Two Sanjay of Bihar Assembly Election: मौजूदा समय हर एक सियासी दल में एक संजय मिल जाएगा. यही वो संजय है जो पार्टी के सारे काम-काज देखता है. इस बार के बिहार चुनाव में एनडीए की ओर से एक संजय झा जो जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष तो वहीं महागठबंधन की ओर से भी एक आरजेडी के राज्यसभा सांसद संजय यादव थे. दोनों ही संजय की अपने-अपने गठबंधनों को चुनाव जितवाने की बड़ी जिम्मदारियां थीं.
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Two Sanjay Of Bihar Politics: महाभारत में के पात्र संजय के नाम से कौन नहीं परिचित होगा. कम से कम राजनीति में रुचि रखने वालों को तो जरूर ही याद होगा. अगर नहीं याद है तो चलिए हम बता देते हैं संजय द्वापर युग में कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत के युद्ध का आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाने वाले संजय हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र की राजसभा में सम्मानित सदस्य थे. संजय को धृतराष्ट्र का सारथी माना गया था वो सूत पुत्र थे उनके पिता का नाम गावल्यगण था. संजय विनम्रता और स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते हैं. बिहार चुनाव में भी ऐसे ही दो संजय थे. जिसमें से एक ने अपनी पार्टी को चुनाव में जबर्दस्त सफलता दिलवाई तो वहीं दूसरे संजय ने पार्टी की लुटिया डुबो दी. तो चलिए आपको बताते हैं इन दोनों संजय के बारे में.
मौजूदा समय हर एक सियासी दल में एक संजय मिल जाएगा. यही वो संजय है जो पार्टी के सारे काम-काज देखता है. इस बार के बिहार चुनाव में एनडीए की ओर से एक संजय झा जो जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष तो वहीं महागठबंधन की ओर से भी एक आरजेडी के राज्यसभा सांसद संजय यादव थे. दोनों ही संजय की अपने-अपने गठबंधनों को चुनाव जितवाने की बड़ी जिम्मदारियां थीं. आइए आपको बताते हैं कि इस चुनाव में इन दोनों संजय का प्रदर्शन कैसा रहा है.
JDU के संजय झा, जिन्होंने एनडीए को दी नईं ऊंचाइयां
यहां हम सबसे पहले बात करेंगे जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की जिन्होंने अपनी मृदुभाषा और कौशल के बलबूते पर एनडीए को बिहार चुनाव में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. संजय इसके पहले बीजेपी में थे लेकिन वो पार्टी छोड़कर जेडीयू में आ गए. अपने सियासी कौशल के दम पर वो साल 2012 में उन्होंने जेडीयू का दामन थामा और महज 11 सालों के बाद ही 2023 में वो पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तक बन गए. संजय की काबिलियत हम इसी बात से समझ सकते हैं कि वो नीतीश सरकार में सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री का पद संभाल चुके हैं. इस मंत्रालय का काम होता है कि वो कैसे सरकार की छवि को बेहतरीन बनाए और उसे इस कदर चमका के रखें कि जनता को सरकार के अलावा कोई विकल्प ही न दिखाई दे. फिलहाल वो राज्यसभा सांसद हैं और नीतीश के लिए सबसे अहम शख्सियतों में से एक हैं.
RJD के संजय यादव, जिन्होंने डुबोई पार्टी की लुटिया
आरजेडी के राज्यसभा सांसद संजय यादव की इस बार विधानसभा चुनाव में बड़ी भूमिका रही. टिकट बंटवारा भी संजय यादव के निर्देश पर हुआ. लेकिन चुनाव परिणाम में ये हुआ कि इस चुनाव में आरजेडी का बंटाधार हो गया. अब तक के चुनावों में एनडीए में जहां जेडीयू बड़े भाई के रोल में होता था वहीं बीजेपी ने इस बार जेडीयू को पीछे छोड़ दिया. दोनों पार्टियों ने 101 - 101 सीटों पर चुनाव लड़ा इसमें बीजेपी को 89 और जेडीयू को 84 सीटों पर जीत हासिल हुई. संजय यादव तेजस्वी यादव के सबसे ज्यादा करीबियों में से एक माने जाते हैं. ऐसा कहा जाता है कि बिहार की सियासत में तेजस्वी यादव संजय यादव से पूछे बिना कोई फैसला नहीं लेते हैं.
कौन हैं संजय यादव?
RJD राज्यसभा सांसद हरियाणा के रहने वाले हैं. संजय यादव को तेजस्वी यादव का सारथी भी कहा जाता है. तेजस्वी और संजय दोनों ने एक साथ क्रिकेट भी खेला है. दोनों ने दिल्ली में एक साथ क्रिकेट खेली है.वहीं तेजस्वी के बड़े भाई और पार्टी-परिवार से निष्कासित तेज प्रताप यादव उन्हें इशारों-इशारों में जयचंद की उपाधी देते हैं. कई बार वो इशारों में ही बता चुके हैं कि उन्हें निकलवाने में संजय की ही हाथ था. तेजस्वी की बहनें भी संजय पर इशारों में ही कई बार आरोप लगा चुकी हैं. लेकिन संजय इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं. साल 2015 से ही संजय यादव आरजेडी के लिए विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति तय कर रहे हैं. उस साल आरक्षण पर मोहन भागवत की टिप्पणी को लेकर जोर-शोर से मुद्दा उठाने का काम संजय यादव की रणनीति का हिस्सा था. उसके बाद जब लालू यादव चारा घोटाले में जेल गए तो संजय की नजदीकी तेजस्वी से बढ़ती गई.
विवादों में भी घिरे संजय यादव
आरजेडी पार्टी में जितनी तेजी से संजय यादव का कद बढ़ा उतनी ही तेजी से वो विवादों में भी घिरे. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में उनके ऊपर पैसे देकर टिकट देने का आरोप भी लगा. हालांकि इन सब के बावजूद आरजेडी 2020 के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. इसमें संजय यादव की भूमिका काफी बड़ी थी और पूरे चुनाव के दौरान संजय यादव तेजस्वी के साथ हर जगह नजर आए. लेकिन 2025 के चुनाव में आरजेडी की लुटिया ही डूब गई और पूरी पार्टी 25 सीटें ही मिल पाईं. जिसके बाद सियासी हलकों में संजय यादव को ही इस हार का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.
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