कभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे उद्धव ठाकरे लेकिन इस वजह से बदल दिया फैसला

राजनीति की पारी शुरू करने से पहले उद्धव ठाकरे एक पेशेवर फोटोग्राफर थे. फोटोग्राफर से लेकर महाराष्ट्र की सत्ता का सिरमौर बनने तक की उद्धव की कहानी पूरी तरह फिल्मी है. 

कभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे उद्धव ठाकरे लेकिन इस वजह से बदल दिया फैसला
उद्धव ने राजनीति के दांव-पेंच अपने पिता बाला साहेब ठाकरे से सीखे.

नई दिल्ली: शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने महाराष्ट्र (Maharashtra) के नए मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. ठाकरे परिवार (Thackeray Family) से पहली बार कोई शख्स सीएम की कुर्सी पर बैठा है. मातोश्री से राजनीति की जो लकीर उनके पिता बाला साहेब ठाकरे (Balasaheb Thackeray) ने खींची थी, सीएम की कुर्सी पर बैठने के लिए उद्धव ने उसमें थोड़ा बदलाव किया. नतीजा सत्ता को रिमोट से चलाने वाला ठाकरे परिवार आज खुद सत्ता की ड्राइविंग सीट पर बैठ गया है. इसलिए आज का दिन शिवसेना और शिवसैनिकों के लिए बेहद अहम है.

राजनीति की पारी शुरू करने से पहले उद्धव ठाकरे एक पेशेवर फोटोग्राफर थे. फोटोग्राफर से लेकर महाराष्ट्र की सत्ता का सिरमौर बनने तक की उद्धव की कहानी पूरी तरह फिल्मी है. कला से ग्रेजुएट करने वाले उद्धव ने हर मौके पर खुद को कलाकार साबित किया. उद्धव ठाकरे आधी जिंदगी गुजारने के बाद राजनीति में शामिल हुए लेकिन इसके बाद भी काफी कम समय में ही उन्होंने ये साबित कर दिया कि राजनीति में वो भले ही नए हैं पर लंबी रेस के खिलाड़ी हैं पहली बार में ही अपनी नेतृत्व क्षमता से उन्होंने बीएमसी में पार्टी की जीत दिलाकर अपनी योग्यता का परिचय दे दिया और फिर क्षेत्रवाद की छवि से छुटकारा पाकर विकास का नारा देकर उन्होंने पार्टी को एक नई पहचान दिलाई. इसी का नतीजा है कि आज पहली बार ठाकरे परिवार का कोई शख्स सीएम की कुर्सी तक पहुंचा है. 

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उद्धव ठाकरे एक लेखक भी हैं. उद्धव ठाकरे ने फोटोग्राफी प्रदर्शनियों के जरिए किसान के लिए फंड जुटाया. दशकों तक किसानों की लड़ाई लड़ी, वर्षों तक समाजसेवा करते रहे. राजनीति में कदम रखने से पहले उद्धव पार्टी के मुखपत्र 'सामना' का काम देखते थे. साल 1994 तक उद्धव ठाकरे का राजनीति से कोई संबंध नहीं था. राजनीति में उनकी बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी. बाला साहेब ठाकरे की पत्नी मीना ठाकरे की इच्छा थी कि उनका कम से कम एक बेटा राजनीति में पति का साथ दे. बाल ठाकरे के बेटे जयदेव से संबंध अच्छे नहीं थे. सबसे बड़े बेटे बिंदुमाधव की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. मां मीना ठाकरे के कहने पर उद्धव पार्टी के कार्यक्रमों में जाने लगे. साल 1994 में वो पहली बार किसी कार्यक्रम में दिखे. 

उद्धव ने राजनीति के दांव-पेंच अपने पिता बाला साहेब ठाकरे से सीखा. उद्धव ठाकरे को पहली बार 2002 में बीएमसी के चुनावों की जिम्मेदारी सौंपी गई और शिवसेना को इसमें भारी सफलता मिली. उद्धव ठाकरे के लिए राजनीति में ये पहली बड़ी जीत थी. हालांकि, इस दौरान उद्धव ज्यादातर वक्त 'सामना' को ही दे रहे थे. बीएमसी चुनाव में जीत दिलाने के बाद साल 2003 में उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. इससे पहले उद्धव को शायद ही कोई जानता था. इसके बाद 2004 में बाल ठाकरे ने अपने भतीजे राज ठाकरे को दरकिनार करते हुए उद्धव ठाकरे को शिवसेना का अगला मुखिया घोषित कर दिया था. 2012 में बाल ठाकरे के निधन के बाद उद्धव शिवसेना के अध्यक्ष बने. 

उद्धव के पार्टी का अध्यक्ष बनने पर राजनीति के पंडित भी हैरान थे. माना जा रहा था कि बाला साहेब भतीजे राज ठाकरे को अध्यक्ष बनाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उद्धव के सामने बड़ी चुनौती थी. पिता का साया छूट गया था तो भाई राज ठाकरे ने भी बगावत कर दी थी. राज ठाकरे ने बाद में अपनी खुद की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली. हालांकि राज ठाकरे के अलग राह पकड़ने के बावजूद उद्धव ने धीरे-धीरे पार्टी में अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी. उद्धव ठाकरे ने बीजेपी से दोस्ती गहरी करने की कोशिशें शुरू कर दीं. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना को इसका फायदा मिला. शिवसेना अपने इतिहास में सबसे ज्यादा 19 लोकसभा सीटें जीत गई. 

शिवसेना को केंद्र में मंत्री का एक पद दिया गया. हालांकि इस साल विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना ने अलग-अलग चुना लड़ा. सरकार साथ बनाने की योजना थी लेकिन उद्धव सीएम की कुर्सी शिवसेना को देने पड़ अड़ गए. इसके बाद जो हुआ उससे हर कोई वाकिफ है. उद्धव ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ महाराष्ट्र की सत्ता संभालने जा रहे हैं. ये पहला मौका है कि जब शिवसेना शरद पवार की पार्टी एनसीपी के साथ गठबंधन करके महाराष्ट्र में सरकार बना रही है.