राजस्थान: दम तोड़ चुके लोक सेवा गारंटी अधिनियम को लेकर गहलोत सरकार का सख्त रुख

कांग्रेस शासन में 14 नवंबर, 2011 को राजस्थान लोक सेवा प्रदान करने की गारंटी अधिनियम-2011 को लागू किया गया था. सरकार ने 25 विभागों की 221 सेवाओं को इस कानून के दायरे में शामिल किया है. 

राजस्थान: दम तोड़ चुके लोक सेवा गारंटी अधिनियम को लेकर गहलोत सरकार का सख्त रुख
फाइल फोटो

जयपुर: राजस्थान में जिस मकसद के साथ लोक सेवा गारंटी अधिनियम को शुरू किया गया था वह मकसद दम तोड़ चुका है. सरकारी अफसरों की उदासीनता और सरकारी तंत्र के ढुलमुल रवैए के चलते सरकारी दफ्तरों में आम आदमी की सुनवाई नहीं हो रही है. यही वजह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मंत्रियों के आवास से लेकर पीसीसी में होने वाली जनसुनवाई में आम आदमी सामान्य कामों की समस्या लेकर पहुंच रहे हैं. 2011 में गहलोत सरकार ने ही इस अधिनियम को शुरू किया था और इसकी पालना को लेकर भी अब गहलोत सरकार सख्त रुख अपनाने जा रही है.

इस अधिनियम को लागू करने के पीछे मकसद था आमजन को सरकारी दफ्तरों में अपने सामान्य कामों के लिए परेशान नहीं होना पड़े और सरकारी अधिकारी कर्मियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके लेकिन 2013 में बनी भाजपा सरकार में इस योजना ने दम तोड़ दिया. सरकारी तंत्र के लचर होने के चलते नागरिकों को परेशानी उठानी पड़ रही है. यही वजह है कि इन दिनों राजस्थान सरकार के मंत्रियों के आवास और पीसीसी में चल रही जनसुनवाई में भारी भीड़ नजर आ रही है. परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास का मानना है कि राजस्थान में जिस मकसद और उद्देश्य के साथ लोक सेवा गारंटी अधिनियम शुरू किया गया था वो पटरी से उतर गया है. उसे अब पटरी पर वापस लाना होगा. इसके लिए राजस्थान की गहलोत सरकार बेहद गंभीर है और अधिकारियों और कर्मियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कड़ा रुख अपनाने जा रही है.

कांग्रेस शासन में 14 नवंबर, 2011 को राजस्थान लोक सेवा प्रदान करने की गारंटी अधिनियम-2011 को लागू किया गया था. सरकार ने 25 विभागों की 221 सेवाओं को इस कानून के दायरे में शामिल किया है. राजस्थान में लोक सेवा गारंटी अधिनियम के लागू होने के बाद भी पिछले सात सालों में अफसरों ने इस कानून की जमकर धज्जियां उड़ाई हैं. इन सात सालों में समय पर काम नहीं होने की 6 करोड से अधिक शिकायतें सरकार के पास पहुंचीं हैं. इनमें से अभी भी 1 लाख से अधिक शिकायतें पेंडिंग है. 

मुख्यमंत्री आवास पर भी जनसुनवाई में होने वाली बड़ी तादाद यह बताती है कि उपखंड जिला और संभाग स्तर पर सरकारी महकमों में नागरिकों के प्रति अधिकारियों और कर्मी उदासीनता भरते हुए हैं. सरकार के मंत्रियों ने भी इस समस्या को मुख्यमंत्री के समक्ष रखा है. ऐसे में गहलोत सरकार इस अधिनियम के तहत सरकारी अधिकारी कर्मियों के खिलाफ जुर्माने की प्रक्रिया में शक्ति बरस सकती है.

इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है कि पर्याप्त मॉनिटरिंग के अभाव में लोक सेवा गारंटी अधिनियम राजस्थान में दम तोड़ चुका है. अपने मूल स्वरूप से भटक चुका है और जो लाभ आम आदमी को इसका मिलना चाहिए था वो नहीं मिल रहा है. सरकारी तंत्र में इतने सुराख हैं कि अधिकारियों ने इस अधिनियम से भी निपटने के तरीके ढूंढ लिए हैं. ऐसे में अगर गहलोत सरकार ना केवल सख्त रवैया दिखाती है बल्कि कड़ाई से उसकी पालना करवाती है तो इस बात की संभावना है कि इस अधिनियम का असल मकसद पूरा हो सकेगा.