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विधानसभा चुनाव से पहले शिवसेना के बदले सुर, कहा- 'अगला सीएम हमारी पार्टी का होगा'

'शिवसेना का वट वृक्ष आज पल्लवित हो चुका है. महाराष्ट्र में उसकी जड़ें मजबूत होकर पैâलीं और उसकी शाखाएं दिल्ली के तख्त तक पहुंचीं. मराठी माणुस आज दुनिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.'

विधानसभा चुनाव से पहले शिवसेना के बदले सुर, कहा- 'अगला सीएम हमारी पार्टी का होगा'

मुंबईः लोकसभा चुनाव में बीजेपी की शानदार जीत के बाद महाराष्ट्र में पार्टी की सबसे बड़ी सहयोगी शिवसेना अब आने वाले विधानसभा चुनावों में अपना सीएम बनाने की बात कह रही है. शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में लिखा है कि आने वाले चुनावों में राज्य में शिवसेना का सीएम होगा. पार्टी ने कहा है कि शिवसेना का भले ही बीजेपी के साथ गठबंधन हो लेकिन शिवसेना अपने ही तेवर वाला संगठन है और संकल्प के साथ यह पार्टी आगे बढ़ी है. पार्टी ने सामना में लिखा, 'शिवसेना मतलब क्या? यह महाराष्ट्र और देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को गत 53 वर्षों में इसका अनुभव आ चुका है. मराठी माणुस और हिंदुत्व के लिए 19 जून को सौभाग्य दिवस माना जाना चाहिए.

पार्टी ने लिखा, '19 जून के दिन शिवसेना नामक एक तूफान का जन्म हुआ. तूफान और बवंडर अक्सर आते-जाते रहते हैं लेकिन शिवसेना नामक तूफान गत 52-53 वर्षों से लगातार उफान पर है. कम-से-कम नई पीढ़ी को शिवसेना की स्थापना का इतिहास समझ लेना चाहिए. स्थापना के समय का उग्र माहौल आज महाराष्ट्र में नहीं है. मुंबई की लड़ाई और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन जैसे विषयों से जिसका संबंध नहीं है, ऐसी पीढ़ी आज राजनीति में है. इसलिए जिस मराठी अस्मिता के लिए शिवसेना की स्थापना हुई और शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने जीवन के 50 वर्षों की आहूति दी, उस त्याग, संघर्ष और उतार-चढ़ाव को नई पीढ़ी ने नहीं देखा है. लेकिन शिवसेना ने चार पीढ़ियां बनाईं और शिवराज का भगवा पिछली पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक जा रहा है, यह महत्वपूर्ण है.'

पार्टी ने अपने लेख में आगे लिखा है, 'शिवसेना का वट वृक्ष आज पल्लवित हो चुका है. महाराष्ट्र में उसकी जड़ें मजबूत होकर फैलीं और उसकी शाखाएं दिल्ली के तख्त तक पहुंचीं. मराठी माणुस आज दुनिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. हिंदुस्थान स्वाभिमानी है. यह देश हिंदू संस्कार और संस्कृति का रक्षक है, ऐसा व्यापक तत्वज्ञान स्वीकार करके मराठीपन का जतन करनेवाले शिवसैनिक हैं. शिवसेना का सामर्थ्य सत्ता-पद नहीं, बल्कि आंदोलन में है. आंदोलन ही शिवसेना की आत्मा है.'

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'यह आंदोलन जिस प्रकार मराठी अस्मिता, महाराष्ट्र और हिंदुओं के स्वाभिमान के लिए हुआ उसकी अपेक्षा यह आंदोलन जनता के जीने-मरने के मुद्दों पर ज्यादा हुआ. शुरुआती दौर में महंगाई के विरोध में बेलन मोर्चा, पानी के लिए हंडा मोर्चा, गेहूं-चावल और तेल के लिए आंदोलन हुए. ये आंदोलन अब किसानों के लिए हो रहे हैं लेकिन उसके साथ ही राज्य में पड़े अकाल के बाद जल वितरण, चारा छावनियां और अन्न छत्र जैसे समाज कार्य भी हो रहे हैं. शिवसेना की राजनीति में समाजनीति होने के कारण ही हम 53 वर्षों तक डटे हुए हैं.'

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शिवसेना ने लिखा, 'इस पार्टी ने भूमिपुत्रों के न्याय-अधिकार की लड़ाई लड़ी. संयुक्त महाराष्ट्र की लड़ाई मराठी अस्मिता की थी. मुंबई मिल गई. उस मुंबई के मराठी माणुस के अस्तित्व, रोजी-रोटी और रोजगार के मुद्दे शिवसेना ने उठाए, तो क्या हो गया. शिवसेना प्रमुख पर ऐसे वार और घाव हुए कि अपने लोगों के पक्ष में खड़ा होना ही अपराध हो गया.आज पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी शिवसेना की ही भूमि पुत्रों वाली नीति अपना रही हैं. दक्षिण के कई राज्य और पार्टियां क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति कर रही हैं. राष्ट्रीय पार्टियां भी क्षेत्रीय पार्टियों से युति और आघाड़ी करके अपनी संख्या बल बढ़ा रही हैं. '

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शिवसेना प्रमुख ने क्षेत्रीय अस्मिता का विचार रखा, जिसे देश ने स्वीकार किया और उन्होंने हिंदुत्व का बीजारोपण किया वे भी अंकुरित हुए. देशभर में हिंदुत्व को जगाने का काम शिवसेनाप्रमुख ने किया. शिवसेनाप्रमुख का हिंदुत्व शिखा-जनेऊ और मंदिरों में घंटा बजाने तक सीमित नहीं था. उनकी नीति सर्वसमावेशक थी. राष्ट्रद्रोही किसी भी धर्म के हों, उन्हें इस देश में रहने का अधिकार नहीं है, ये है उनका हिंदुत्व. राष्ट्र के सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिमा की अंतिम यात्रा निकालने वालों और समान नागरिक कानून की होली जलानेवाले जातिवादियों को इस देश में रहने का अधिकार नहीं, ऐसा बेबाकी से कहनेवाले और परिणाम की परवाह न करते हुए अपनी नीति को आगे ले जानेवाले एकमेव हिंदू हृदय सम्राट मतलब बालासाहेब ठाकरे.

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सवाल धर्म का नहीं बल्कि मन में छिपे राष्ट्रद्रोही विष का है. देश में कई धर्म हो सकते हैं लेकिन राष्ट्र का एक संविधान होना चाहिए और कानून सबके लिए एक समान होना चाहिए. यह समानता आचार-विचार में होनी चाहिए. रशिया और अमेरिका में मुसलमानों और अन्य धर्मावलंबियों के लिए अलग कानून है क्या? और न होने पर वहां दंभी भाषा का प्रयोग करने की हिम्मत जातिवादी समाज दिखाता है क्या, ऐसा सवाल सिर्फ शिवसेनाप्रमुख ही पूछ सके. महाराष्ट्र और देश की राजनीति में शिवसेना आज धारदार तलवार के तेज से चमक रही है. भाजपा से युति अवश्य है लेकिन शिवसेना अपने तेवरवाला संगठन है. एक संकल्प लेकर शिवसेना आगे बढ़ी है. इसी संकल्प के आधार पर हम कल विधानसभा को ‘भगवा’ करके छोड़ेंगे और शिवसेना के ५४वें वर्धापन दिवस समारोह में शिवसेना का मुख्यमंत्री विराजमान होगा. चलिए, यह संकल्प लेकर काम शुरू करें!