SC का फ़ैसला- राफेल डील मामले में पुनर्विचार याचिकाएं खारिज, राहुल का माफीनामा मंजूर

इसके साथ ही सीबीआई जांच से भी कोर्ट ने इनकार किया है.

SC का फ़ैसला- राफेल डील मामले में पुनर्विचार याचिकाएं खारिज, राहुल का माफीनामा मंजूर

नई दिल्‍ली: सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील (Rafale deal) मामले में फैसला सुनाते हुए पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है. इसके साथ ही सीबीआई जांच से भी कोर्ट ने इनकार किया है. इस केस से जुड़े राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के मामले में भी कोर्ट ने उनका माफीनामा मंजूर कर लिया है. इसके साथ ही राहुल गांधी का अवमानना मामला भी बंद हो गया. इस तरह राहुल गांधी को बड़ी राहत मिल गई. कोर्ट ने राहुल गांधी के माफी मांगने का ज़िक्र करते हुए अवमानना का केस चलाने से मना किया. कोर्ट ने कहा कि राहुल गांधी पार्टी में बड़ा पद संभालते हैं, उन्हें बयान देते वक़्त सावधानी बरतनी चाहिए. राफ़ेल मामले पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसले को लेकर चुनावी दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‘चौकीदार चोर है’ के नारे का इस्तेमाल करने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दाखिल सुप्रीम कोर्ट की अवमानना याचिका पर कोर्ट ने निर्णय सुनाया है.

उल्‍लेखनीय है कि पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अगुआई वाली बेंच ने मामले में दाखिल रिव्यू पिटिशन पर 10 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील प्रशांत भूषण, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा व अन्य की ओर से राफेल डील मामले में SIT जांच की मांग की गई. वहीं केंद्र सरकार ने कहा कि राफेल देश की जरूरत है और याचिका खारिज करने की मांग की.

राफेल केस: याचिका में मांग- SC का फैसला खारिज हो, आरोप- केंद्र ने कई बातों को छुपाया

क्‍या था याचिकाकर्ताओं का पक्ष?
1. याचिकाकर्ताओं ने कहा कि राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट का 14 दिसंबर 2018 का जजमेंट खारिज किया जाए और राफेल डील की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराई जाए. प्रशांत भूषण ने इस दौरान कहा कि केंद्र सरकार ने कई बातों को कोर्ट से छुपाया. दस्तावेज दिखाता है कि पीएमओ ने डील के लिए खुद भी बातचीत की थी, पहली नजर में मामला संज्ञेय अपराध का बनता है और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के पुराना जजमेंट कहता है कि संज्ञेय अपराध में केस दर्ज होना चाहिए और इस मामले में भी संज्ञेय अपराध हुआ है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में जांच का आदेश देना चाहिए.

2. इस मामले में कुछ याचियों ने कहा था कि डील कैंसल हो. हमारी दलील अलग है. हमारी दलील है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले से ललिता कुमारी से संबंधित वाद में व्यवस्था दे रखी है कि जब भी संज्ञेय अपराध हुआ हो तो मामले में एफआईआर होनी चाहिए. इसी जजमेंट के आलोक में हम मामले की जांच चाहते हैं. मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच होनी चाहिए.

3. जजमेंट गलत तथ्यों पर आधारित है क्योंकि केंद्र सरकार ने सील बंद लिफाफे में गलत तथ्य कोर्ट के सामने पेश किए थे. यहां तक कि सरकार ने खुद ही कोर्ट के सामने जजमेंट के अगले दिन 15 दिसंबर 2018 को अपनी गलती सुधार कर दोबारा आवेदन दाखिल किया था.

4. सरकार ने पिछले नवंबर में कहा था कि हम कीमत नहीं बता सकते हैं और अगले साल जनवरी में सीएजी की रिपोर्ट में कीमत नहीं बताई गई. सरकार को पहले से कैसे पुर्वानुमान था कि सीएजी रिपोर्ट में क्या नहीं होगा. हम ये मान लेते हैं कि सरकार ने गलती से एक तथ्य पेश किया और भूल सुधार किया लेकिन ये समझ से बाहर है कि सरकार ने कैसे पहले से समझ लिया था कि सीएजी की रिपोर्ट में क्या आने वाला है?

5. केंद्र सरकार ने आखिरी कैबिनेट मीटिंग और कॉन्ट्रैक्ट की आठ शर्तों को हटाया था और इस बारे में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से तथ्य छुपाए थे. सरकार ने एंटी करप्शन क्लॉज को कैसे हटा दिया. इस बारे में उनके जवाब में चुप्‍पी क्यों है? ये अकेले में ऐसा ग्राउंड है जो जजमेंट को खराब करता है. एयरक्राफ्ट की कीमत, बैंक गारंटी आदि के मामले में इंटरनैशनल निगोशियेटिंग टीम के तीन डिफेंस एक्सपर्ट ने विपरीत मत दिया था. डील में कोई बैंक गांरटी, सावरेन गारंटी (परम गारंटी) तक नहीं थी. यहां तक कि राफेल की डिलिवरी में भी देरी हुई.

6. सरकार को तमाम दस्तावेज कोर्ट के सामने पेश करना चाहिए. जब दस्तावेज सीएजी से शेयर किया जा सकता है तो सुप्रीम कोर्ट से भी शेयर किया जा सकता है. केंद्र सरकार की ये दलील की पीएमओ ने सिर्फ निगोशियेशन को मॉनिटर किया था ये गलत है. दरअसल पीएमओ ने सीधा रोल प्ले किया था. इसमें एनएसए ने रोल प्ले किया था. इंडियन निगोशियेटिंग टीम के बातचीत के पैरलल पीएमओ ने निगोशियेशन को कमजोर किया था और भी कई नए तथ्य सामने आए हैं. पीएम ने नई डील की घोषणा की थी इसी दौरान फ्रांसिसी सरकार से उन्हें (अंबानी) टैक्स में भारी छूट मिली थी.

7. याचिकाकर्ता अरुण शौरी ने कहा कि केंद्र सरकार ने शपथ लेकर अदालत में गलत बयान दिया था. सरकार कहती है कि वह सीएजी से दस्तावेज शेयर कर रही है और कर सकती है फिर कोर्ट से क्यों नहीं शेयर कर सकती? केंद्र सरकार ने जो गलत तथ्य अदालत के सामने पेश किए उसी कारण जजमेंट में त्रुटियां हुई है. कोर्ट ने सरकार पर भरोसा किया लेकिन सरकार ने कोर्ट के भरोसे को तोड़ा है.

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क्‍या था सरकार का पक्ष?
1. केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि मामले में पहली नजर में कोई संज्ञेय अपराध नहीं हुआ है. साथ ही पीएमओ ने कोई पैररल निगोशियेशन नहीं किया था. मामले में याचिकाकर्ता ने लीक हुए दस्तावेज (उड़ाए गए) के आधार पर रिव्यू पिटिशन दाखिल कर रखी है और इसे खारिज किया जाना चाहिए. इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट के आर्टिकल 10 के तहत डील की कीमत आदि कवर है और उसे पब्लिक नहीं किया जा सकता है. एग्रीमेंट के तहत कीमतों को नहीं बताया जा सकता.

2. सुप्रीम कोर्ट ने कभी कीमत नहीं जानना चाहा है. सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ प्रक्रिया के बारे में जानना चाहा है. हमने कोर्ट के सामने प्रक्रिया बताई थी. सीएजी की रिपोर्ट के बारे में जो बयान केंद्र सरकार ने दिया था उसे ठीक करने के लिए अगले दिन अर्जी दाखिल कर दी थी जो पेंडिंग है. इस प्रक्रिया में अगर कोई गलती हुई तो भी इस आधार पर रिव्यू नहीं हो सकता.

3. सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि नई डील पहले के मुकाबले सस्ते में हुई है. देश के लोगों की सुरक्षा से जुड़ा ये मामला है और याचिकाकर्ता डील पर सवाल करना चाहते हैं. एयरक्राफ्ट कोई आभूषण नहीं है. हम सब की सुरक्षा के लिए ये ये जरूरी है और हमारी ये जरूरत है. विश्व में कहीं भी नहीं है कि ऐसे मामले कोर्ट के सामने आते हों.

4. पूरे तथ्यों को एग्जामिन किया गया है. तीन एक्सपर्ट ने जो सवाल उठाए थे उसे डिफेंस एक्विजिशन कमिटी को रेफर किया गया था और पूरे तथ्य को देखा गया. बाद में तीनों ने सहमति जताई थी. वैसे भी अदालत को इन मामलों में अंदर नहीं जाना चाहिए क्योंकि इसके लिए जूरिडिक्शन का एक लिमिटेशन है.

क्‍या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
राफ़ेल मामले की जांच की याचिका 14 दिसंबर 2018 को खारिज हो गई थी जिसके बाद याचिकाकर्ता ने मामले में रिव्यू पिटिशन दाखिल की थी. राफेल लड़ाकू विमान के खरीद के मामले में मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली थी. राफेल खरीद प्रक्रिया और इंडियन ऑफसेट पार्टनर के चुनाव में सरकार द्वारा भारतीय कंपनी को फेवर किए जाने के आरोपों की जांच की गुहार लगाने वाली तमाम याचिकाओं को 14 दिसंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फैसले लेने की प्रक्रिया में कहीं भी कोई संदेह की गुंजाइश नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील मामले में केस दर्ज कर कोर्ट की निगरानी में जांच की गुहार खारिज कर दी थी.

आरोप लगाया गया था कि 58000 करोड़ की डील में अनियनितताएं हुई हैं. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि इस मामले में दाखिल याचिका में तीन मुख्य मुद्दा उठाए गए थे, इसमें फैसला लेने की प्रक्रिया, इंडियन ऑफसेट पार्टनर के चुनाव और कीमत का मुद्दा था. अदालत ने कहा था कि जो तथ्य और दलील सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किया गया है उसे डिटेल में सुना गया है और 36 राफेल डील के मामले में ऐसा कोई आधार नहीं है कि कोर्ट उसमें दखल दे. ऐसे में तमाम अर्जी खारिज की जाती है. 36 राफेल डील की खरीद का मामला बेहद संवेदनशील है और इसमें दखल का कोई आधार नहीं है.

राहुल गांधी के खिलाफ केस
राफ़ेल मामले पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसले को लेकर चुनावी दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‘चौकीदार चोर है’ के नारे का इस्तेमाल करने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दाखिल सुप्रीम कोर्ट की अवमानना याचिका पर कोर्ट ने निर्णय सुनाया है. भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने राहुल गांधी द्वारा दिए गए इस विवादित बयान के बाद सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका लगाई थी. अवमानना याचिका दायर किए जाने के बाद राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर बिना शर्त माफी मांगी थी. राहुल गांधी ने राफेल से जुड़े शीर्ष कोर्ट के आदेश को पीएम मोदी के खिलाफ लगाए गए 'चौकीदार चोर है' के स्लोगन से भी जोड़ा था.