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सिरोही: अपरंपार है अधर देवी शक्ति पीठ की महिमा, होती है भक्तों की हर मुराद पूरी

इस शक्ति पीठ यानी अधर देवी का प्रमाण हमें स्कंद पुराण के प्रभास खंड में मिलता है. यह 5500 वर्ष पुराना है. 

सिरोही: अपरंपार है अधर देवी शक्ति पीठ की महिमा, होती है भक्तों की हर मुराद पूरी
नवरात्र में भी शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यहां विशेष पूजन किया जाता है.

सिरोही: देशभर में रविवार से घट स्थापना के साथ नवरात्र शुरू हो चुके हैं. आने वाले 9 दिनों में महाशक्ति मां दुर्गा की उपासना में देशवासी लीन रहेंगे. इसी क्रम में अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के बीच सिरोही जिले के माउंट आबू में बसी अधर देवी शक्ति पीठ में भी विशेष पूजा-अर्चना की शुरूआत की गई. बता दें कि यहां पर माता के होठों की पूजा होती है. माना जाता है कि सती के जब 52 टुकड़े हुए थे तो उनमें से मां के होंठ यानी अधर इसी स्थान पर गिरे थे. इसीलिए इसे अधर देवी भी कहा जाता है.

वहीं, यदि प्रामाणिकता की बात की जाए तो इस शक्ति पीठ यानी अधर देवी का प्रमाण हमें स्कंद पुराण के प्रभास खंड में मिलता है. यह 5500 वर्ष पुराना है. कुछ वर्षों पूर्व में संबित साधना यंत्र विश्वप्रसिद्ध गुरु स्वर्गीय स्वामी ईश्वरानंद गिरी जी महाराज ने भी इस बात की पुष्टि की थी की मां यहां पर साक्षात निवास करती हैं.

बता दें कि, शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यहां पर भव्य मेला लगता है. नवरात्र में भी शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यहां विशेष पूजन किया जाता है. अधर देवी के नौ रूपों में छठवें स्वरूप के रूप में मां कात्यायनी का अवतरित रूप माना जाता है. दुर्गा सप्तशती में भी मां का छठवां स्वरूप मां कात्यायनी का है इसलिए छठवें दिन भी यहां पर विशेष पूजन व हवन होते हैं. साथ ही देश प्रदेश से श्रद्धालु के संग बड़ी संख्या में मां के पूजन के लिए दरबार में धोक लगाते हैं. यह आंजणा, चौधरी, चौहान परमार सहित अन्य वंशो की कुलदेवी भी मानी जाती है.

गौरतलब है कि अधर देवी से पीछे की ओर कच्चे रास्ते से उतरते हुए नीचे एक छोटा सा मंदिर दिखाई देता है. जहां पर एक विशालकाय शिला है. इसी शिला के ऊपर बने मन्दिर में माता कात्यायनी के पद चिन्ह चिन्मय है. यही वो रहस्यमयी साक्षात मां के पद चिन्ह है, जो साधकों को यहां आने के लिए प्रेरित करते हैं. भक्ति भाव में भरकर साधक माता के दर्शन करने के साथ-साथ यहां पर भी आकर अपनी यात्रा पूर्ण करते हैं. यहां दोनों समय सुबह व शाम की आरती भी होती है.

स्कंद पुराण के प्रभास खंड के अनुसार ही यह उल्लेख आता है की पास्कल नाम का एक दैत्य यहां के आसपास रहने वाले सभी साधू सन्यासियों व संतों का अपमान करता था. उन्हें कहीं पर भी शांति पूर्वक भक्ति नहीं करने देता था. इसी से व्यथित होकर मां जगदंबा की सभी ने आराधना की औरर भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने पास्कल नाम के इस दैत्य से कई वर्षों तक युद्ध किया. 

वहीं, युद्ध में विजय नहीं मिलने पर माता ने एक उपाय ढूंढा और एक विशाल शिला इस दैत्य के ऊपर दे मारी. उसके बाद अपने पैरों से इस शीला को पास्कल नामक दैत्य के ऊपर दबाकर मां कात्यायनी यहीं पर ही खड़ी हो गई. आज मां का वह स्वरूप तो यह नहीं दिखता, लेकिन उनके पैरों के पद चिन्हों की छाप इस शिला पर पूरी तरह साफ साफ दिखाई देती है.