लाल किले की प्राचीर से राम मंदिर की गूंज ने रचा एक और इतिहास

प्रधानमंत्री ने श्री राम जन्मभूमि के संबंध में देशवासियों के संयम की सराहना करते हुए कहा कि दस दिन पूर्व ही अयोध्या में राम जन्मभूमि के मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ हुआ है. सदियों पुराने विषय का शांतिपूर्ण समाधान अब हो चुका है. देश के लोगों ने जिस संयम और समझदारी के साथ आचरण किया, यह अभूतपूर्व है.

लाल किले की प्राचीर से राम मंदिर की गूंज ने रचा एक और इतिहास

भारत के 74वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री राम जन्मभूमि की स्वतंत्रता के मुद्दे को लाल किले की ऐतिहासिक प्राचीर से उठा एक नया इतिहास रच दिया. हमने अब तक 12 प्रधानमंत्रियों को लाल किले की प्राचीर से सुना. लेकिन, मात्र एक प्रधानमंत्री को ही वह गौरव प्राप्त हुआ कि वह अपने उद्बोधन में अयोध्या में भगवान श्री राम की जन्मभूमि की मुक्ति का उद्घोष राष्ट्रीय गौरव के साथ कर सकें. प्रधानमंत्री ने श्री राम जन्मभूमि के संबंध में देशवासियों के संयम की सराहना करते हुए कहा कि दस दिन पूर्व ही अयोध्या में राम जन्मभूमि के मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ हुआ है. सदियों पुराने विषय का शांतिपूर्ण समाधान अब हो चुका है. देश के लोगों ने जिस संयम और समझदारी के साथ आचरण किया, यह अभूतपूर्व है. यह भारत के उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक है. हर्ष की बात यह भी है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी वह प्रथम राष्ट्रपति हैं जिन्होंने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संदेश में इसका गौरव के साथ उल्लेख करते हुए मामले के शांतिपूर्ण सर्वस्वीकार्य हल पर प्रसन्नता व्यक्त की. ना सिर्फ विश्व भर में फैले राम भक्तों के लिए, अपितु, उन सभी देशभक्तों के लिए यह गौरव की बात है जो, देश में रामराज्य की संकल्पना सदियों से संजोए हुए हैं.

यहां यह जान लेना भी आवश्यक है कि श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति हेतु 16 करोड़ लोगों की सहभागिता से हुए विश्व के सबसे बड़े जन-आंदोलन की कानूनी लड़ाई ने भी अनेक इतिहास रचे. अपने 70 वर्षों के लंबे न्यायिक कालखंड में इसने जहां बहुतेरे उतार-चढ़ाव देखे तो वहीं इसके कारण माननीय न्यायालय तथा न्याय व्यवस्था ने भी अनेक प्रहार झेले. यहां तक कि बाबरी के पैरोकारों ने भरे न्यायालय में सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों की मान-मर्यादा को तार-तार करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. किंतु, महान है हमारी न्याय व्यवस्था. जिसने, स्वयं पर हुए अनवरत हमलों को भी नजरंदाज करते हुए न्याय को तय समय सीमा में देकर एक अत्यंत सराहनीय व विश्वभर के लिए अनुकरणीय कार्य किया. 

मामले को पूरा समझने के लिए हमें सीधे पांच दिसंबर 2017 में जाना पड़ेगा. यह वह दिन था जब देश के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ स्वतंत्र भारत के सर्वाधिक चर्चित मामले पर अपनी पहली सुनवाई के लिए बैठी. इससे पहले 11 अगस्त को न्यायालय ने सभी पक्षकारों को अपने-अपने पक्ष के दस्तावेज समय पर जमा कराने का आदेश दिया था. दोपहर 2 बजे भारत के वरिष्ठ वकीलों, वादी-प्रतिवादियों तथा अपीलकर्ताओं इत्यादि से खचा-खच भरे न्याय कक्ष में जैसे ही प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में गठित पीठ ने सुनवाई शुरू की तथा श्री रामलला विराजमान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के पाराशरण, सी एस वैद्यनाथन तथा हरीश साल्वे ने अपना पक्ष रखना शुरू किया, दूसरे पक्ष ने व्यवधान पैदा करना शुरू कर दिया. पूर्व कानून मंत्री तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे तथा राजीव धवन ने एक के बाद एक लगातार कार्यवाही में रोड़े अटकाए. जब न्यायाधीशों ने उन सभी से सुनवाई आगे बढ़ने देने को कहा तो वे सीधे तौर पर धमकी या धौंस देने पर उतारू हो गए और कहा कि यदि ये सुनवाई नहीं रुकी तो वे न्यायालय का बहिष्कार करेंगे.

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बाबरी के मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पैरवी करने वाले इन वकीलों ने कहा कि यह सुनवाई भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के इशारे पर हो रही है क्योंकि उसी के चुनाव घोषणा पत्र में इसका वर्णन भी है और सुब्रमण्यम स्वामी ने भी इस संबंध में प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है. दूसरा, उन्होंने कहा कि इस मामले की सुनवाई की अभी जल्दी ही क्या है? इसे जुलाई 2019 के आम चुनाव के बाद ही शुरू करना चाहिए. तीसरा, कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले में निर्णय से बाहर गंभीर परिणाम होंगे तथा इससे देश के सांप्रदायिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचेगा. चौथा, मुकदमे के महत्त्व को देखते हुए उच्चतम न्यायालय के पांच या सात सदस्यीय पीठ ही सुनवाई करे न कि वर्तमान तीन सदस्यीय पीठ इसकी सुनवाई करे. पांचवा, मुख्य न्यायाधीश की सेवा निवृति की तारीक आने वाली है अत: यह मामला उनके रहते पूरा नहीं सुना जा सकता. छठा बहाना यह था कि न्यायालय को दिए जाने वाले 90,000 पृष्ठों के दस्तावेजों के अनुवाद हेतु भी समय चाहिए. इस सब के ऊपर पूर्व कानून मंत्री व कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने तो भरे कोर्ट को धमकी तक दे डाली कि यदि हमारी बातें नहीं मानी गईं तो हम कोर्ट का बहिष्कार करेंगे. इस प्रकार पहले ही दिन की बहस में राजनीति, धमकियां, असंसदीय भाषा-शैली, अतार्किक बहसबाजी से देश की सर्वोच्च न्यायालय को दो-चार होना पड़ा. 

मात्र दो ही दिन बाद सात दिसंबर को एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय को फिर इन तथाकथित वरिष्ठ वकीलों को आड़े हाथों लेते हुए सीधी चेतावनी देनी पड़ी. प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ को यहां तक कहना पड़ा, 'वकीलों को कानून का मंत्री कहा जाता है. उन्हें कोर्ट का अधिकारी भी कहा जाता है किन्तु दुर्भाग्य से वकीलों का एक छोटा सा समूह अपनी आवाज बढ़ा रहा है. जोर से चिल्लाने वालों को स्पष्ट तौर से समझ लेना चाहिए कि उन्हें सहन नहीं किया जाएगा. आवाज बढ़ाने का अर्थ है कि या तो वे अपने पक्ष को रखने में अक्षम हैं या वे उसके लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं.

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे और राजीव धवन के रामजन्म भूमि अयोध्या मामले, दिल्ली सरकार की केंद्र के साथ खींच-तान मामले तथा एक अन्य मामले का हवाला देते हुए प्रधान न्यायाधीश को गुस्से से कहना पड़ा, 'जब बेंच धवन की दलीलों से असहमति व्यक्त करती है तो वे आग बबूला हो जाते हैं. अयोध्या केस में तो उनका व्यवहार और भी अधिक नृशंस दिखा. बेंच ने कहा कि यह बार की परिपाटी नहीं है. यदि बार इनको ठीक नहीं करती तो हमें इनको ठीक करना पड़ेगा.'

मामला यहां तक ही रुकता तो भी चल जाता लेकिन, इन कथित वरिष्ठ वकीलों की ऐंठ इससे भी एक कदम और आगे बढ़ गई और तीन ही दिन बाद राजीव धवन ने कोर्ट में वकालत नहीं करने तक की धमकी भी दे डाली. देश के प्रधान न्यायाधीश को भेजे अपने पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार मामले में उन्हें कोर्ट में अपमानित होना पड़ा. धवन ने कहा कि आप मेरे वरिष्ठ वकील के गाउन को वापस ले सकते हैं किन्तु फिर भी मैं उसे अपनी सेवाओं को याद रखने के लिए अपने साथ रखूंगा. हालांकि, जब न्यायालय ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया तो वे बेशर्मी से न्यायालय में लौट आए.

न्यायालय में बार-बार दी जा रही धमकियों को बेंच पर निष्प्रभावी जान इस 'शाउटिंग ब्रिगेड' ने अब राजनैतिक दांव-पेच लगा मुख्य न्यायाधीश पर ही महाभियोग लगाने के लिए विपक्षी राजनेताओं को एकत्र कर लिया और कुछ वरिष्ठ न्यायाधीशों को अपने ही मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध प्रेस के समक्ष उतार कर देश में एक नया किन्तु बेहद दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास रच डाला. महाभियोग का मामला जब संसद के समक्ष पहुंचा तथा राज्यसभा के सभापति के नाते एम वेंकय्या नायडू ने इसे अस्वीकार कर दिया. इसके बाद इस ब्रिगेड ने देश के उप-राष्ट्रपति पर भी प्रहार किया.

खैर! सुनवाई के अनेक मोड़ों पर आए अटकावों, भटकावों, धौंस व धमकियों के सतत प्रहारों से बचते-बचाते तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जिनसे मामले के निस्तारण की पूरी अपेक्षा थी, ने 2 अक्टूबर 2018 को अपना कार्यकाल तो पूरा कर लिया लेकिन मसला वहीं का वहीं रहा.

अब बात करते हैं भारत के नए मुख्य न्यायाधीश की. रंजन गोगोई ने जब कार्यभार संभाला और सुनवाई के लिए एक पीठ का गठन किया तो बाबर वादियों ने तो उसमें शामिल एक जज पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया. पीठ के जजों का धर्म देख बाबर वादियों ने प्रश्न किया कि इसमें कोई मुस्लिम जज क्यों नहीं है? अंततोगत्वा सुनवाई प्रारंभ करने से पूर्व ही ‘शाउटिंग ब्रिगेड’ की दोनों मांगों को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने मान लिया और एक माननीय न्यायाधीश को पीठ से हटना पड़ा. ऐसे ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्तों के नामों पर भी उन्होंने जमकर टीका-टिपण्णी की.  

सुनवाई जब पुन: प्रारंभ हुई तो फिर सर्वोच्च न्यायालय की मर्यादाओं को बारम्बार तार-तार करने के प्रयास जारी रहे. कभी इन ‘वरिष्ठ वकीलों’ ने मुख्य-न्यायाधीश के समक्ष न्यायालय द्वारा पक्षपात करने के सरेआम आरोप लगाए तो कभी कार्यवाही में बाधक बन न्यायालय को कार्यवाही बीच में ही रोकने को मजबूर किया. कभी कहा कि यदि आप लगातार सुनवाई करेंगे तो यह ‘अमानवीय’ व ‘अव्यावहारिक’ होगा. 9 अगस्त को चौथी लगातार सुनवाई पर तो धवन ने धमकी ही दे डाली कि सुनवाई में अब और जल्दबाजी की तो वे न्यायालय का सहयोग नहीं कर पाएंगे. और, फिर कहा कि मैं यह टॉर्चर नहीं झेल सकता और मामले की पैरवी छोड़ दूंगा. कभी आरोप लगाया कि आप सिर्फ मुस्लिम पक्षकारों से ही प्रश्न क्यों पूछते हैं?

कभी मामले को मध्यस्तता पैनल के भंवर में फंसाने के षड्यंत्र रचे गए तो कभी मुस्लिम पक्षकारों व उनके वकीलों को न्यायालय के बाहर कथित धमकियों का राग अलापा गया. कभी हिन्दू धर्म ग्रंथों, आराध्य देवों व हिन्दू भावनाओं को कचोटने व अपमानित करने के कुत्सित प्रयास हुए. लगातार सुनवाई के 40वें व अंतिम दिन तो राजीव धवन ने अपनी रही सही कसर भी पूरी कर ली. श्री राम जन्मभूमि के पवित्र मानचित्र को मुख्य-न्यायाधीश की उपस्थिति में पूरी संविधान पीठ के सामने ही खचाखच भरे कोर्ट रूम में फाड़ कर न्यायालय की मर्यादा को फिर से तार-तार कर डाला. इस पर मुख्य न्यायाधीश को कहना पड़ा कि यदि आपकी संतुष्टि अभी भी नहीं हुई हो तो, इसके और टुकड़े कर सकते हैं, हम यहां से उठ जाते हैं.

श्री राम जन्मभूमि मामले में चली सुनवाई ने अनेक उन राम-द्रोहियों तथा न्याय द्रोहियों को बेनकाब कर दिया जो अभी तक व्यवस्था में सेंध लगाकर, धौंस जमाकर या अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर इसे चरमराने में ना जाने कब से सक्रिय थे. वास्तव में मुट्ठीभर वकील पता नहीं कब से अपनी वरिष्ठता की दबंगई न्याय व्यवस्था पर चला रहे थे. एक महत्वपूर्ण विचारणीय बात यह भी है कि आखिर उपरोक्त अशोभनीय न्याय-विरोधी व्यवहार सिर्फ मुस्लिम पक्षकारों का ही क्यों रहा? इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई में किसी हिन्दू पक्षकार या उसके किसी भी वकील के व्यवहार में तो कोई न्यूनता दृष्टिगोचर नहीं हुई? अभी हाल ही में ये वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन हाई कोर्ट की ऑनलाइन कार्यवाही के दौरान चोरी छुपे हुक्का पीते हुए भी पकडे़ गए थे जिनके साथ उनके पुराने मित्र कपिल सिब्बल भी थे. उन्हीं के एक अभिन्न साम्यवादी ‘बुद्धिजीवी’ और आतंकियों के पौरोकार मित्र को तो इसी महान न्याय के मंदिर पर दुर्भावना पूर्वक हमले का दोषी करार दिया जा चुका है किन्तु ब्रिगेड के सदस्यों के विरुद्ध उचित कार्रवाई हेतु देश अभी भी प्रतीक्षारत है.

हमें गर्व है अपनी न्याय-व्यवस्था पर जो अनेक झंझावातों, प्रहारों व षड्यंत्रों को नकारते हुए मात्र 2 वर्ष में सदियों पुराने झगड़े पर अपना एक अभूतपूर्व निर्णय देने में सफल हुई. लाख राजनैतिक व अन्य अवरोधों के बावजूद, जन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण तो शुरू हो चुका किंतु, अब समय की मांग है कि जोर-जोर से चिल्लाकर धौंस दिखाने वाली इस ‘शाउटिंग ब्रिगेड’ के विरुद्ध बार काउंसिल या न्यायालय द्वारा कड़ी कार्रवाई की जाए. जिससे कोई भी हमारी न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता, पवित्रता व पारदर्शिता में अनुचित हस्तक्षेप करने का दुस्साहस कभी भी ना कर सके.

(लेखक विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.)
(लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.)