रही होगी कि मिर्धा जीते तो फिर नागौर में कांग्रेस पार्टी की नेतागिरी और समाज की चौधराहट भी वही करेंगे? क्या इन आशंकाओं को वक्त रहते दूर कर लिया जाता तो खींवसर के नतीजे कुछ और हो सकते थे? लिहाजा कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों की तरफ से मुख्यमंत्री को मिलने वाली यह बधाई कितनी असली है और कितनी वाजिब? यह बहस का मुद्दा हो सकता है और आने वाले दिनों में संभवतया खुद मुख्यमंत्री इस पर मंथन करेंगे. ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूं क्योंकि जो लोग 'अशोक गहलोत स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स' यानि 'एजीएसपी' को जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि गहलोत किसी चीज को आसानी से भूलते नहीं हैं. हो सकता है बाद में मंथन के बाद खुद अशोक गहलोत को इस बात का अहसास हो कि खींवसर चुनाव में वक्त रहते वे अपनी आस्तीन झटक लेते तो यहां भी नतीजे उनके और उनकी पार्टी के पक्ष में ही आते.

पीसीसी चीफ और प्रदेश के उप-मुख्यमन्त्री सचिन पायलट
सचिन पायलट ने पांच साल विपक्ष में रहते हुए पीसीसी चीफ के रूप में संघर्ष किया. बीजेपी की सरकार में चार सीटों पर हुए उपचुनाव से पायलट की परख शुरू हुई थी. जिस परख में पायलट ने 3-1 से नतीजे दिए थे और तभी से कांग्रेस की एक पीढ़ी को उनमें संभावनाएं नज़र आने लगी थीं. संघर्ष कभी खुशी-कभी गम की तर्ज पर जारी रहा. यहां तक कि लोकसभा की दो सीटों पर हुए उपचुनाव में भी कांग्रेस ने दोनों संसदीय क्षेत्र के सभी 16 विधानसभा क्षेत्रों में क्लीन-स्वीप कर बड़ा मैसेज दिया. बाद में साल 2018 के विधानसभा चुनाव में भी सचिन पायलट के अध्यक्ष रहते कांग्रेस जीती भी और सरकार भी बनी. कांग्रेस की सरकार तो बनीं लेकिन पायलट सीएम की बजाय डिप्टी तक ही रह गए. उनके डिप्टी सीएम बनने के बाद प्रदेश में यह पहला उप-चुनाव था. लिहाजा पायलट को मिलने वाली बधाई पर भी वही बात लागू होती है जो सीएम अशोक गहलोत पर कांग्रेस के भीतर सवाल उठे तो चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में तो खुद बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने पूछ लिया कि आखिर सचिन पायलट और अशोक गहलोत मण्डावा क्यों नहीं आए? हालांकि पार्टी मंडावा सीट जीत गई है लेकिन पूनिया ने जो सवाल पूछा वहीं खींवसर पर भी लागू होता है. हरेन्द्र मिर्धा की नामांकन रैली के बाद सचिन पायलट शायद खींवसर की तरफ पांव करके भी नहीं सोये. ऐसे में सवाल यह है कि क्या पायलट को इस बात की बधाई दी जाए कि पार्टी को कम से कम एक सीट पर तो जीत मिली? लिहाजा पायलट के लिए भी फेस सेविंग नतीजे रहे क्योंकि पार्टी के ही लोग मानते हैं कि अगर कांग्रेस दोनों सीटें जीतती तो यह पूरी तरह मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थन में जाता और निकाय चुनाव में गहलोत एक बार फिर पायलट से ज्यादा पावरफुल कंसीडर किए जाते फिर चाहे वो टिकिट वितरण की बात होती या निकाय का मुखिया तय करने की. तो क्या इसीलिए चुनाव के नतीजों की संभावना पर सवाल पूछे जाने के दौरान यह कहा जाता रहा कि राज्य सरकार के कामकाज को देखते हुए जनता मतदान करेगी? क्या इसमें भी कोई राज़ की बात थी या फिर यह भी एक साधारण सा बयान था. खैर इसके पीछे मंशा चाहे जो रही हो, लेकिन पायलट को बधाई देने वाले कार्यकर्ता और उनके कैम्प के लोग मान रहे होंगे कि अब तो निकाय चुनाव में पायलट की बात को भी पीसीसी चीफ के रूप में पूरी तवज्जो मिलेगी. तो क्या, महज इसी बात से पायलट खुश हैं या उन्हें मिल रही बधाई के कुछ मायने भविष्य के गर्भ में भी छिपे हुए हैं?

अगली बधाई की बात जाट राजनीति के नए सितारे हनुमान बेनीवाल की 
हनुमान बेनीवाल यानि आरएलपी के संयोजक अब खुद तो नागौर से सांसद हैं और उनके भाई नारायण बेनीवाल खींवसर से विधायक यानि एक परिवार में दो-दो नेता और वह भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि जाटों के नए उभरते नेता के रूप में पहचान बनाने वाले इस नेता को भी चुनाव में जीत से पहले और जीत के बाद बधाईयां मिल रही हैं. क्या यह जीत वाकई में हनुमान बेनीवाल को बधाई देने के लिए पर्याप्त है? क्या वाकई हनुमान ने अपने भाई नारायण को विधायक बनवाकर इतना बड़ा काम किया है? या हनुमान थोड़ी कम मेहनत करते तब भी नारायण विधायक बन ही जाते? कुछ ऐसे ही सवाल इस जीत के बाद गूंज रहे हैं. वैसे तो नारायण के लिए काम करना और उनकी सेवा करना पौराणिक कथाओं में भी हनुमान का काम रहा है लेकिन यहां सेवा भाव से ज्यादा खुद हनुमान बेनीवाल की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ था यह मामला। टिकिट वितरण से पहले ही यह सवाल उठने लगे थे कि क्या हनुमान यहां परिवारवाद का मोह छोड़ पाएंगे? खैर परिवारवाद से दूर तो वे नहीं जा पाए लेकिन जब नारायण को टिकिट मिला तो कार्यकर्ताओं के साथ ही राजनीतिक प्रेक्षक भी मानने लगे कि नारायण को लोग हनुमान के मुकाबले ज्यादा पसन्द करते हैं क्योंकि वे हनुमान जितने कट्टर नहीं हैं. 

बोलने में भी नारायण सौम्य माने जाते हैं तो नागौर और खासतौर पर खींवसर में शादी-ब्याह या शोक और दूसरे सामाजिक कार्यक्रमों में नारायण बेनीवाल ही ज्यादा सक्रिय रहते हैं लेकिन ऐसा क्या हुआ जो खींवसर सीट पर आश्वस्त दिख रही आरएलपी और बीजेपी के नेताओं के चेहरों की हवाईंया मतगणना के दौरान उड़ती दिखाई दीं. शुरूआती रुझान में आरएलपी-बीजेपी का गठजोड़ पिछड़ा तो पार्टी के नेता बयान देने में भी मुंह छिपाने लगे. आरएलपी के लोग ही इस तरह की बातें करने लगे कि नारायण बेनीवाल के तो राजयोग है ही नहीं फिर भी हनुमान बेनीवाल ने भाई का साथ दिया. इस तरह की दुहाईयां दी जाने लगीं लेकिन बाद में राजयोग नहीं होने के दावे को खारिज करते हुए नारायण ने जीत दर्ज कर ही ली. कार्यकर्ताओं में जोश था, हनुमान बेनीवाल के चेहरे पर भी मुस्कान आई लेकिन क्या यह मुस्कान वाकई बेनीवाल को मिली बधाईयों के कारण थी या इस मुस्कान के पीछे वे अपनी दूसरी गम्भीर चिन्ता को छिपा रहे थे. आप सोच रहे होंगे कि जीत पर चिन्ता कैसी? तो जनाब चिन्ता इस बात की जो जीत से मिलने वाली बधाई पर सवाल उठाने वाली थी. हनुमान बेनीवाल चाहे बीजेपी के टिकिट पर चुनाव लड़े हों या निर्दलीय या फिर साल 2018 में आरएलपी के टिकिट पर. उनको मिलने वाले वोटों की गिनती हर बार बढ़ती गई. जीत का अन्तर भी बड़ा ही रहा. 

साल 2008 में बेनीवाल 24 हजार 453 वोट से जीते तो साल 2013 में जीत का अन्तर 23 हजार वोट से ज्यादा रहा. पिछली बार के चुनाव में कांग्रेस के सवाई सिंह ने बेनीवाल को मजबूत टक्कर देने की कोशिश की लेकिन यहां भी उन्होंने 16 हज़ार 948 वोट के अन्तर से कांग्रेस को चित किया लेकिन इस बार क्या हुआ? अब तो हनुमान बेनीवाल नागौर से सांसद भी हैं और लोकसभा चुनाव में इसी खींवसर सीट से उनको 55 हज़ार से ज्यादा वोटों की बढ़त भी मिली थी. तो क्या अब हनुमान का असर कम होने लगा है? क्या अब वो जाट नेता नहीं रहे? या फिर अब हनुमान के रवैये में लोगों को बदलाव दिख रहा है? दरअसल राजपूतों के विरोध पर अपनी राजनीति खड़ी करने वाले हनुमान बेनीवाल ने इस बार बीजेपी के साथ गठबंधन किया. इसके बाद से ही चुनाव प्रचार के दौरान बेनीवाल के मंच पर राजपूत नेताओं की भरमार दिखी. उनके पुराने कट्टर प्रतिद्वन्द्वी गजेन्द्र सिंह खींवसर विधानसभा में आमतौर पर उनका दिखावटी निशाना रहे राजेन्द्र राठौड़, केन्द्रीय मन्त्री गजेन्द्र सिंह शेखावत जैसे चेहरों ने हनुमान बेनीवाल की तारीफ़ की और नारायण बेनीवाल के लिए वोट मांगे. गजेन्द्र सिंह खींवसर के पुत्र धनन्जय का हनुमान के प्रति विरोध पहले भी जगजाहिर था लेकिन इस बार उन्हें भी बेनीवाल का गुणगान करना पड़ा. फिर भले ही यह मन-मारकर ही किया हो. मुझे ध्यान आता है कि लोकसभा चुनाव से पहले मैनें बेनीवाल से सवाल पूछा था और बीजेपी हुए गठबंधन से पहले बोलते हुए जवाब बेनीवाल ने कहा था कि बीजेपी का विरोध करने वाले सभी लोग उनके साथ आ सकते हैं.  उन दिनों देवीसिंह भाटी अपनी पार्टी के नेता अर्जुनराम मेघवाल के खिलाफ़ बोल रहे थे और जब भाटी को साथ लेने को लेकर बेनीवाल से पूछा गया तो उनके होठों पर फेविकॉल का जोड़ असर करता दिख रहा था. खैर चाहे जिस भी कारण से हो समाज में सौहार्द स्थापित होना अच्छी बात है और सदियों से चली आ रही जाट-राजपूत प्रतिस्पर्द्धा खत्म होती है तो यह राजस्थान के लिए अच्छे संकेत हैं लेकिन आरएलपी के ही खेमे में इस दोस्ती और गठबंधन को लेकर हनुमान बेनीवाल को चेताया गया. और चुनाव के दौरान उन्हें इस बात का अहसास भी हुआ. इसके साथ ही बेनीवाल पर सवाल यह भी उठे की अगर वे जाट समाज का भला चाहते हैं तो समाज को आगे बढ़ाने वाले पूर्व मुख्यमन्त्री वसुंधरा राजे पर निशाना क्यों साधते रहते हैं?
अब इस जीत के बाद बधाई की बात करें तो क्या बेनीवाल को इस बात की बधाई की उनका तिलस्म अब टूटने लगा है? शायद तभी तो 24,23 और 16 हज़ार जैसे बड़े अन्तर से जीतने वाले हनुमान अपने भाई को 5 हज़ार से भी कम अन्तर से जिता पाए. क्या उन्हें लोकसभा चुनाव में मिली 55 हज़ार से ज्यादा वोट की लीड में 50 हज़ार की सेंधमारी की बधाई दी जाए? या जाट राजनीति के उभरते सितारे को मिर्धा परिवार के एकजुट होने की बधाई दी जाए? या फिर बधाई इस बात की दी जाए कि वे समाज में यह बात स्थापित करना चाहते हैं कि रामेश्वर डूडी आरसीए अध्यक्ष नहीं बने तो अशोक गहलोत को जाट विरोधी बता दो और खुद ज्योति मिर्धा को चुनाव हरवाएं, हरेन्द्र मिर्धा के खिलाफ़ वोट मांगें, आरपीएससी के चैयरमेन और पूर्व सांसद सीआर चौधरी की टिकिट कटवा दें, तब भी समाज उन्हें ही जाटों का सच्चा पैरोकार और सर्व मान्य नेता माने? या बधाई इस बात की, कि बीजेपी नेता वसुंधरा राजे को तो हनुमान गाली देंगे और उनकी पार्टी को गले लगाकर अपना दोहरा रवैया उजागर करेंगे? सोचने वाली बात यह है कि क्या हनुमान खुद अपने आपको कौनसी बधाई के काबिल मानते हैं?

एक और बधाई की बात बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया को
बधाई के इस दौर में सतीश पूनियां का नाम छोड़ देना उनके साथ अन्याय होगा. असत्य पर सत्य की विजय के दिन यानि अहंकार पर विजय के प्रतीक दशहरे के दिन बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष के रूप में कमान संभालने वाले युवा नेता और पहली बार के विधायक सतीश पूनिया को भी पार्टी नेताओं ने उप-चुनाव के नतीजों पर बधाई दी. हालांकि, यह बात अलग थी कि गुरूवार को नतीजे नहीं भी आते तो उन्हें ज्यादा लोगों की और ज्यादा दिल से बधाई मिलती क्योंकि 24 अक्टूबर को ही उनका जन्मदिन भी था लेकिन जन्मदिन के रंग में उप चुनाव के नतीजों की बधाई भी मिली. चुनाव से पहले आरएलपी से गठबंधन का ऐलान करने के बाद नेताओं ने हनुमान बेनीवाल के साथ हाथ पकड़कर बीजेपी मुख्यालय पर फोटो खिंचवाए. विक्ट्री के निशान बनाये और दोनों सीटों पर अपनी जीत के दावे भी किये लेकिन नतीजों का दिन पार्टी के लिए उतना खुशनुमान नहीं था. अब नतीजों के बाद पूनिया को बधाई मिलने लगी तो कुछ समर्थक तो काफी देर तक यही समझते रहे कि उन्हें जन्मदिन की बधाईयां मिल रही हैं. बाद में चुनाव के नतीजों का पता लगा तो पार्टी के कार्यकर्ता ही आपस में बात करने लगे कि इन नतीजों पर सतीश पूनिया को बधाई किस बात की? क्या उन्हें इस बात की बधाई दी जाए कि पूर्व मुख्यमन्त्री और पूनिया की ही तरह कभी बीजेपी की प्रदेशाध्यक्ष रही वसुंधरा राजे को पानी पी-पी कर गालियां देने वाले हनुमान बेनीवाल के साथ पार्टी ने गठबंधन कर लिया? क्या उन्हें इस बात की बधाई दी जाए कि उन्होंने प्रचार के दौरान जिस मंडावा क्षेत्र में ज्यादा समय बिताया वहीं पार्टी को 33 हज़ार से ज्यादा अन्तर से हार का सामना करना पड़ा? या उन्हें इस बात की बधाई दी जाए कि मंडावा की चुनावी सभाओं में पूर्व सीएम वसुंधरा राजे का फोटो तक किसी पोस्टर में नहीं दिखा? या बधाई इस बात की दी जाए कि वे जिताऊ मानते हुए कांग्रेस की एक पंचायत समिति प्रधान को बीजेपी में लाए और उसे टिकिट दिलाकर पार्टी के मूल कार्यकर्ता को हतोत्साहित किया? दरअसल, प्रदेशाध्यक्ष के रूप में भी बीजेपी के मूल कैडर वाले कार्यकर्ता का प्रतिनिधि माने जाने वाले पूनिया के कार्यकाल में खींवसर और मण्डावा के कार्यकर्ताओं को बड़ा झटका लगा. अगर गठबंधन धर्म को देखें तो खींवसर में बीजेपी के कार्यकर्ता को तो अपने दिमाग की उन नसों को ही बांझ कर देना चाहिए जहां से विधानसभा चुनाव में पार्टी के टिकिट की सोच उपजती हो क्योंकि जो लोग हनुमान बेनीवाल को जानते हैं. वे यह भी जानते हैं कि विधायक पर जीतने के बाद नारायण बेनीवाल का टिकिट काटना या बदलना तब तक संभव नहीं. जब तक कि यह गठबंधन ही ना टूट जाए. तो सवाल यह कि क्या सतीश पूनिया ने इस चुनाव में पार्टी के मूल कार्यकर्ता के अधिकारों की बात की सही तरीके से पैरवी की भी या नहीं? इस सिलसिले के आखिर में पूनिया की बधाई पर एक सवाल यह भी कि पूनिया को किस हासिल पर यह बधाई दी जाए? आखिर इस चुनाव में उन्होंने पार्टी को ऐसा क्या दिला दिया जो उन्हें बधाई दी भी जाए?

इस चुनाव के चार बड़े चेहरों को तो बधाई दी जा चुकी है लेकिन कुछ बधाई ऐसी भी है जो अनदेखी है. इनमें सबसे बड़ा नाम आता है वसुंधरा राजे का. जी हां पूर्व मुख्यमन्त्री वसुंधरा राजे का नाम जो सतीश पूनिया के पदभार ग्रहण कार्यक्रम यानि विजय दशमी के दिन 'किसी विशेष अनुष्ठान के बाद' धौलपुर महल में ब्राह्मणों को भोजन कराने के चलते कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाईं. यह वही वसुंधरा राजे हैं जिन्हें पार्टी दो बार की मुख्यमन्त्री और दो बार की प्रदेशाध्यक्ष तो मानती हैं लेकिन उप-चुनाव में खींवसर या मण्डावा में प्रचार के लिए बुलाना भी मुनासिब नहीं समझती. अब चुनाव के इन नतीजों से बीजेपी को क्या हासिल हुआ और खींवसर में चुनाव के कम अन्तर के बाद तो शायद वसुंधरा कैम्प असली बधाई तो अपनी मैडम को ही दे रहा होगा.