पुलवामा पर UNSC के प्रस्ताव में है भारत की प्रस्तावित भाषा

भारत ने आतंकवादी समूहों को और सीमा पार आतंकवाद को पाकिस्तान के समर्थन के कारण उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग थलग करने के लिए राजनयिक हमला तेज कर दिया है.

पुलवामा पर UNSC के प्रस्ताव में है भारत की प्रस्तावित भाषा
पुलवामा में 14 फरवरी को हुए जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे.

नई दिल्ली: पुलवामा हमले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में जैश-ए-मोहम्मद का नाम और हमले के साजिशकर्ताओं को न्याय के दायरे में लाने की अपील समेत वह विशेष भाषा प्रयोग की गई है जो भारत ने अपने सहयोगी देशों के माध्यम से प्रस्तावित की है. आधिकारिक सूत्रों ने शुक्रवार को इसकी जानकारी दी. चीन समेत 15 स्थायी और अस्थायी सदस्यों वाली सुरक्षा परिषद ने भारत के प्रति एकजुटता एवं समर्थन जताने के लिए पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ‘‘जघन्य एवं कायराना’’आतंकवादी हमले की ‘‘कड़े शब्दों में’’ गुरुवार को निंदा की.

भारत ने आतंकवादी समूहों को और सीमा पार आतंकवाद को पाकिस्तान के समर्थन के कारण उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग थलग करने के लिए राजनयिक हमला तेज कर दिया है. यूएनएससी ने प्रस्ताव में इस बात को भी दोहराया कि हर प्रकार का आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के समक्ष सबसे गंभीर खतरों में से एक है. परिषद ने आतंकवाद की इन निंदनीय करतूतों को अंजाम देने वाले, इनके आयोजकों, वित्त पोषकों और प्रायोजकों को जिम्मेदार ठहराए जाने और न्याय के दायरे में लाए जाने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया.

यहां सूत्रों ने बताया कि इस प्रस्ताव को चीन समेत सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मति से पारित किया. इसमें उस विशेष भाषा का प्रयोग किया गया जो भारत ने अपने सहयोगी देशों के माध्यम से प्रस्तावित की थी. इसमें भारत की प्रस्तावित भाषा के अनुसार जैश-ए-मोहम्मद का नाम लिया गया और साजिशकर्ताओं को न्याय के दायरे में लाए जाने की बात की गई.

सुरक्षा परिषद ने सभी देशों से अपील की कि वे पुलवामा हमले के साजिशकर्ताओं को न्याय के दायरे में लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून एवं प्रासंगिक सुरक्षा परिषद प्रस्तावों के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं के अनुसार भारत और अन्य सभी प्रासंगिक प्राधिकारियों के साथ सक्रिय सहयोग करें. इसमें यह भी दोहराया गया कि आतंकवादी करतूतें आपराधिक हैं और उन्हें न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका मकसद क्या है और उन्हें कहां, कब और किसने अंजाम दिया है. पुलवामा में 14 फरवरी को हुए जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे.

(इनपुटःभाषा)