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अयोध्या की ऐतिहासिक तारीख, 9 नवंबर को पहले भी गिरती आई हैं द्वेष की दीवारें

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के विवादित जमीन पर राममंदिर का निर्माण का फैसला दिया है. 

अयोध्या की ऐतिहासिक तारीख, 9 नवंबर को पहले भी गिरती आई हैं द्वेष की दीवारें

नई दिल्ली: अयोध्‍या मामले का बहुप्रतीक्षित फैसला आ गया है. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने शनिवार (9  नवंबर) को अपना ऐतिहासिक फैसला दिया. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) ने राममंदिर के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘मुस्लिम पक्ष अपने साक्ष्यों से यह सिद्ध नहीं कर पाया कि विवादित भूमि पर उनका एकाधिकार था. इसके बाहरी प्रांगण में हिंदू पूजा करते रहे हैं. इस पर मंदिर बनाया जाए. केंद्र सरकार तीन महीने में मंदिर निर्माण की योजना बनाए. मस्जिद के लिए अलग जमीन दी जाए. 

अयोध्या मामले (Ayodhya Case) में एक बात यह भी महत्वपूर्ण है कि यह फैसला 9 नवंबर को आया है. इतिहास की नजर से देखें तो 9 नवंबर पहले भी जोड़ने वाला साबित हुआ है. 30 साल पहले आज ही के दिन पूर्वी जर्मनी और पश्चिम जर्मनी बर्लिन की दीवार (The Berlin Wall) तोड़कर एक हो गए थे. इस दीवार को बनाने में जितना पूर्वी और पश्चिम जर्मनी जिम्मेदार थे, उतना ही अमेरिका-रूस जैसी बाहरी ताकतें भी जिम्मेदार थीं. विदेशी ताकतें चाहती थीं कि ये दोनों देश एक ना हो सकें. बहरहाल, जर्मनी साजिशों की दीवार तोड़ ना सिर्फ एक हुआ, बल्कि इसके बाद उसने दुनिया में अहम मुकाम भी बनाया. 

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अयोध्या मामले पर फैसले के बाद भारत के लिए भी 9 नवंबर की तारीख ऐतिहासिक हो गई है. उम्मीद की जा रही है कि यह तारीख भारत के दो प्रमुख समुदायों हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द बढ़ाने में मददगार साबित होगी. अयोध्या मामले में शामिल ज्यादातर पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है. इसलिए यह उम्मीद है कि इस 134 साल पुराने मामले का पटाक्षेप हो गया है. 

हालांकि, इस मामले में शामिल सुन्नी वक्फ बोर्ड, शीर्ष अदालत के फैसले से थोड़ा असंतुष्ट भी है. लेकिन उसने ऐसी कोई बात नहीं कही है, जो दो समुदायों के बीच दीवार खड़ी करने वाली हो. सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने कहा, ‘हम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं, लेकिन हम इससे संतुष्ट नहीं हैं. हम कोर्ट का फैसला पढ़कर आगे की रणनीति तैयार करेंगे.’ 

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बता दें कि अयोध्या मामला पहली बार 1885 में कोर्ट में आया था. तब महंत रघुबीर दास ने फैजाबाद कोर्ट में याचिका दायर कर विवादित ढांचे के बाहर शामियाना लगाने की इजाजत मांगी थी. मामला आगे बढ़ता रहा और 1949 में विवादित परिसर के भीतर रामलला की मूर्तियां रख दी गईं. साल 1984 में इसका ताला खुलवाया गया. छह दिसंबर 1992 को आंदोलनकारी भीड़ ने विवादित ढांचा ढहा दिया. साल 2002 में हाईकोर्ट ने विवादित जमीन मामले में सुनवाई की. साल 2010 में हाईकोर्ट ने इस पर फैसला दिया. 

जाहिर है, इन तमाम बरसों में मंदिर-मस्जिद विवाद ने देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक दीवार भी खड़ी की. राजनीति ने इस दीवार को समय-समय पर चौड़ा भी किया. बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट ने यह दीवार गिरा दी है. कोर्ट के इस फैसले ने उन विदेशी ताकतों की साजिश को तार-तार कर दिया है, जो चाहती हैं कि भारत जाति-धर्म में बंटा रहे.