एक युद्ध ने बदल दिया था बुंदेलखंड के इस जिले में रक्षाबंधन का रिवाज, सावन नहीं भाद्रपद में बंधती है राखी

बुंदेलखंड में कजली मेला लगता है. ऐसे में जब कजली विसर्जित की जाती है, उसके बाद ही राखी बांधी जाती है. हालांकि इस बार कोरोना वायरस का असर कजली मेले पर भी पड़ा. कजली महोत्सव न होने से रक्षाबंधन का रंग भी जरा फीका ही दिख रहा है. 

एक युद्ध ने बदल दिया था बुंदेलखंड के इस जिले में रक्षाबंधन का रिवाज, सावन नहीं भाद्रपद में बंधती है राखी
सांकेतिक तस्वीर

महोबा: रक्षाबंधन पूरे देश में सावन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड का एक जिला है- महोबा, जहां रक्षाबंधन को पूर्णिमा के अगले दिन यानि भाद्रपद की शुरुआत में मनाया जाता है. महोबा की इस परंपरा के पीछे की वजह भी दिलचस्प है. कहते हैं एक युद्ध ने इस इलाके में रक्षाबंधन को एक दिन आगे बढ़ा दिया था.

आल्हा-ऊदल और पृथ्वीराज चौहान के बीच हुआ था युद्ध
दिल्ली के तत्कालीन राजा पृथ्वीराज चौहान और महोबा के वीर आल्हा-ऊदल के बीच 837 साल पहले युद्ध चल रहा था. बताते हैं ये युद्ध रक्षाबंधन के रोज तक चलता रहा. यही वजह है कि आल्हा और ऊदल के न लौटने पर सावन पूर्णिमा पर उनकी बहनें राखी नहीं बांध पाईं. जब अगले दिन युद्ध खत्म हुआ तो कजली विसर्जित करके उन्होंने अपने भाइयों के हाथ में राखी का धागा बांधा और तब से ये परंपरा चल पड़ी.  

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बुंदेलखंड की शान हैं आल्हा-ऊदल 
11वीं सदी में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने अपने 7 लाख सैनिकों के साथ महोबा के राजा परमाल पर आक्रमण कर उनसे युद्ध न करने की 5 शर्तें रखीं. राजा ने पांचों शर्तें खारिज कर दीं. ऐसे में युद्ध हुआ और राजा परमाल के दो वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल ने पृथ्वीराज की सेना के छक्के छुड़ा दिए. ये युद्ध सावन पूर्णिमा तक चला. ऐसे में भाद्रपद के पहले दिन या फिर बुंदेलखंड में परमा तिथि को कजली विसर्जित करके बहनों ने भाइयों को राखी बांधी. 

बुंदेलखंड में लगता है कजली मेला 
बुंदेलखंड में कजली मेला लगता है. ऐसे में जब कजली विसर्जित की जाती है, उसके बाद ही राखी बांधी जाती है. हालांकि इस बार कोरोना वायरस का असर कजली मेले पर भी पड़ा. कजली महोत्सव न होने से रक्षाबंधन का रंग भी जरा फीका ही दिख रहा है. 

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