यूपी में महिलाओं के बूते चुनावी नैया पार करने की जुगत में पार्टियां

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का रण शुरु हो गया है और चुनावी पारा तेजी से गर्माता जा रहा है यूपी में चुनावी रैलियां और प्रचार शबाब पर चढ़ रहा है। ऐसे राजनैतिक माहौल में अगर आधी आबादी यानि महिलाओं की बात ना की जाए तो बात अधूरी सी रहेगी।

यूपी में महिलाओं के बूते चुनावी नैया पार करने की जुगत में पार्टियां
फाइल फोटो

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का रण शुरु हो गया है और चुनावी पारा तेजी से गर्माता जा रहा है यूपी में चुनावी रैलियां और प्रचार शबाब पर चढ़ रहा है। ऐसे राजनैतिक माहौल में अगर आधी आबादी यानि महिलाओं की बात ना की जाए तो बात अधूरी सी रहेगी।

यूं तो हर राजनीतिक दल महिलाओं की भागीदारी की पर्याप्त भागीदारी की बात कहता है मगर जब टिकट देने की बात आती है तब ये सभी दल अपने वायदों पर अकसर खरा नहीं उतरते हैं।

मगर इस बार लगता है कि यूपी में महिलाओं के जिम्मे इस चुनाव की बढ़ी जिम्मेवारी है और हर राजनीतिक दल महिलाओं के बूते चुनावी रण जीतने का दांव चलने की तैयारी में है।

वैसे तो हर पार्टी महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए महिला प्रचारकों का इस्तेमाल करती आई हैं। बीजेपी की स्टार प्रचारकों में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, उमा भारती, साध्वी निरंजन ज्योति, सांसद हेमा मालिनी आदि वोट मांगती नजर आएंगी,क्योंकि केंद्र में सत्तारूढ़ इस पार्टी ने मुख्यमंत्री चेहरा के रूप में किसी को आगे नहीं किया है, पार्टी को भरोसा है कि उसे मोदी के नाम पर वोट मिलेंगे और बहुमत भी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बेटी-बहू यानी प्रिंयका गांधी और डिंपल यादव की जोड़ी कांग्रेस-एसपी के संभावित गठबंधन के लिए सरप्राइज पैकेज मानी जा रही है। समाजवादी पार्टी भी कन्नौज से सांसद डिंपल यादव को यूपी और उत्तराखंड में चुनाव प्रचार की खास जिम्मेदारी देने जा रही है।

कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी, डिंपल के साथ मंच साझा कर सकती हैं। हालांकि कांग्रेस की मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में दिल्ली से यूपी आईं शीला दीक्षित गठबंधन के बाद अब पार्टी के लिए प्रचार भर करेंगी।

प्रियंका अमेठी-रायबरेली में कांग्रेस का प्रचार संभालने के अलावा प्रदेश के कार्यकर्ताओं से लगातार संपर्क में रही हैं। पिछले कुछ महीने से प्रदेश में कांग्रेस की तमाम तैयारियों से जुड़ी मीटिंग में वह हिस्सा लेती रही हैं। डिंपल यादव 2009 में राज बब्बर से हारने के बाद भी डिंपल यादव सीमित रूप से, लेकिन राजनीति में सक्रिय रहीं, वहीं 2012 के चुनाव में वह अखिलेश के साथ कई मौकों पर नजर आईं।

2014 की मोदी लहर में भी वह कन्नौज लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहीं। संसद से लेकर प्रदेश की राजनीति में वह पिछले एक-डेढ़ साल के दौरान काफी सक्रिय दिखीं।

अखिलेश और राहुल के रणनीतिकारों का मानना है कि प्रियंका गांधी-डिंपल यादव को बेटी-बहू के रूप में पेश किया जा सकता है। डिंपल यादव को प्रदेश की बहू और प्रियंका को प्रदेश की बेटी के रूप में पेश किया जा सकता है। इस जोड़ी से ग्रामीण और शहरी, दोनों जगहों की महिलाएं ज्यादा कनेक्ट होंगी।

कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव इस बार उन्हें विभिन्न रैलियों को संबोधित करते और पार्टी के लिए वोट मांगते देखा जा सकता है। इसके साथ ही वह उत्तराखंड में भी पार्टी की ओर से प्रचारकों की सूची में शीर्ष पर रह सकती हैं।

दोनों महिला नेताओं के प्रति युवा वोटरों में जबरदस्त क्रेज है। युवा वोटरों द्वारा इस गठबंधन का समर्थन करने से जातीय दीवारें ढह जाएंगी। दरअसल, गठबंधन को ऐसी जातियों का वोट मिल सकता है जो अभी तक इस गठबंधन को नहीं मिला है। प्रियंका-डिंपल को एक साथ उतारने के पीछे यह भी रणनीति है कि इनकी काट बीजेपी के पास नहीं दिख रही है।

वहीं मायावती पर अभद्र टिप्पणी कर बीजेपी से निष्कासित दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह बसपा के जवाबी हमले के खिलाफ आवाज उठाकर मीडिया में छा गई थीं, जिसके बाद उन्हें यूपी भाजपा महिला मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था उन्हें भी बीजेपी ने लखनऊ से चुनावी मैदान में उतारा है।

बसपा की कद्दावर महिला नेता मायावती पार्टी में एकमात्र बड़ा महिला चेहरा हैं और वह अपने दम पर अकेले ही चुनाव जीतकर सरकार बनाने का दमखम रखती हैं। इस बार भी अकेले अपने दम पर चुनाव प्रचार कर चौथी बार सूबे की मुख्यमंत्री बनने की पुरजोर कोशिश करेंगी। हालांकि, मायावती ने पार्टी में कई महिला नेताओं को टिकट देकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह महिलाओं को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं और महिला सशक्तीकरण उनके लिए बड़ा मुद्दा है।

गौरतलब है कि हाल के तमाम चुनावों में महिला वोटरों ने चुनावी परिणाम को प्रभावित करने की दिशा में अहम भूमिका निभाई है। कड़े मुकाबले में जिस तरफ भी महिला वोटरों का झुकाव हुआ, उस दल या गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की।

बिहार और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में भी ऐसा हुआ। नीतीश कुमार ने शराबबंदी और महिलाओं को पंचायत और नौकरी में आरक्षण के दांव के साथ महिलाओं का समर्थन पाया।अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में पहली बार महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले 15 फीसदी ज्यादा वोट डाले थे।

ये दीगर बात है कि उत्तर प्रदेश में विजयश्री किस दल को मिलती है, कौन पार्टी यूपी पर राज करेगी, मगर इस बार के यूपी विधानसभा चुनावों में महिलाओं की भूमिका को लेकर चुनावी परिदृश्य काफी दिलचस्प रहने वाला है।