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वैध निर्माण तोड़ने के मामले में प्रशासन बैकफुट पर, CM त्रिवेंद्र ने दिए जांच के आदेश

ये है लोकनिर्माण, सिंचाई विभाग और राजस्व विभाग के नक्शे अलग-अलग है. ऐसे में सवाल ये पैदा हो गया है कि आखिर कौन सा नक्शा सही है? इस मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने भी जांच के आदेश हैं.

वैध निर्माण तोड़ने के मामले में प्रशासन बैकफुट पर, CM त्रिवेंद्र ने दिए जांच के आदेश
जिलाधिकारी देहरादून और नगर निगम के कमिश्नर ऐसे तमाम मामलों की जांच कर रहे हैं.

देहरादून: देहरादून (Dehradun) में प्रशासन की ओर से चलाये गये अतिक्रमण हटाओ अभियान (Encroachment Removal Campaign) के तहत तोड़े गये स्थलों पर अब विवाद गहराने लगा है. प्रशासन ने बिना नक्शों का मिलान कराये एसे निर्माण ध्वस्त कर दिए जो अतिक्रमण की जद में आते ही नहीं थे. ऐसे कई लोग प्रशासन की कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट (High Court) जाने की तैयारी कर रहे हैं.

हैरान करने वाली बात ये है लोकनिर्माण, सिंचाई विभाग और राजस्व विभाग के नक्शे अलग-अलग है. ऐसे में सवाल ये पैदा हो गया है कि आखिर कौन सा नक्शा सही है? इस मामले में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने भी जांच के आदेश हैं. जिलाधिकारी देहरादून और नगर निगम के कमिश्नर ऐसे तमाम मामलों की जांच कर रहे हैं. 

नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश की आड़ में देहरादून  प्रशासन की ओर से हटाये गए. कई कब्जेदारों ने हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर ली है. प्रशासन की तरफ से बिना तैयारी के तोड़े गये भवनों के मालिकों ने प्रशासन की एक तरफा कार्रवाई को चुनौती देनी शुरू कर दी है.

सितम्बर 2019 में प्रशासन ने नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश की दलील देते हुए एक बार फिर देहरादून की सबसे प्रमुख सड़क राजपुर रोड़ के किनारे अतिक्रमण हटाने का काम शुरू किया. लेकिन यहां बिना तैयारी के ही कार्रवाई की गई. कार्रवाई के बाद अब प्रशासन के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता और प्रभावितों ने वो दस्तावेज भी हासिल कर लिये हैं, जिनसे ये साबित हो रहा है कि स्थानीय लोगों ने कोई कब्जा नहीं किया हुआ था.

आरटीआई कार्यकर्ता अनुज गुप्ता का कहना है कि कई ऐसे भवन प्रशासन ने तोड़ दिए जो अतिक्रमण की जद में आता ही नहीं. कई बार सूचना के अधिकार से शहर के बारे में जानकारी मांगी जा रही है लेकिन जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है. 

इस मामले पर सचिन गर्ग कहते हैं कि उनकी जमीन से अतिक्रमण हटाने के लिए जब टीम आई तो उनके पास कोई कागज नहीं थे. हमारी बात नहीं सुनी गई. जब हमने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो लगातार टाला जा रहा है. 

देहरादून एक एसा शहर है जिसके एक ओर मसूरी-धनौल्टी की पहाड़ियां हैं. इन पहाड़ियों से आने वाले पानी को शहर के दूसरे हिस्से तक पंहुचाने के लिए अंग्रेजों के समय में नहर बनाई गई थी. इस नहर का रख-रखाव आजादी के बाद सिंचाई विभाग के जिम्मे किया गया. पिछले कई दशकों से ये नहर बंद पड़ी हुई है. इस नहर के इर्द गिर्द कई निर्माण सरकारों की ओर से मिली मंजूरी के बाद किये गये. लेकिन अचानक प्रशासन ने ऐसे निर्माण तोड़ने शुरू कर दिये जो अतिक्रमण के दायरे में आते ही नहीं थे. 

अधिकारियों ने कहीं तो लोक निर्माण विभाग के नक्शे का इस्तेमाल किया तो कहीं सिंचाई विभाग का. जब अधिकारियों को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होनें सैकड़ों साल पुराने वो निशान मिटाने शुरू कर दिए जिससे सड़क की पैमाइश की जाती है.

इस मसले पर कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना कहते हैं कि नैनीताल हाईकोर्ट की आड़ में प्रशासन ने मनमाने पूर्ण तरीके से कई निर्माण ध्वस्त किए हैं. कई लोगों को जानबूझकर प्रशासन ने निशाना बनाया है. यह सब सरकार के इशारे पर किया जा रहा है जबकि बीजेपी नेता सुभाष बड़थ्वाल का कहना है कि अधिकारियों ने कार्रवाई करने से पहले पूरी तैयारी निश्चित रूप से की होगी. लेकिन अगर किसी का अवैध निर्माण भी टूट गया है तो इसके लिए तमाम ऐसे विभाग हैं, जहां सुनवाई की जा सकती है. 

आपको बता दें कि देहरादून में अतिक्रमण हटाने को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने 2018 में एक आदेश पारित किया था. इस पर प्रशासन ने कई हिस्सों में अतिक्रमण हटाया भी लेकिन नदियों की जमीन पर बसे कब्जेदारों को राहत देने के लिए सरकार पहले तो अध्यादेश लेकर आई और बाद में विधानसभा से कानून पास करवाकर अतिक्रमण करने वालों को वोट बैंक के लालच में राहत दे दी. 

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इसके बाद शहर में अतिक्रमण हटाने के नाम पर एसे लोगों के वैध निर्माण तोड़ डाले जिनकी पैमाइश के लिए किस नक्शे का इस्तेमाल किया जाना है. इसका पता प्रशासन को है ही नहीं. कई पीड़ित लोगों ने सभी दस्तावेजों के साथ जिलाधिकारी कोर्ट में अपील दायर की हुई है. जबकि कई प्रभावित, प्रशासन को चुनौती देते हुये अब इस मामले को लेकर हाईकोर्ट जाने की तैयारी में हैं. इस मामले पर पहले से ही राजनीति होती रही है.

प्रशासन की कमजोर कड़ी के पकड़ में आते ही विपक्ष एक बार फिर से हल्ला बोलने के लिए तैयार हो गया है तो बीजेपी भी दबी जुबान में मान रही है कि कुछ गड़बड़ तो हो ही गई है. अब देखना यह है कि आखिर मुख्यमंत्री के आदेश पर हो रही जांच में क्या निकलता है और गड़बड़ करने वाले किन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाती है.