ZEE जानकारी: श्रीलंका में राष्ट्रपति गोटाबाया के शासन में एक अघोषित इमरजेंसी लगी है

नई सरकार बनने के पहले 15 दिनों में ही श्रीलंका में डर का ये माहौल दिखाई दे रहा है.

ZEE जानकारी: श्रीलंका में राष्ट्रपति गोटाबाया के शासन में एक अघोषित इमरजेंसी लगी है

अब आपको पड़ोसी देश श्रीलंका लेकर चलेंगे ताकि आप समझ सकें कि डर का असली माहौल क्या होता है? और पूरी दुनिया श्रीलंका में असहिष्णुता की चर्चा क्यों कर रही है? ये पूरा विश्लेषण देखकर आप भी कहेंगे ''शुक्र है आप श्रीलंका में नहीं हैं''

श्रीलंका में राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे की सरकार के शासन में एक अघोषित इमरजेंसी लगी हुई है. बताया जा रहा है कि वहां पर सैकड़ों पत्रकारों, Activists और सुरक्षा अधिकारियों की जिंदगी खतरे में है. 700 से ज्यादा लोगों के श्रीलंका से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. वहां के Airports अलर्ट पर हैं. ताकि कोई देश छोड़कर भाग ना पाए. नई सरकार बनने के पहले 15 दिनों में ही श्रीलंका में डर का ये माहौल दिखाई दे रहा है.

इसकी शुरुआत हुई 1 दिसंबर को. जब श्रीलंका के एक पुलिस अधिकारी निशांत सिल्वा देश छोड़कर भाग गए और अब Switzerland में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं. बताया गया कि उनको जान से मारने की धमकियां दी गई थीं. कहा जा रहा है कि निशांत सिल्वा गोटाबाया राजपक्षे और उनके भाई महिंदा राजपक्षे के खिलाफ कई मामलों की जांच कर रहे थे.

निशांत सिल्वा के फरार होने के बाद Switzerland दूतावास की एक महिला अधिकारी को हिरासत में लेकर धमकी दी गई. इस महिला अधिकारी से ये जानने की कोशिश की गई कि श्रीलंका के कितने लोग Switzerland में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं. अब Switzerland ने श्रीलंका के राजदूत को समन देकर इस मामले की पूरी जांच कराने की मांग की है.
 
श्रीलंका में डर की एक और वजह है वहां के एक अखबार के संपादक.. लसांत विक्रमतुंगा की हत्या . दावा किया जा रहा है कि गोटाबाया राजपक्षे ने इस संपादक की हत्या का आदेश दिया था. लेकिन गोटाबाया राजपक्षे ने इन आरोपों से इनकार किया है. पिछले महीने वहां गोटाबाया राजपक्षे के खिलाफ खबर लिखने वाली एक न्यूज एजेंसी पर पुलिस ने छापा मारा. एक और पत्रकार से 8 घंटे तक पुलिस ने पूछताछ की . गोटाबाया राजपक्षे के खिलाफ एक पत्रकार के गायब होने का पुराना मामला 4 दिसंबर से शुरु होना था. लेकिन अब ये मामला टल गया है. पत्रकार के परिवार का दावा है कि शायद इस मामले पर कभी सुनवाई ना हो. ऐसी घटनाओं के होने की एक बड़ी वजह ये भी है... कि श्रीलंका में दो सबसे ताकतवर पदों पर राजपक्षे परिवार का कब्जा है. इसलिए इनका विरोध करने वालों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है.

गोटाबाया राजपक्षे को उनका परिवार Terminator कहता है और मानवाधिकार संगठनों ने राजपक्षे Brothers पर भी कई गंभीर आरोप लगाए हैं. श्रीलंका में जारी असहिष्णुता की वजह जानने के लिए आपको 10 वर्ष पीछे जाना होगा.

वर्ष 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने LTTE के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन लॉन्च किया था.
इस ऑपरेशन का नेतृत्व गोटाबाया राजपक्षे ने किया था.. जो उस समय श्रीलंका के रक्षा मंत्री थे.
कहा जाता है कि गोटाबाया राजपक्षे ने LTTE विद्रोहियों के खिलाफ Death Squads का इस्तेमाल किया था
इस ऑपरेशन के अंतिम चरण में श्रीलंका के सैनिकों पर 40 हजार तमिलों के संहार का आरोप है.
और मानवाधिकारों के उल्लंघन की इस जांच के केंद्र में हैं गोटाबाया और महिंदा राजपक्षे.

पुलिस अधिकारी निशांत सिल्वा ऐसे ही कुछ मामलों की जांच कर रहे थे. लेकिन श्रीलंका की राजनीति में 10 वर्षों के बाद राजपक्षे Brothers की वापसी के बाद निशांत सिल्वा जैसे अधिकारी खतरे में हैं.

राष्ट्रपति बनते ही गोटाबाया राजपक्षे हर तरह की जांच से बाहर हो गए हैं. श्रीलंका के कानूनों के मुताबिक वहां के राष्ट्रपति पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है. हालांकि पद से हटने के बाद उनपर कानूनी कार्रवाई हो सकती है. लेकिन जिस तरीके से श्रीलंका में डर का माहौल है. हो सकता है अगले 5 सालों में गोटाबाया राजपक्षे का विरोध करनेवाला कोई बाकी ही ना रहे.

श्रीलंका के चुनाव में 52 प्रतिशत वोट मिलने के बाद गोटाबाया राजपक्षे आज अपने देश के सबसे ताकतवर नेता हैं. चुनावों के बाद गोटाबाया राजपक्षे ने सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार किए जाने का दावा किया था. वहां की बहुसंख्यक आबादी सिंहली ने उनको समर्थन दिया था, जो श्रीलंका की कुल आबादी का 75 प्रतिशत हैं और इनमें से ज्यादातर बौद्ध धर्म को मानते हैं. इसलिए गोटाबाया राजपक्षे ने राष्ट्रपति पद की शपथ श्रीलंका के एक प्राचीन बौद्ध मंदिर में ली. ताकि बहुसंख्यकों को खुश रखा जा सके. हालांकि इन वजहों से वहां पर अल्पसंख्यक डरे हुए हैं. और अब गोटाबाया राजपक्षे ने अल्पसंख्यक तमिलों के तुष्टीकरण के लिए पूर्व क्रिकेटर मुथैया मुरलीधरन को जाफना का गवर्नर बना दिया है.

अपनी राजनीतिक ताकत को और बढ़ाने के लिए गोटाबाया राजपक्षे ने अपने भाई महिंदा राजपक्षे को श्रीलंका का प्रधानमंत्री बना दिया है. कुल मिलाकर आप कह सकते हैं गोटाबाया राजपक्षे साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करके अपने विरोधियों का सफाया कर रहे हैं. श्रीलंका को आगे बढ़ने के लिए एक मजबूत लीडर की जरूरत थी. लेकिन राजपक्षे सरकार का शासन तानाशाही की तरफ जा रहा है. इससे श्रीलंका का टूरिज्म प्रभावित हो रहा है जिसका वहां की अर्थव्यस्था में बड़ा योगदान है.

श्रीलंका का ये विश्लेषण देखने के बाद आप समझ गए होंगे कि डर का माहौल क्या होता है और भारत में 135 करोड़ लोगों को कितनी आजादी मिली हुई है.