close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

चंद्रशेखर को इस रूप में कतई नहीं अपना सकती बहुजन समाज पार्टी

चंद्रशेखर अभी राजनेता नहीं बने हैं, बल्कि वह एक किस्म के युवा आकर्षण हैं.

चंद्रशेखर को इस रूप में कतई नहीं अपना सकती बहुजन समाज पार्टी
दलित नेता चंद्रशेखर को 14 सितंबर को जेल से रिहा किया गया.(फाइल फोटो)
Play

नई दिल्‍ली: सहारनपुर में डेढ़ साल पहले महाराणा प्रताप जयंती के दौरान शुरू हुई हिंसा और उसके बाद हुई प्रतिहिंसा से दलितों के बीच एक नया आकर्षक चेहरा पैदा हुआ, जिसे चंद्रशेखर आजाद के नाम से जाना गया. चंद्रशेखर ने सहारनपुर हिंसा के तुरंत बाद निषेधाज्ञा को धता बताते हुए दिल्ली के जंतर-मंतर पर सभा की और उसके कई दिन बाद तक वह पुलिस हिरासत में नहीं आए. लेकिन जब एक बार पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया, तो इस तरह की भावना बनी कि उन्हें पुलिस हिरासत में प्रताड़ित किया जा रहा है. खासकर जब व्हील चेयर पर बैठे चंद्रशेखर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं तो इस भावना को बल मिला. लेकिन अब जब चंद्रशेखर जमानत पर जेल से रिहा हो गए हैं और पुलिस इसका कारण उनकी माता जी के खराब स्वास्थ्य के कारण पैदा हुई मानवीय संवेदना बता रही है, तब चंद्रशेखर यह कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के डर से सरकार ने उन्हें छोड़ा है.

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक सोच-विचार तो होगा ही. चंद्रशेखर ने रिहा होते ही बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती को अपनी बुआ बताया और खुद को बसपा का पूरी तरह से हितैषी साबित करने वाले बयान दिए. इसके जवाब में लंबे समय से मीडिया से दूर रहीं मायावती सामने आईं और कहा कि उनका या उनकी पार्टी का चंद्रशेखर से कोई वास्ता नहीं है. चंद्रशेखर जोर जबरदस्ती की रिश्तेदारी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. वह उन्हें कतई पसंद नहीं है.

चंद्रशेखर 'रावण' ने कहा 'बुआ', लेकिन मायावती बोलीं कि मेरा उनसे कोई नाता नहीं

मायावती का रुख
सवाल यह है कि मायावती ने इतनी तत्परता से चंद्रशेखर से क्यों अपना पल्ला झाड़ा. इसकी एक वजह तो यह कही जा सकती है कि बहुजन समाज पार्टी में पहले कांशीराम और फिर मायावती के बाद कोई भी ऐसा नेता न तो रहा और न है, जिसकी किसी भी तरह की कोई सार्वजनिक पहचान हो. अगर बहुजन समाज पार्टी चंद्रशेखर जैसे किसी व्यक्ति को अपने भीतर दाखिल होने देती है तो उसके साथ ही चंद्रशेखर का चेहरा और उनकी आवाज भी दाखिल हो जाएगी, जो बहुजन समाज पार्टी की अब तक की रीति-नीति से उलट चीज होगी. बसपा में किसी के भी नेता बनने की जगह नहीं है और अगर कोई नेता बनता भी है तो समय रहते उसे निकाल दिया जाता है. ऐसे में चंद्रशेखर के लिए बहुजन समाज पार्टी के संगठन में कोई जगह नहीं बचती.

रिहाई के बाद चंद्रशेखर 'रावण' ने किया मायावती को सलाम, कहा- 'बुआ ने अपने कार्यकाल में बहुत काम किए'

mayawati and azad
चंद्रशेखर ने जेल से रिहा होने के बाद मायावती को 'बुआ' कहा. लेकिन बीएसपी सुप्रीमो ने कहा कि भीम पार्टी के नेता दलितों के हितैषी नहीं हैं.(फाइल फोटो)

'बसपा बनी रही अहिंसक पार्टी'
दूसरी बात जरा गहरी है. अगर हम बहुजन समाज पार्टी को शुरू से देखें यानी इसके पार्टी के स्वरूप में आने से और पहले से, तो पाएंगे कि मान्यवर कांशीराम ने इसकी स्थापना सबसे पहले दलित वर्ग के मध्यमवर्गीय या नौकरी पेशा तबके में की. जब उन्होंने मध्यमवर्ग में अच्छी पैठ बना ली, तब यहां से होते हुए वह दलित आमजन तक पहुंचे. उन्होंने जो रणनीति बनाई वह विचारों के स्तर पर तो महात्मा गांधी के बिल्कुल उलट थी और कभी-कभी तो महात्मा गांधी उसमें एक खलनायक जैसे दिखाई देते थे, लेकिन अपने कार्य व्यवहार में वह पूरी तरह से गांधीवादी रहे. भारत में अब तक जो भी राजनीतिक पार्टियां बनी हैं, कांग्रेस को छोड़कर, तो उनमें कहीं न कहीं हिंसा का तत्व जरूर रहा है. चाहे वह वामपंथी दल हों, चाहे वह समाजवादी परिवार के दल हों, द्रविड़ पार्टियां हों. इन सबमें कहीं ना कहीं उग्र आंदोलन और आंशिक हिंसा की जगह रही है.

'रावण' से 'आजाद' हुए दलित नेता चंद्रशेखर, कहा- जो बोलेगा उसे कोर्ट ले जाऊंगा

इनके बनिस्बत बहुजन समाज पार्टी विशुद्ध रूप से अहिंसक पार्टी है. इसके विचारों में गुस्सा और घृणा हो सकती है, लेकिन बहुजन समाज पार्टी ने अपने कार्य व्यवहार में किसी भी तरह की हिंसा को शामिल नहीं होने दिया है. कांशीराम ने दलितों को पूरी तरह से जोड़ा और खामोशी से एक चेन रिएक्शन की तरह काम किया. इसमें गरीब से गरीब दलित ने अपने आपको इस आंदोलन से जोड़ा, इसके लिए काम किया और जो बन पड़ा आर्थिक रूप से भी सहयोग किया. और देखते-देखते अनेक झंझावातों से गुजरते हुए 1995 में मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बन गई.

लेकिन उसके बाद भी बसपा ने किसी तरह की सार्वजनिक हिंसा को अपने भीतर स्थान नहीं दिया. अगर गौर से देखें तो जब बहुजन समाज पार्टी सत्ता से बाहर भी रही तब भी उसने सत्ताधारी सरकार के खिलाफ कभी कोई आंदोलन नहीं किया, कहीं कोई तोड़फोड़ नहीं की. और वह आज तक इस सिद्धांत पर कायम है.

बहुजन समाज पार्टी देश की तीसरी सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी
अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए मायावती ने बड़ी से बड़ी रैलियों को अपना माध्यम बनाया. उनकी रैलियों में जिस कदर की भीड़ आज भी आती है, उससे देश के बड़े से बड़े और आर्थिक रूप से संपन्न दलों के नेता भी भय खाते हैं. यही बहुजन समाज पार्टी की राजनीति का DNA है और इसी के दम पर लोकसभा चुनाव 2014 में बहुजन समाज पार्टी देश की तीसरी सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी बनी रही, हालांकि उसे लोकसभा में एक भी सीट नहीं मिली.

चंद्रशेखर की राजनीति
दूसरी तरफ चंद्रशेखर की राजनीति है. असल में वह अभी राजनेता नहीं बने हैं, बल्कि वह एक किस्म के युवा आकर्षण हैं. शब्बीरपुर और उसके बाद हुई दलित हिंसा के वह नेतृत्वकारी नहीं थे, बल्कि जिस तरह की परिस्थितियां पैदा हुईं थी और दलितों में जो गुस्सा पनपा था, उसकी नुमाइंदगी का एक अच्छा मौका उन्हें मिल गया था. यानी उन्होंने आंदोलन पैदा नहीं किया, आंदोलन की रहनुमाई का मौका उन्हें मिल गया. और उसके बाद से वह लगातार जेल में हैं. अब वह छूटे हैं, तो उन्हें दिखाना होगा कि उनमें दलित समाज को संगठित करने की क्षमता भी है. या सिर्फ वह उग्र नारेबाजी ही कर सकते हैं और अगर वह इसी तरह की उग्र बातें करते रहे, तो बहुजन समाज पार्टी के दरवाजे उनके लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे.

हो सकता है, अगर वह किसी तरह से अपना संगठन बना लें, तो वह बहुजन समाज पार्टी को ही नुकसान पहुंचाएं. लेकिन उनका उभार निश्चित तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित बनाम सवर्ण की एक उग्र राजनीति को जन्म दे सकता है. जिस तरह की उग्र राजनीति कभी बिहार में रणवीर सेना बनाम दलितों के बीच दिखाई देती थी. लेकिन उत्तर प्रदेश के हालात उस तरह के नजर नहीं आते. यहां बसपा पहले से ही बहुत मजबूत है और उसकी राजनीति में दलितों का यकीन है. ऐसे में बहुत संभव है कि चंद्रशेखर कुछ गैर-दलित अस्मिताओं के प्रतीकों के हाथ में खेल जाएं और एक जुगनू की तरह चमककर जल्द ही बुझ जाएं.