15 नवंबर से 4 दिन के छठ पर्व की शुरुआत, 36 घंटे के निर्जल व्रत से पायें खोया साम्राज्य, बेऔलाद के घर गूंजेगी संतान की किलकारी

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में 15 नवंबर से शुरू हो रहा है छठ महापर्व। व्रत की शुरूआत नहाय खाय से होती है। उसके बाद खरना के दिन प्रसाद बनता है। पूरे 36 घंटे के निर्जल व्रत के बाद, व्रती पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। फिर उगते सूरज को अर्घ्य देने के बाद, छठ पर्व संपन्न होता है।  

15 नवंबर से 4 दिन के छठ पर्व की शुरुआत, 36 घंटे के निर्जल व्रत से पायें खोया साम्राज्य, बेऔलाद के घर गूंजेगी संतान की किलकारी
फाइल फोटो

दिल्ली: बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में 15 नवंबर से शुरू हो रहा है छठ महापर्व। व्रत की शुरूआत नहाय खाय से होती है। उसके बाद खरना के दिन प्रसाद बनता है। पूरे 36 घंटे के निर्जल व्रत के बाद, व्रती पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। फिर उगते सूरज को अर्घ्य देने के बाद, छठ पर्व संपन्न होता है।  

छठ पर्व में कब क्या है?
नहाय खाय-15 नवम्बर 2015, नहाय-खाय में व्रती कद्दू की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल खाते हैं। 
खरना       -16 नवम्बर 2015, दिनभर उपवास रखकर व्रती खीर-रोटी ग्रहण करेंगे। बाद में 36 घंटे का उपवास शुरू। 
डूबते सूर्य को अर्घ्य-17 अक्तूबर 2015, जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा।
उगते सूर्य को अर्घ्य - 18 नवम्बर 2015, उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने के साथ छठ महापर्व का समापन।
ऐसी मान्यता है कि छठ माता भगवान सूर्य की बहन हैं और उन्हीं को खुश करने के लिए तालाब के किनारे छठ पूजा की जाती है। व्रत करने वाले जल में स्नान कर इन डालों को उठाकर डूबते सूर्य और षष्टी माता को अर्घ्य देते हैं। सूर्यास्त के बाद, लोग अपने-अपने घर वापस आ जाते हैं। रात भर जागरण किया जाता है। सप्तमी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पुन: संध्या काल की तरह डालों में पकवान, नारियल, केला, मिठाई भर कर नदी तट पर लोग जमा होते हैं। व्रत करने वाले सुबह के समय उगते सूर्य को आर्घ्य देते हैं। अंकुरित चना हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कही और सुनी जाती है। कथा के बाद प्रसाद बांटा जाता है और फिर सभी अपने अपने घर लौट आते हैं। व्रत करने वाले इस दिन परायण करते हैं।

छठ पूजा में यह सामग्री है जरूरी 
सूप, दौरा, टोकरी, मउनी, सूपती, दीया, चौमुख, कपटी, बड़ा ढक्कन, छोटा ढक्कन, हाथी, फल-फूल, ईख, सेव, केला, अमरूद, अनार, संतरा, नीबू, गागर, नीबू, नारियल, अदरक, हल्दी, सूथनी, पानी फल सिंघाड़ा, चना, चावल (अक्षत), ठेकुआ, खाजा और कसार।
कार्तिक मास के प्रवेश के साथ छठ की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। भोजन में प्याज-लहसुन का प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाता है। छठ के दौरान चार दिनों तक दिनचर्या पूरी तरह बदल जाती है। पूरे परिवार के साथ मिलकर बनाया प्रसाद सभी में बांटा जाता है। यह पर्व ऐसा है, जहां ऊंच-नीच और जाति का कोई भेदभाव नहीं होता। सभी धर्म और वर्ग के लोग घाट की सफाई और सजावट के काम में अपना योगदान देते दिखते हैं। वहां की रौनक ही अलग होती है। जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य प्रदान करना बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव होता है। उस समय सूर्य की रश्मियों में अलौकिक तेज होता है। घाट से लौटकर घर के आंगन में कोसी भरी जाती है। इसमें मिट्टी का हाथी, दीया आदि आंगन में रखा जाता है। ईख से मंडप तैयार होता है, ढक्कन में प्रसाद भरकर कोसी भरी जाती है। सूर्य सृष्टि का मूल तत्व है। यही जीव जगत की प्राणवायु है। सूर्य की आराधना से मनुष्य के जीवन में प्रखरता आती है।

सूर्य ,संसार में ऊर्जा और प्रकाश के प्रतीक हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने ग्रहों में स्वयं को सूर्य बताया है। भविष्य पुराण में छठ व्रत की महिमा बताते हुए यहां तक कहा गया है कि जो कार्तिक का षष्ठी व्रत करता है, उसे खोया राज्य तक मिल जाता है। छठ पर्व की शुरुआत नहाय खाय से होती है। इसमें सबसे पहले कायिक यानि शरीर और मन की शुद्धि होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की सुबह शाम के भोजन के बाद लिया जाता है सूर्य व्रत का संकल्प। छठ में सामाजिक समता का संदेश छिपा है। सूर्य की पूजा बहुत साधारण तरीके से की जाती है। कोई दिखावा नहीं, कोई चढ़ावा नहीं। नदी या तालाब किनारे सूर्य को आस्था अर्पित करने वालों में अमीर-गरीब सब एक हो जाते हैं। वैसे तो भगवान सूर्य वैदिक देवता हैं और वेदों में उनकी उपासना के लिए ऋचाएं लिखी गई हैं। लेकिन ग्रामीण अंचल के लोकगीतों में वह बहुत ही सरल रुप में दिखाए गए हैं। सूर्य धरती से करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर होने के बावजूद, लोकजीवन के सुख-दुख में झांकते हैं। इस दौरान गांव के खेतों,खलिहानों से लेकर घरों और चौबारों तक में गूंजने लगते हैं छठ पर्व के लोकगीत।