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वैज्ञानिकों ने फसलों के लिए बनाई नई तकनीक, 21 दिन तक ताजा रह सकेंगी फल-सब्जी

मौसम की मार झेल रहे किसानों के लिए ये तकनीक किसी तोहफे से कम नहीं है. वहीं इस तकनिक को तैयार करना और इस कार्य में सफलता पाना वैज्ञानिकों के लिए इतना आसान नहीं था.

वैज्ञानिकों ने फसलों के लिए बनाई नई तकनीक, 21 दिन तक ताजा रह सकेंगी फल-सब्जी
ये नेनो फॉर्मूलेशन पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल है. जिसके कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं.

उदयपुर: महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक का इजाद किया है जो किसानों के लिए वरदान साबित होने वाला है. दरअसल, किसान खेतों में अपना पसीना बहा कर जितनी सब्जियां पैदा करता है उसका 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा तुड़ाई से लेकर बाजार में आने तक खराब हो जाता है. जो किसानों के साथ देश के लिए भी नुकसान देह साबित हो रहा है. किसानों को इसी समस्या से निजात दिलाने के लिए उदयपुर के महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नेनो कवच का आविष्कार किया है. जो 21 दिन तक फल और सब्जियों को ताजा रखने में कारगर साबित होगा.

क्या है नेनो फॉर्मूलेशन
दरअसल, ये नेनो फॉर्मूलेशन पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल है. जिसके कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं. विश्विविद्यालय के मॉलिक्यूलर बायोलॉजी एवं बायोटेक्नोलॉजी विभाग और हॉर्टिकल्चर विभाग के वैज्ञानिकों ने फल-सब्जियों को ताजा रखने के लिए सुक्ष्म जैव घटकों की यह नेनो टेक्नॉलाजी विकसित की है. बायोडिग्रेडेबल पॉलीमर एवं कैल्शियम कॉपर से तैयार किया गया बारिक पाउडर पानी में घोल फल और सब्जियों को इसमें धोया जाए तो वह फंगस और बैक्टिरिया से सुरक्षित हो जाती हैं. जिससे उन्हें 21 दिनों तक ताजा रखा जा सकता है. विश्वविद्यालय के अनुसंधान केन्द्र ने इस तकनीक को भारतीय पेटेंट जर्नल के सितम्बर महीने के अंक में प्रकाशित भी किया जा चुका है.

ये थी वैज्ञानिकों की मेहनत
मौसम की मार झेल रहे किसानों के लिए ये तकनीक किसी तोहफे से कम नहीं है. वहीं इस तकनिक को तैयार करना और इस कार्य में सफलता पाना वैज्ञानिकों के लिए इतना आसान नहीं था. करीब दो साल की कड़ी मेहनत के बाद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को इस तकनीक को इजाद करने में सफलता मिली. पहले चरण में वैज्ञानिकों ने इसे टमाटर के ऊपर प्रयोग किया, जिसमें उन्हें टमाटर को 21 दिन तक ताजा रखने में सफलता मिली. अगले चरण में स्ट्रॉबेरी और अंगूर पर इस नेनो टैक्नोलोजी का प्रयोग किया जाएगा.

अंतर्राष्ट्रिय स्तर पर मिला प्रोत्साहन
आपको बता दें कि वैज्ञानिकों को मिली इस सफलता के बाद ईरान ने भी इस प्रोजेक्ट में रूची दिखाई है. इसके बाद विश्वविद्यालय को भारत और ईरान के डिपार्टमेंट आफ बायोटेक्नोलॉजी ने संयुक्त रूप से आगे के अनुसंधान के लिए वित्तीय सहायता के लिए चुना है. ऐसे में अब दोनों देशों के वैज्ञानिक इस पर और अधिक अनुसंधान करेगें. वहीं इन्ही नए आयामों और आविष्कारों के जरिए प्रदेश का कृषि महकमा नई सफलता की कहानी भी लिखेगा.