राजस्थान में अटकी भगवान की साढ़े आठ करोड़ की 'उधारी', देवस्थान वसूलने में हुआ फेल!

विभागीय अधिकारियों और निरीक्षकों की ओर से सम्पत्तियों का निरीक्षण और देखरेख की जाती है लेकिन ना तो देवस्थान विभाग की संपत्तियों की देखरेख हो पा रही है ना ही उधारी वसूलने में अफसर रूचि दिखा रहे हैं. 

राजस्थान में अटकी भगवान की साढ़े आठ करोड़ की 'उधारी', देवस्थान वसूलने में हुआ फेल!
इन संपत्तियों पर बरसों से एक ही घर या परिवार के सदस्य काबिज हैं.

जयपुर: राजस्थान सहित अन्य छह राज्यों में भगवान की साढ़े आठ करोड़ की 'उधारी' अटकी हुई है. सुनने में भले ही अजीब लग रहा होगा लेकिन ये सच है. प्रदेश के सरकारी मंदिरों की देखरेख करने वाले देवस्थान विभाग के अधीन राजस्थान हीं नहीं बल्कि छह राज्यों में संपत्तियां है. राजस्थान से बाहर उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र में सम्पत्तियां हैं जिनकी देखरेख देवस्थान विभाग करता है. इन संपत्तियों पर जमे किरायदारों पर साढ़े आठ करोड़ से ज्यादा का किराया बाकी है.

कभी भगवान के भोग का टोटा तो कभी कर्मचारियों के वेतन को लेकर माली हालत खराब बताने वाला देवस्थान विभाग खुद की उधारी वसूलने में नाकाम साबित हो रहा है. राजस्थान सहित छह राज्यों में किराएदारों पर करीब साढ़े आठ करोड रूपए की 'उधारी' भगवान की अटकी हुई है. राज्य के बाहर स्थित मंदिरों और परिसम्पत्तियों की व्यवस्था के लिए सहायक आयुक्त, ऋषभदेव और उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, दिल्ली में स्थित मंदिरों एवं परिसम्पतियों की व्यवस्था के लिए सहायक आयुक्त वृन्दावन को नियुक्त कर रखा है जबकि इनकी सहायता के लिए प्रबंधक, पुजारी, चौकीदार जैसे कई कर्मचारी नियुक्त कर रखे हैं. 

विभागीय अधिकारियों और निरीक्षकों की ओर से सम्पत्तियों का निरीक्षण और देखरेख की जाती है लेकिन ना तो देवस्थान विभाग की संपत्तियों की देखरेख हो पा रही है ना ही उधारी वसूलने में अफसर रूचि दिखा रहे हैं. दरअसल, देवस्थान विभाग के अधीन सम्पतियों को किराए पर देने की किराया नीति 6 जून 2000 को बनी थी. इसी के तहत सम्पत्तियां किराए पर दी जाती हैं. 

विभाग के निरीक्षक और प्रबंधक की ओर से प्रतिमाह किराए का मांग पत्र दिया जाकर किराया वसूली की जाती है. भुगतान में चूक करने पर सम्पत्तियों को खाली करवाने के संबंध में राजस्थान सार्वजनिक भू-गृहादि, अप्राधिकृत अधिवासियों की बेदखली अधिनियम 1964 के तहत कार्रवाई करने का प्रावधान है. साथ ही किराया राशि में वृद्धि के लिए किराया नीति दिनांक 2000 के अनुसार प्रति तीन वर्ष बाद 15 प्रतिशत बढ़ाया जाता है.

प्रदेश के देवी देवताओं के पास अरबों रुपए की बेशकीमती संपत्ति है. इसके बाद भी देवों को न तो पर्याप्त भोग प्रसाद मिल रहा है और न ही उनकी खुद की संपत्ति का वाजिब किराया. देवस्थान विभाग के पास प्रदेश में किराए योग्य कुल 2 हजार 90 संपत्ति हैं. इनमें से 1953 बरसों से किराए पर चल रही हैं और 137 संपत्ति कानूनी विवाद या अन्य कारणों से खाली पड़े हैं. देवस्थान विभाग की अरबों रुपए की संपत्ति को औने पौने दामों में किराए पर देने के मामले में देवस्थान मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने कहा कि जल्द ही इन संपत्तियों का ऑडिट करवाकर इन्हें नए सिरे से किराए पर देने की योजना बनाई जा रही है. अभी विभाग को इन संपत्तियों के किराए से करीब 4 करोड़ रुपए सालाना ही मिल रहे हैं. 

राजस्थान हाईकोर्ट में डीबी सिविल रिट पिटिशन संख्या 752/2016 के तहत जनहित याचिका सुमोटो नोटिस बनाम राजस्थान सरकार व अन्य विचाराधीन है. जिसमें न्यायालय ने 22 मई 2017 से विभाग की किराया नीति को स्थगित करते हुए नई नीति प्रस्तावित करने के निर्देश दिए. जिसकी अनुपालना में नवीन किराया नीति 2019 का प्रारूप तैयार कर लिया गया है, जो विचाराधीन है. जोधपुर जिले में 367 संपतियों से 70 लाख रुपए सालाना और जयपुर जिले में 344 संपत्तियों से सालाना एक करोड़ 12 लाख रुपए किराया मिलता है. इन संपतियों में धर्मशाला, होटल, मंदिर, दुकान और सराय सहित कई तरह की संपत्ति शामिल हैं. पूरे प्रदेश में देवस्थान विभाग की 544 आवासीय और 1498 व्यावसायिक संपत्ति हैं. भरतपुर जिले में देवस्थान विभाग की कुल 464 संपत्ति हैं इनमें से 452 किराए पर चल रही हैं और शेष 12 अभी खाली पड़ी हैं. इनसे देवस्थान विभाग को सालाना 55 लाख रुपए किराए के तौर पर मिलते हैं. इनमें आवासीय और व्यावसायिक दोनों तरह की संपति शामिल हैं.

बहरहाल, इन संपत्तियों पर बरसों से एक ही घर या परिवार के सदस्य काबिज हैं. किराया भी इनसे नाम मात्र का लिया जा रहा है जबकि संबंधित क्षेत्र की आवासीय और व्यावसायिक किराए की दर ली जा रही दर से दस गुना तक ज्यादा है. कई संपत्तियों उनके किराएदार अदालत के आदेश पर नाम मात्र का किराया ही दे रहे हैं. किस संपत्ति का कब से किराया निर्धारित, कितने समय से किराया नहीं बढ़ाया गया इस पर भी रिपोर्ट मांगी गई है. यही नहीं विभाग अब जल्द ही इन संपत्तियों का और इनसे मिलने वाले संभावित किराए का मूल्यांकन भी करवाएगा ताकि विभाग को समुचित राजस्व मिल सके.