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राजस्थान: निकाय चुनाव में मजबूती से उतरने की तैयारी में माकपा, पार्टी विधायक ने कहा...

माकपा विधायक दल के नेता बलवान पूनिया कहते हैं कि अब पार्टी केवल गांवों तक अपना दायरा सीमित रखने की पहचान से उबरने की कोशिश में है.

राजस्थान: निकाय चुनाव में मजबूती से उतरने की तैयारी में माकपा, पार्टी विधायक ने कहा...

जयपुर: प्रदेश में विधानसभा की दो सीटों पर उप-चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है लेकिन इसके इतर ज्यादातर निगाहें प्रदेश के 52 स्थानीय निकायों में होने वाले चुनावों पर भी लगी हुई हैं. उप चुनाव में तो सीधे तौर पर कांग्रेस-बीजेपी और आरएलपी ही सक्रिय दिखाई देंगी लेकिन निकाय चुनाव में क्षेत्रीय दलों के साथ ही माकपा जैसी पार्टियां और निर्दलीय भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश करेंगे. माकपा ने तो इस बार शहरी निकायों में अपनी पकड़ बनाने के लिए रणनीतिक तौर पर काम करना शुरू भी कर दिया है. 

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस बार विधानसभा चुनाव में पार्टी का सूखा खत्म कर दिया. पिछली बार यानि साल 2013 के चुनाव में विधानसभा से बाहर रही पार्टी ने 2018 के चुनाव में दो सीटें जीतीं. हालांकि इस बार भी पार्टी के धुरन्धर अमराराम और पूर्व विधायक पेमाराम जैसे नेता प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत में नहीं पुहंच पाए लेकिन अबकी बार मोर्चा बलवान पूनिया और गिरधारी मईया जैसे नेताओ के हाथ में है. 

विधानसभा क्षेत्रों के साथ ही माकपा समय-समय पर ग्रामीण क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती आई है लेकिन इस बार पार्टी का दायरा बढ़ाने के लिए सीपीएम ने शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में भी प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर ली है. इस बार 52 निकायों में चुनाव होने हैं और माकपा नेता बलवान पूनिया ने संकेत दिए हैं कि इस बार उनकी पार्टी निकाय चुनावों में भी अपना असर दिखाएगी. 

हालांकि, माकपा शहरी निकायों में चुनाव लड़ने की तैयारी तो कर रही है लेकिन पार्टी के लिए यह राह इतनी आसान नहीं होगी. कम से कम पिछले दो चुनावों के रिकॉर्ड पर नज़र डालें तो सीपीएम का प्रदर्शन 'बिलो-स्टैण्डर्ड' ही माना जएगा. आम आदमी और सर्वहारा की बात करने वाली पार्टी को शहरी निकायों के चुनाव में जनता ने दोनों ही बार अच्छा रेस्पॉन्स नहीं दिया.

निकाय चुनाव में ताल ठोकने की तैयारी में जुटी माकपा के नेता हौंसले तो जता रहे हैं लेकिन पिछले दो चुनावों में वोट प्रतिशत के मामले में पार्टी प्रदर्शन बेहद लचर रहा है. साल 2009 के चुनाव में सीपीएम ने 46 स्थानीय निकायों के चुनाव में आधे फीसदी से भी कम वोट हासिल किए थे. पार्टी का वोट फीसदी ज़ीरो पॉइन्ट चार दो फीसदी रहा. इस साल पार्टी को 14 हज़ार 543 वोट मिले. जबकि कांग्रेस को 13 लाख 16 हज़ार 645 वोट और बीजेपी को 12 लाख 15 हज़ार 294 वोट मिले. साल 2009 में निर्दलीय प्रत्याशियों ने 8 लाख 90 हज़ार 610 वोट हासिल किए थे.  

साल 2014 में माकपा ने फिर कोशिश की लेकिन पार्टी की हालत पहले के मुकाबले और ज्यादा खराब रही. वोट प्रतिशत 2009 के मुकाबले आधा रह गया और यह ज़ीरो पॉइन्ट दो एक फीसदी पर ही अटक गया. इस साल पार्टी को महज 8 हज़ार 949 वोट ही मिले थे जबकि कांग्रेस को 12 लाख 88 हज़ार 245 वोट और बीजेपी को 17 लाख 54 हज़ार, 963 वोट मिले थे. माकपा से ज्यादा वोट तो निर्दलीय और नोटा ने ही हासिल कर लिये थे. इस बार निर्दलीय को 11 लाख 9 हज़ार 425 वोट और नोटा को 53 हज़ार 768 वोट मिले थे. 

माकपा को मिले बेहद कम वोट प्रतिशत में एक गौर करने वाली एक बात यह भी थी कि पार्टी ने दमदार तरीके से चुनावी मैदान में उपस्थिति भी दर्ज नहीं कराई. दस साल पहले के चुनाव में पार्टी ने 26 महिला प्रत्याशियों के साथ कुल 62 प्रत्याशी ही मैदान में उतारे तो साल 2014 में यह संख्या केवल 46 तक ही सीमित रह गई. सीट जीतने की बात करें तो साल 2009 में पार्टी ने तीन वार्ड में जीत दर्ज की जबकि पिछली बार 2014 के चुनाव में यह आंकड़ा एक और कम हो गया. हालांकि, माकपा विधायक दल के नेता बलवान पूनिया कहते हैं कि अब पार्टी केवल गांवों तक अपना दायरा सीमित रखने की पहचान से उबरने की कोशिश में है. पूनिया कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में छात्र संघ चुनावों में भी पार्टी ने अपनी उपस्थिति युवाओं के बीच प्रभावी तरीके से दर्ज कराई है.

उधर माकपा की इन कोशिशों को कांग्रेस-बीजेपी जैसी पार्टियां ज्यादा तवज्जो देना मुनासिब नहीं समझती. बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया कहते हैं कि सौ साल पहले माकपा की जो लड़ाई शुरू हो गई थी. वह आज उसी जगह पर आकर थमती दिख रही हैं.