बाड़मेर में लकड़ी के आभूषण बने विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र

पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिला मुख्यालय पर के हीराराम शख्स लकड़ी के आभूषण और कई वाद्ययंत्र बनाते हैें.

बाड़मेर में लकड़ी के आभूषण बने विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र
यह आभूषण में किसा तरह की मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

भूपेश आचार्य/बाड़मेर: राजस्थान में कला के रंग हर तरफ नजर आते हैं, लेकिन आज हम आपको एक अनोखी राजस्थान की कला के बारे में बताएंगे जिसके बारे में शायद आपने पहले कभी नहीं सुना होगा. पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिला मुख्यालय पर एक शख्स लकड़ी के आभूषण और कई वाद्ययंत्र बनाता है. यह गहने इतने खूबसूरत है कि यह सैलानियों के बीच आकर्षण का केंन्द बन गया है. 

दरअसल, बाड़मेर जिला मुख्यालय पर रहने वाले हरीराम पिछले तीन-चार सालों से लगातार लकड़ी के आभूषण बना रहे है, हीराराम बताते हैं कि इससे पहले वह लकड़ी के वाद्य यंत्र बनाने की कला उनके पास है लेकिन अब वह लकड़ी के गहने और आभूषण बनाना शुरू कर दिया है.

हीराराम के मुताबिक इन गहनों की खास बात यह है कि जिस तरीके से आज के जमाने में हर काम मशीनों से होता है, वैसे इल गहनों को नहीं बनाया जाता है. हीराराम बताते हैं कि यह पूरा काम अपने हाथों की सफाई का होता है, जिसे बनाने में थोड़ा ज्यादा समय लगता है लेकिन मुझे शौक है इसलिए मैं इस तरीके के गहने आभूषण बनाता हूं. यहां के लोग थोड़े कम पसंद करते हैं लेकिन बाहर के लोग और महानगरों की और खासतौर से विदेशी लोग इन सब चीजों को बहुत पसंद करते हैं.

 
हरिराम बताते है की अभी हाल ही में मैंने एक प्रदर्शनी लगाई थी, जिसमें पूर्व महाराजा गजसिंह और बाहर से आए लोगों ने जबरदस्त तरीके से पसंद किया था, आर्डर भी दिए थे. अभी तक इन सब चीजों के बारे में ज्यादा लोगों को पता नहीं है इसलिए इसकी डिमांड कम है. हालांकि हीराराम का मानना है कि आने वाले समय में इसकी भरपूर डिमांड होगी. वहीं, अभी तक इस कला को आगे कोई सीख नहीं रहा है क्योंकि इसमें बहुत वक्त लगता है लिहाजा हर कोई सीखने में रुचि नहीं लगता है.

हीराराम लकड़ी के गहनों से लेकर हाथ की रिंग, हाथ के कंगन, नाक की बाली, कान की बाली, गले में पहनने वाली निंबोली सहित महिलाओं के सोलह सिंगार सहित वाद्य यंत्र भी बनाते है. वहीं, हीराराम यह कहते हैं कि इस जमाने में राजस्थान के रंग सरकार की उपेक्षा के चलते कम होते जा रहे हैं, ऐसे में जरूरत है सरकार एसी कला को प्रोत्साहन देने के लिए आगे आए ताकि राजस्थान की जो पहचान विश्व में है वह आने वाले समय में भी बनी रहे और राजस्थान के रंग यूं ही देश-विदेश में छाए रहे.