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राजस्थान: मुहर्रम पर जयपुर और बीकानेर में निकाले गए सोने-चांदी के ताजिये

इस्‍लामी मान्‍यताओं के अनुसार इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था. यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था. 

राजस्थान: मुहर्रम पर जयपुर और बीकानेर में निकाले गए सोने-चांदी के ताजिये
गुलाबी नगरी जयपुर में भी सोने और चांदी के ताजिये निकाले जाते हैं.

रोहित शर्मा, जयपुर: देश में मुस्लिम समुदाय द्वारा मंगलवार को मुहर्रम (Moharram) मनाया गया था. जगह जगह ताज़िये निकाले गए थे. इस दौरान बीकानेर का एक ताजिया खास सुर्खियों में रहा. जो सोने से बनाया गया है. कई महीनों की कड़ी मेहनत के बाद कई कलाकारों ने मिलकर इस पर सोने की नक्काशी की है. जिस पर कुरान की आयतें और कर्बला के मैदान की दास्तां को अरबी और उर्दू में लिखा गया है. 

कलाकारों का दावा है कि इस ताजिए को बनाने के लिए करीब एक किलो सोने का इस्तेमाल किया है यानी इस ताज़िये की क़ीमत लाखों में है. इधर राजधानी जयपुर में पिछले 250 साल से ताजिये निकाले जा रहे हैं. जयपुर में ताजियेदार सालभर मेहनत करके ताजिये तैयार करते हैं. गुलाबी नगरी जयपुर में भी सोने और चांदी के ताजिये निकाले जाते हैं. साथ ही इस बार ताजिये हेरिटेज लुक में निकाले गए हैं. इन ताजियों को देखने के लिए देशी विदेशी पर्यटक भी पहुंचते है.

क्‍यों मनाया जाता है मुहर्रम?
इस्‍लामी मान्‍यताओं के अनुसार इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था. यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था. वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं. लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था. पैगंबर-ए इस्‍लाम हजरत मोहम्‍मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था. जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था. वो मुहर्रम का ही महीना था.

कैसे मनाया जाता है मुहर्रम?
मुहर्रम खुशियों का त्‍यौहार नहीं बल्‍कि मातम और आंसू बहाने का महीना है. शिया समुदाय के लोग 10 मुहर्रम के दिन काले कपड़े पहनकर हुसैन और उनके परिवार की शहादत को याद करते हैं. हुसैन की शहादत को याद करते हुए सड़कों पर जुलूस निकाला जाता है और मातम मनाया जाता है. मुहर्रम की नौ और 10 तारीख को मुसलमान रोजे रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत की जाती है. वहीं सुन्‍नी समुदाय के लोग मुहर्रम के महीने में 10 दिन तक रोजे रखते हैं. कहा जाता है कि मुहर्रम के एक रोजे का सबाब 30 रोजों के बराबर मिलता है.