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जयपुर में नवरात्र के पंडालों की है धूम, देश की संस्कृतियों को देखने का मिल रहा है मौका

शारदीय नवरात्र के दौरान आदिशक्ति की पूजा में इन दिनों विभिन्न राज्यों की संस्कृति की झलक जयपुर में देखने को मिल रही है.

जयपुर में नवरात्र के पंडालों की है धूम, देश की संस्कृतियों को देखने का मिल रहा है मौका
जयपुर में दुर्गा पुजा के पंडालों में भारी भीड़ उमड़ रही है.

जयपुर: शारदीय नवरात्र के दौरान आदिशक्ति की पूजा में इन दिनों विभिन्न राज्यों की संस्कृति की झलक जयपुर में देखने को मिल रही है. शहर की कई आवासीय सोसायटियों, सेक्टरों सहित कॉलोनियों में माता के पांडाल अपनी-अपनी संस्कृति के हिसाब से सजाए गए है. दुर्गा पूजा के दौरान लोग सबसे ज्यादा कहीं जाने की चाह रखते हैं तो वह दुर्गा पंडाल. सोसाइटीज के करीब बने दुर्गा पंडालों में जाकर लोग मां दुर्गा का आशीर्वाद ले रहे हैं. इस बार दुर्गा पंडालों में युवाओं को पुरानी बंगाली संस्कृति से रूबरू कराने की कोशिश के साथ पीएम मोदी की नो सिंगल यूज प्लास्टिक की मुहीम आगे बढ़ती हुई दिख रही है.

यूं तो पिंकसिटी में शारदीय नवरात्रा का अवसर पारम्परिक रूप से दुर्गा पूजन और रामलीला, गरबा के लिए प्रसिद्ध है. लेकिन रोजगार और अन्य कारणों से राजस्थान आए दूसरे राज्यों के लोगों ने इस त्यौहार पर अपनी गहरी छाप छोडी है. राजधानी मे एक ओर कुछ जगहों पर गरबा की धूम है. 

वहीं दूसरी ओर बंगाल की संस्कृति को दर्शाते भव्य पंडाल लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. रविवार को बंगाल की परंम्परा की छटा बिखेरते मां दुर्गा के पांडालों में महाष्टमी पूजा की धूम है. संधि पूजा के समय श्रद्धालुओं की भीड रही. साथ ही उन्हें कला, संस्कृति, साहित्य, देश कला की झलक भी दिखाई गई. पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के पंडालों के जरिए खेल, साहित्य, कला, दर्शन, वेशभूषा, देशकला और समकालीन राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक मुद्दों को दर्शाने की एक परंपरा रही है.

लेकिन जयपुर में बंगाली समुदाय इस परंपरा को यहां भी काफी पहले ही स्थापित कर चुका है. इसकी झलक हर साल यहां की अलग-अलग जगहों में बनाए जाने वाले भव्य पंडालों में देखी जा सकती है. रविन्द्रनाथ टैगोर के साहित्य को जानना हो या फिर बंगाल के मंदिरों की झलक देखनी हो या मदर टेरेसा से विश्व शांति का संदेश पाना हो, मां दुर्गा के पांडालों में आप इन सबसे रूबरू हो सकते हैं. 

जयपुर दुर्गाबाडी एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने बताया की इस बार की दुर्गा पूजा कई मायनों में खास है. युवाओं को पुरानी बंगाली संस्कृति से रूबरू कराया जा रहा है .भले ही हम बंगाल से आकर राजस्थान में निवास करने लग गए हैं. लेकिन उनके बच्चों को मालूम हो की उनकी बंगाल की संस्कृति कैसी है. वहीं, पीएम मोदी के 'नो सिंगल यूज प्लास्टिक' की मुहीम को आगे बढाते हुए इस बार पत्तल-दोनों में प्रसादी वितरित की जा रही है.

दरअसल इस बार समाज में व्याप्त बुराइयों, भ्रष्टाचार और अन्याय को मिटाने के लिए मां दुर्गा इस बार रौद्र रुप में नजर आ रही है. इसमें एक समाज ही नहीं बल्कि सर्वसमाज के लोगों को पुरानी बंगाली संस्कृति से रूबरू कराया जा रहा है. ताकि युवा पीढ़ी भी आस्था से जुड़ सके. कोलकाता से आये कलाकारों ने एक महीने दिन-रात बनीपार्क स्थित दुर्गाबाड़ी में मां के हुबहू स्वरूप को दिखाने की कोशिश की है. दुर्गाबाड़ी में प्रदेश का सबसे बड़ा दुर्गापूजा महोत्सव गुलाबीनगरी में बीते 70 साल से आयोजित हो रहा है. साढ़े सात लाख रुपए की लागत से रियासतकालीन बंगाली संस्कृति को दिखाया गया है. जिसमें पुरानी चीतें हस्तचलित पंखा, टेराकोटी की मूर्तियां, घटक आदि को प्रदर्शित किया गया है. वहीं इसका इंटीरियर भी खास बनाया गया है. मुख्य गेट अर्धगोलाकार साइज में लगभग 55 फीट का है. दुर्गा महोत्सव के दौरान पंडाल में हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई एकता की भी झलक देखने को मिल रही है. बालाकोट एयर स्ट्राइक के सीक्वेंस पर पंडाल में झांकी तैयार की गई है. दुर्गा पूजा का ब्रेसबी से इंतजार करने वाली रमोना मुखर्जी ने कहा की संधि पूजा सबसे अहम मानी जाती है उस बेला में मां को साक्षात रूप में देखा जा सकता है.

मां के रूप को देखकर हर बार भक्त के दिल में असीम श्रद्धा का जागता भाव ही उनकी संतुष्टि है. मिट्टी से बनी देवी की प्रतिमाएं बेजोड़ है. यह पानी में आसानी से विसर्जित होने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभाएंगी. साथ ही विदेशों में निवास कर रहे लोग जयपुर में हो रहीं दुर्गापूजा को लाइव देख भी सकते हैं. इन पंडालों के अलावा जयपुर की आप किसी भी गली में चले जाएं आपको कला की अनोखी बानगी देखने को मिल जाएगी.