RTI के दायरे में CJI ऑफिस के आने का शिवसेना ने किया स्वागत, SC के फैसले को बताया 'ऐतिहासिक'

शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में लिखा है कि यह ऐसा निर्णय है जो दूरगामी परिणाम देने वाला होगा साथ है न्याय संस्था कि पारदर्शिता बढ़ेगी। 

RTI के दायरे में CJI ऑफिस के आने का शिवसेना ने किया स्वागत, SC के फैसले को बताया 'ऐतिहासिक'
(फाइल फोटो)

मुंबई: शिवसेना (shiv sena) ने अपने मुखपत्र सामना (saamana) में सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) को आरटीआई (RTI) के दायरे में लाने वाले फैसले को लेकर अपना समर्थन दिया है . संपादकीय में लिखा है कि यह ऐसा निर्णय है जो दूरगामी परिणाम देने वाला होगा साथ है न्याय संस्था कि पारदर्शिता बढ़ेगी. 

संपादकीय में कहा गया कि देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) का कार्यालय भी अब सूचना के अधिकार के अंतर्गत आनेवाला है. मुख्य अर्थात मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में न्यायमूर्ति रामण्णा, न्यायमूर्ति डीवाय चंद्रचूड, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया है. 

मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय देश की सर्वोच्च न्याय संस्था कही जाती है. इस निर्णय से यह कार्यालय भी सूचना का अधिकार कानून के अंतर्गत आ गया है. यह निर्णय देते समय खंडपीठ ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय सार्वजनिक है. इसके सूचना का अधिकार कानून के अंतर्गत आने से न्यायालयीन कामकाज और लोकानुकूल होकर अधिक कार्यक्षम एवं पारदर्शी हो सकेगा. 

अपनी बात रखते हुए खंडपीठ ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय को व्यवस्था से दूर नहीं किया जा सकता क्योंकि न्यायाधीश का पद संवैधानिक है और वे सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन ही करते रहते हैं. सर्वोच्च न्यायालय के इस निरीक्षण को महत्वपूर्ण और व्यापक कहा जाना चाहिए. हालांकि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय सूचना का अधिकार के अंतर्गत आता है, ऐसा फैसला 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया था. लेकिन इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय के प्रशासन ने ही चुनौती दी थी. अब अपनी ही अपील को ठुकराकर सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है.

मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय इस फैसले के बाद ‘सार्वजनिक’ हो गया है और सूचना अधिकार कानून की ‘परिधि’ में आ गया है, फिर भी खंडपीठ ने ‘प्रतिबंध’ के कुछ ‘दायरे’ तय कर दिए हैं. सूचना अधिकार कानून का दायरा इस निर्णय से भले ही ब़ढ़ा हो लेकिन इसके बावजूद यह स्वतंत्रता ‘पूर्णरूपेण’ नहीं मिल पाएगी, इसका भी खयाल रखा गया है. ‘न्यायिक स्वतंत्रता का सम्मान रखना ही होगा’, अपने पै'सले में खंडपीठ ने ऐसा स्पष्ट किया है. इसलिए इस पै'सले से सूचना अधिकार का ‘दायरा’ भले बढ़ा हो, सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी ‘झंझट’ अकारण न बढ़े, इसका भी प्रयास किया है. इसमें कुछ भी अनैतिक या गलत नहीं है.