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‘चिंता मत करो, जो उड़ गए वे कौवे थे! शरद पवार भी शिवसेना की भाषा बोलने लगे हैं: सामना

कांग्रेस और राष्ट्रवादी में आसमान फटने के कारण रिसाव होने लगा है. भगदड़ और फूट जैसे शब्द कम पड़ जाएं ऐसा ‘रेला’ बाहर निकल रहा है. शरद पवार इस पर भी बोले हैं. उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा, ‘चिंता मत करो. जो उड़ गए वे कौवे थे!

‘चिंता मत करो, जो उड़ गए वे कौवे थे! शरद पवार भी शिवसेना की भाषा बोलने लगे हैं: सामना

मुंबईः शिवसेना के मुखपत्र सामना में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार पर निशाना साधा हैं. सामना में लिखा है, 'शरद पवार अचानक शिव सैनिकों की भाषा में बोलने लगे हैं. जब वे मुख्यमंत्री थे तब शिवसेना की गुंडागर्दी को खत्म करने की बात करते थे. वे कहते थे कि गुंडागर्दी को किसी भी कीमत पर सहा नहीं जाएगा. लेकिन संकट के समय में शिव सैनिकों ने जिस भाषा का प्रयोग किया उसी भाषा का प्रयोग कर खोखली होती राष्ट्रवादी कांग्रेस को ऊर्जा देने का काम पवार ने किया.'

शिवसेना ने लिखा है, 'कांग्रेस और राष्ट्रवादी में आसमान फटने के कारण रिसाव होने लगा है. भगदड़ और फूट जैसे शब्द कम पड़ जाएं ऐसा ‘रेला’ बाहर निकल रहा है. शरद पवार इस पर भी बोले हैं. उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा, ‘चिंता मत करो. जो उड़ गए वे कौवे थे!'

लेख में आगे लिखा है, 'अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पूरे देश में खुशी व्यक्त की गई, उसी समय ‘370’ के पक्ष में कांग्रेस-राष्ट्रवादी का खड़ा रहना वैसी नीति है? इस कारण से कांग्रेस में रिसाव शुरू हो गया. 2014 में विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के पहले ही बिना शर्त समर्थन देते हुए भाजपा की सरकार बनाने का निमंत्रण देनेवाले कौवे राष्ट्रवादी के ही थे. ऐसी हरकत करने की कोई आवश्यकता नहीं थी. राष्ट्रवादी के कौवों ने उस समय फालतू की ‘कांव-कांव’ न की होती तो आगामी 5 वर्ष महाराष्ट्र की राजनीति नए मार्ग पर चलती हुई दिखती. लेकिन पवार ने 2014 में जो किया उसी का परिणाम उनकी पार्टी अब भोग रही है. एक कहावत है कि ‘दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाले खुद उसमें गिर पड़ते हैं’, जैसी स्थिति राष्ट्रवादी की बन गई है.'

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सामना में आगे लिखा है, 'शिवसेना या भाजपा में कौवे आ रहे हैं कि सिपाही, इसका निर्णय हम कर लेंगे. चंद्रकांत पाटिल ने कुछ दिनों पहले एक कटु सत्य कहा था. सत्ता है इसलिए ‘आयाराम’ मतलब ‘इनकमिंग’ बढ़ गई है. इन ‘आयाराम’ में कितने कौवे और कितने सिपाही हैं इसकी खोज हम करते रहते हैं. डाकू को वाल्मीकि बनाने वाली मशीन किसी के पास नहीं है...

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...राजनीति में कभी-कभार ‘जो आंचल में गिरा वो पवित्र’ की नीति पर काम करना पड़ता है. तब वे कौवे हों या राजहंस, चलाना पड़ता है. महाराष्ट्र में ‘युति’ को जहां आवश्यकता है वहां नए सिपाहियों का स्वागत होगा. उड़ जानेवाले कौवे हमें नहीं चाहिए. ‘युति’ का फॉर्मूला तय है. महाराष्ट्र का विकास और जनता के कल्याण का एकमेव एजेंडा है, सत्ता और सीटों का बंटवारा समान ही होगा. राज सिपाहियों का ही होगा.'