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राजस्थान के इस अस्पताल में हैं सबसे ज्यादा थैलीसीमिया के पेशेंट, सुविधाएं नदारद

दरअसल, थैलेसीमिया एक ऐसी बीमारी है जो बच्चों को उनके माता-पिता से मिलती है. इस रोग की पहचान बच्चे में 3 महीने बाद ही हो पाती है. 

राजस्थान के इस अस्पताल में हैं सबसे ज्यादा थैलीसीमिया के पेशेंट, सुविधाएं नदारद
फाइल फोटो

कोटा: जिले के जोनल ब्लड बैंक में प्रदेश में सबसे ज्यादा थैलीसीमिया के मरीज रजिस्टर्ड हैं. इसके बाद भी यहाँ नेट टेस्टिंग मशीन नही है. ऐसे में मरीजों को ट्रांसफ्यूज किए जाने वाले सैंपल, जांच के लिए करीब 300 किलोमीटर दूर उदयपुर भेजे जा रहे है.

जानकारी के मुताबिक कोटा जोनल एमबीएस ब्लड बैंक में प्रदेश में सबसे ज्यादा थैलीसीमिया मरीज रजिस्टर्ड है. इसके बाद भी यहां ब्लड नेट टेस्टिंग की मशीन नहीं है. ऐसे में यहां से थैलीसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, हीमोफीलिया जैसे मरीजों को ट्रांसफ्यूज किए जाने वाले सैंपल उदयपुर भेजे जा रहे है. जांच के बाद नेट टेस्ट में ओके रिपोर्ट ऑनलाइन मिलने के बाद ब्लड मरीजों को चढ़ाया जा रहा है. जानकारी के मुताबिक कोटा ब्लड बैंक में 760 थैलीसीमिया के केस रजिस्टर्ड है.

दरअसल, थैलेसीमिया एक ऐसी बीमारी है जो बच्चों को उनके माता-पिता से मिलती है. इस रोग की पहचान बच्चे में 3 महीने बाद ही हो पाती है. ज्यादातर बच्चों में देखी जाने वाली इस बीमारी की वजह से शरीर में रक्त की कमी होने लगती है. इस रोग में लाल रक्त कण नहीं बन पाते हैं और जो बन पाते है वो कुछ समय तक ही रहते है. इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है.

सरकार ने अजमेर, कोटा और झालावाड़ के लिए एमबी अस्पताल उदयपुर के ब्लड बैंक को नोडल सेंटर बना रखा है.  थैलीसीमिया समेत अन्य ब्लड डिसऑर्डर के शिकार मरीजों के लिए न्यूक्लिक एसिड टेस्ट निशुल्क मुहैया कराया जा रहा है. नेट टेस्टेड ब्लड मिलने से मरीजों में एचआईवी या हैपेटाइटिस जैसे संक्रमण की संभावना लगभग खत्म हो जाती है. नेट टेस्ट का विंडो पीरियड 5 से 7 दिन होता है. यानी ब्लड देने वाले मरीज के रक्त में 5 दिन पहले भी कोई इंफेक्शन हुआ है वह जांच में डिटेक्ट जो जाता है. कोटा मेडिकल कॉलेज के ब्लड ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. एचएल मीणा के मुताबिक अभी यहां फोर्थ जनरेशन किट से ब्लड टेस्ट किया जाता है. इसका विंडो पीरियड 15 से 21 दिन होता है. यानी ब्लड देने वाले मरीज के रक्त में 14 दिन पहले भी कोई इंफेक्शन हुआ है वह जांच में डिटेक्ट नहीं होगा और इन्फेक्टेड ब्लड दूसरे मरीज को चढ़ जाएगा.