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राजस्थान: चाइनीज सामान की वजह से कम हुआ मिट्टी के दियों का क्रेज

सांभर लेक में कई परिवारों ने कम आमदनी होने के चलते मिट्टी के बर्तन बनाने बंद कर दिए. युवा कारिगरों का कहना है कि वो चार पीढ़ियों से पुश्तैनी काम कर रहे थे लेकिन अब कोई फायदा नहीं मिलता है.

राजस्थान: चाइनीज सामान की वजह से कम हुआ मिट्टी के दियों का क्रेज
दीपकों का इस्तेमाल लोग अब महज पूजा के लिए ही करने लगे हैं.

अमित यादव, जयपुर: दूसरे घर को रौशन करने वाले कुम्हारों के घर हर दीवाली में अंधेरा रहता है. बाजार में चाइनीज लाइट्स ने दीपक के वजूद को खत्म सा कर दिया है. ज़ीने की पैकड़ियों और छतों की मुंडेरों पर दीपक नहीं चाइनीज लाइटें बैठ गई हैं. जिसने दियों की रोशनी को मध्यम कर दिया है और कुम्हार की जिन्दगी से रौशनी निकलती रही. सर्दियों में मिट्टी के बर्तनों की डिमांड घटने के बाद दीपावली के सीजन में अपनी दियों से अपनी जीविका चलाते थे लेकिन लाखों की संख्या में मिट्टी के दीपक बनाने वाले ये परिवार अब हजारों की संख्या में ही दीपक बनाकर अपने परिवार की गाड़ी खींच रहे हैं. कुम्हार का चाक किसी तेज रफ्तार से चक्कर काटता है लेकिन इनकी ज़िन्दगी की पत्थर सी ठहर गई है.

चाइनीज लाइट्स की चकाचौंध में मिट्टी से बने दियों से लोग धीरे धीरे दूर होते गए. जिस हिसाब से इसमें मेहनत और पैसा लगता है. उस तरह से कुम्हारों को फायदा नहीं मिलता है. यही वजह है कि कुम्हारों का ये व्यवसाय सिर्फ दीपावली और गर्मियों तक ही सीमित रह गया है. बाकी दिनों में चाक की रफ्तार पर बेड़ियां पड़ जाती है. 

सांभर लेक में कई परिवारों ने कम आमदनी होने के चलते मिट्टी के बर्तन बनाने बंद कर दिए. युवा कारिगरों का कहना है कि वो चार पीढ़ियों से पुश्तैनी काम कर रहे थे लेकिन अब कोई फायदा नहीं मिलता है. अगले बरस ये काम छोड़ देंगे. इस काम से अच्छी तो मजदूरी है. जिसमें तीन-चार सौ रुपये रोज मिल जाते हैं. 

दीपकों का इस्तेमाल लोग अब महज पूजा के लिए ही करने लगे हैं. जिससे कुम्हारों का ये व्यापार पूरी तरह ठप्प हो गया है. सांभर लेक में किसी समय दो दर्जन परिवार मिट्टी के बर्तन बनाते थे लेकिन अब सिर्फ दो ही परिवार इस कारीगरी को जीवित रखने में अपने पूरे परिवार के साथ में लगे हुए हैं. भारतीय संस्कृति की प्रतीक मिट्टी के बर्तन बनाने का सिलसिला सदियों से चल रहा आ रहा है. कड़ी मशक्कत के बाद भी वाजिब दाम नहीं मिलने से कुम्हार अब अपना पैतृक व्यवसाय छोड़ने को मजबूर है क्योंकि इससे परिवार का गुजर बसर मुश्किल हो गया.