उद्धव ठाकरे होंगे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री, शरद पवार के पैर छूकर लिया आशीर्वाद

मुंबई के ट्राइडेंट होटल में मंगलवार शाम को तीनों दलों के नेताओं ने बैठक की, जिसमें शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को विधायक दल का नेता चुना गया. इसके साथ ही साफ हो गया है कि उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री होंगे. 

उद्धव ठाकरे होंगे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री, शरद पवार के पैर छूकर लिया आशीर्वाद
मुंबई के होटल ट्राइडेंट में उद्धव ठाकरे को महा विकास अघाड़ी गठबंधन का विधायक दल का नेता चुना गया.

मुंबई: महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की सरकार गिरने के साथ ही शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस का सरकार बनने रास्ता साफ हो गया है. मुंबई के ट्राइडेंट होटल में मंगलवार शाम को तीनों दलों के नेताओं ने बैठक की, जिसमें शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को विधायक दल का नेता चुना गया. इसके साथ ही साफ हो गया है कि उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री होंगे. उद्धव के शपथ ग्रहण के साथ ही ठाकरे परिवार का वह परंपरा टूट जाएगी जिसमें शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने कहा था कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी सीधे तौर से सत्ता में भागीदार नहीं बनेगा. सूत्रों का कहना है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) एक दिसंबर को शिवाजी पार्क में मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं. 

इस बैठक में तय हुआ कि शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के गठबंधन को महा विकास अघाड़ी (Maha Vikas Aghadi) कहा जाएगा. उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) महा विकास अघाड़ी (Maha Vikas Aghadi) के विधायक दल के नेता चुने गए हैं. बैठक के दौरान ही उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार के सामने झुककर उनका आशीर्वाद लिया.

मालूम हो कि सोमवार शाम को मुंबई के होटल ग्रैंड हयात में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी व अन्य निर्दलीय विधायकों के 162 सदस्यों ने एक साथ आकर शक्ति प्रदर्शन किया था, जिसके बाद से साफ हो गया था कि बीजेपी को सत्ता से बाहर होना होगा. महाराष्ट्र के प्रोटेम स्पीकर कालीदास कोलंबदास ने बुधवार को सुबह आठ बजे विधानसभा का सत्र बुलाया है. यहीं पर शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन महा विकास अघाड़ी को बहुमत साबित करना होगा.

महाराष्ट्र में बीजेपी का 'ऑपरेशन कमल' असफल
महाराष्ट्र में रातोरात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) नेता अजित पवार से 'डील' कर बीजेपी की सरकार तो बन गई, मगर शक्ति-परीक्षण (फ्लोर टेस्ट) से पहले ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री अजित पवार मैदान छोड़कर चले गए.

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उन्हें बुधवार को शाम पांच बजे बहुमत साबित करने का आदेश दिया, लेकिन उन्होंने असमर्थता जताते हुए इस्तीफा दे दिया. इससे न बीजेपी का 'ऑपरेशन कमल' सफल हुआ और न ही अजित पवार का विधायकों को लाने का दावा.

बहुमत का 'जुगाड़' न होता देख आखिरकार फडणवीस ने मंगलवार की शाम साढ़े तीन बजे प्रेस वार्ता कर इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया. फडणवीस से दो घंटे पहले अजित पवार ने इस्तीफा दिया. कुल मिलाकर अजित पवार 78 और देवेंद्र फडणवीस 80 घंटे ही मुख्यमंत्री रह पाए.

शनिवार की सुबह आठ बजे अचानक जब अजित पवार और देवेंद्र फडणवीस ने शपथ ली थी तो इसे बीजेपी खेमे की ओर से 'बड़ा मास्टर स्ट्रोक' के रूप में प्रचारित किया गया. सोशल मीडिया पर भी बीजेपी समर्थकों की ओर से इस 'महाउलटफेर' नाम देकर तारीफों के पुल बांधे गए. मगर, जैसे ही शरद पवार ने ट्वीट कर सरकार में शामिल होने को अजित पवार का निजी फैसला बताकर एनसीपी को इससे अलग कर लिया, उसके बाद से सियासी घटनाक्रम हर घंटे-दो घंटे पर बदलने लगा.

पहले माना जा रहा था कि सरकार बनाने में शरद पवार की भी मौन सहमति है, मगर उन्होंने जिस तरह से शिवसेना और कांग्रेस के साथ लगातार तालमेल बनाए रखा और सोमवार की शाम सात बजे से पांच सितारा होटल में 162 विधायकों की सार्वजनिक परेड करवाई और उन्हें अपने रुख पर कायम रहने का संकल्प दिलाया, उससे ये आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं.

सूत्रों का कहना है कि राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने शनिवार को नई सरकार को आनन-फानन में शपथ दिलाने के बाद बहुमत साबित करने के लिए कोई आधिकारिक समय-सीमा तय नहीं की थी. ऐसे में बीजेपी को लगता था कि अजित पवार वादे के मुताबिक देर-सबेर बहुमत के लिए जरूरी विधायकों की व्यवस्था कर लेंगे या फिर ऑपरेशन कमल के तहत दूसरे दलों के विधायकों को तोड़कर बहुमत का आंकड़ा जुटा लेंगे. मगर अनुभवी चाचा शरद पवार की सियासी चालों के आगे भतीजे अजित पवार मात खा गए.

संख्या बल का जुगाड़ न हो पाने के बाद बीजेपी खेमे में व्हिप के जरिए खेल करने पर भी विचार हुआ. प्रोटेम स्पीकर के जरिए अजित पवार के व्हिप को कानूनी मान्यता दिलाकर सरकार बचाने की संभावनाओं की बातें चलीं. मगर, इस दांव-पेच से केंद्र सरकार, राज्यपाल, विधानसभा से लेकर प्रोटेम स्पीकर की साख पर बड़े सवाल उठते. एक राउंड और सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने की आशंका थी. इस कदम से संवैधानिक रूप से छीछालेदर होने की गुंजाइश थी.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इन सब हालात से गुजरते हुए बीजेपी को जल्दबाजी में सरकार बनाने की गलती का अहसास हो चुका था. बीजेपी को लगा कि करीब 29 दिन तक सरकार न बनाकर जो जनता की सहानुभूति कमाई थी, वह बिना बहुमत के सरकार बनाने के कारण चली गई.

बीजेपी को लगा कि अजित पवार की बातों में आकर वह 'ओवर कॉन्फिडेंस' का शिकार हो गई. अजित पवार की बातों में बीजेपी इसलिए भी आई थी कि शरद और सुप्रिया के केंद्र की राजनीति में होने के कारण एनसीपी में वही अब तक विधानसभा हैंडल करते रहे. ऐसे में बीजेपी को लगा था कि अगर अजित पवार सरकार बनाने के लिए कह रहे हैं तो जरूर विधायक उनके पास होंगे.

मगर बीजेपी का अजित पवार के सहयोग से सरकार बनाने का दांव आत्मघाती साबित हुआ. पार्टी की साख और रणनीति दोनों पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं.

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