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यूपी उपचुनाव में BSP प्रत्याशियों की जब्त हुई जमानत, मायावती कहां कर रही हैं चूक?

BSP मुखिया 2022 में सत्ता वापसी के सपने को UP उपचुनाव के नतीजों ने चकनाचूर कर दिया. इगलाश व जलालपुर सीट छोड़कर सबमें BSP का प्रदर्शन खराब ही रहा है.

यूपी उपचुनाव में BSP प्रत्याशियों की जब्त हुई जमानत, मायावती कहां कर रही हैं चूक?
यूपी उपचुनाव में बीएसपी की करारी हार हुई है.

लखनऊ: समाजवादी पार्टी (सपा) से गठबंधन तोड़कर अकेले उपचुनाव में उतरी बहुजन समाज पार्टी (BSP) को बुरी पराजय मिली है. वह इस चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल सकी. इसके अलावा 6 सीटों पर उसकी जमानत भी जब्त हो गई. ऐसे में आने वाले समय में BSP को अपनी रणनीति बदलकर अपने कोर वोटरों को बचाए रखने की बड़ी चुनौती है. उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र और हरियाणा में BSP का खाता नहीं खुला है. जहां पर मायावती (Mayawati) स्वयं प्रचार करने भी गयीं थी. BSP मुखिया 2022 में सत्ता वापसी के सपने को उपचुनाव के नतीजों ने चकनाचूर कर दिया. इगलाश व जलालपुर सीट छोड़कर सबमें BSP का प्रदर्शन खराब ही रहा है.

BSP प्रत्याशियों की जमानत जब्त
रामपुर, लखनऊ कैंट, जैदपुर, गोविंदनगर, गंगोह और प्रतापगढ़ ऐसी ही सीटें हैं, जहां BSP अपनी जमानत नहीं बचा पाई. जमानत बचाने के लिए कुल पड़े वैध वोटों का 16.66 फीसदी चाहिए होता है लेकिन, BSP को रामपुर में 2.14 फीसदी, लखनऊ कैंट में 9.64 फीसदी, जैदपुर में 8.21 फीसदी, गोविंद नगर में 4.52 फीसदी, गंगोह में 14.37 फीसदी और प्रतापगढ़ में 12.74 फीसदी वोट में सिमट गई. विधानसभा चुनाव में BSP का मत सपा से पांच फीसदी कम रहा. सपा को जहां 22.57 प्रतिशत वोट मिले तो वहीं BSP को महज 17 प्रतिशत में ही संतोष करना पड़ा.

दलित मुस्लिम के बने गठजोड़ पर समाजवादी पार्टी ने सेंधमारी की है. मुस्लिम बहुल रामपुर सीट पर BSP महज 2 प्रतिशत वोटों में ही समिट गई है. सुरक्षित सीटों पर तो उसे मुंह की खानी पड़ी है. बलहा सुरक्षित सीट पर तीसरे स्थान पर रही, जबकि जैदपुर सुरक्षित सीट पर अपनी जमानत भी नहीं बचा पाई है.

BSP कार्यकर्ता कह रहे- 'जमीन पर उतरिए बहन जी'
लोकसभा चुनाव में 10 सीट जीतकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में दोबारा मजबूत हुई BSP को उपचुनाव किसी झटके से कम नहीं साबित हो रहे हैं. BSP विपक्ष में नंबर दो की भूमिका आने के लिए जी जान से लगी हुई थी. ऐसे में BSP का वोट प्रतिशत कम होना और एक भी सीट न मिलना उसे नए सिरे से अपनी रणनीति पर मंथन के लिए मजबूर करेगा.

BSP के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि '2022 में सत्ता पाने के लिए कार्यकर्ताओं के साथ बहन जी को भी जमीन पर उतरना होगा. जिस प्रकार से लोकसभा में मिली सफलता को महज 6 माह में धूमिल हो गई. उससे पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं है. सपा से तो हम पिछड़ गए. कुछ सीटों पर जिनका प्रदेश में वजूद नहीं है, वह कांग्रेस भी हमसे आगे रही. विधानसभा के आम चुनाव के मुकाबले में हमारा 5 प्रतिशत वोट कम होना बड़ी असफलता है. पार्टी के सामने मिशन 2022 जीतने के लिए अपने मुख्य 18 प्रतिशत वोटरों को साधने की बड़ी चुनौती है, जिससे निपटा जाएगा.'

'फरमान वाली राजनीति का दौर गया बहन जी'
18 प्रतिशत पर दावा करने वाली BSP का कुछ सीटों पर दहाई ना पार कर पाना यह संकेत करता है कि उसका कोर वोटर भी उसके पाले से छिटक कर या तो भाजपा में जा रहा है या फिर अपना भविष्य कांग्रेस और सपा में देख रहा है. ऐसे में मिशन 2022 में इन्हें संजोना BSP के सामने बड़ी चुनौती है.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रेमशंकर मिश्रा का कहना है कि BSP प्रमुख को यह समझना होगा कि अब राजनीति में 'फरमान संस्कृति' के लिए जगह नहीं बची है. अब चाहे मतदाता हो या समर्थक, वह अपने नेता से संवाद चाहता है. उसके मुद्दे व सवालों पर कितना खड़े हैं, इसका आंकलन करता है. BSP सपा के साथ का फायदा उठाकर लोकसभा चुनाव में बेहतर परिणाम देने में सफल रही थी. लेकिन उसके बाद से जनता के सवालों पर केवल बयानबाजी तक ही समित रही है. अब ऐसे में वह जमीन उतरकर कैडर को खड़ा नहीं करेंगे. तो उनका कोर वोटर बचा पाना संभव नहीं होगा. उपचुनाव में कांग्रेस से पिछड़ा और आधा दर्जन सीटों पर जमानत जब्त होना, यह साबित करता ह हांथी के पांव के नीचे जमीन खिसक रही है.