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उत्तराखंड के इस टीचर को लोग क्यों कहते हैं 'पेड़ वाले गुरूजी', जानिए पूरी कहानी

पिछले 14 सालों की मेहनत को देखते हुए पेड़ वाले गुरूजी की मुहिम से अब हाफला घाटी के करीब 1 दर्जन से अधिक ग्रामीण भी जुड़ गए हैं.

उत्तराखंड के इस टीचर को लोग क्यों कहते हैं 'पेड़ वाले गुरूजी', जानिए पूरी कहानी
43 वर्षीय धन सिंह घरिया ना सिर्फ शिक्षकों के लिए मिसाल हैं. बल्कि, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उनके किए जा रहे कार्य भी लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं.

चमोली: देवभूमि उत्तराखंड ऐसी भूमि है जहां से विश्व प्रसिद्ध चिपको आंदोलन का श्रीगणेश हुआ. गौरा देवी, सुन्दरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट सहित कई पर्यावरणविदों ने उत्तराखंड के पर्यावरण संरक्षण में अहम योगदान दिया है. अब इस कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं पेड़ वाले गुरुजी. जी हां, ये पेड़ वाले गुरुजी पिछले 14 सालों से 80 हजार से अधिक पेड़ लगा चुके हैं.

 

 

धन सिंह घरिया को ग्रामीणों ने दिया पेड़ वाले गुरुजी का सम्मान
आज के दौर में जब कोई भी शिक्षक पहाड़ में टिकना नहीं चाहता और लगातार ट्रांसफर के खेल में लगा रहता है. इस दौर में भी 43 वर्षीय धन सिंह घरिया ना सिर्फ शिक्षकों के लिए मिसाल हैं. बल्कि, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उनके किए जा रहे कार्य भी लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं. राजनीति विज्ञान के शिक्षक धन सिंह 2006 से चमोली गढ़वाल के सीमान्त हापला घाटी के जीआईसी गोदली में पढ़ा रहे हैं. धन सिंह ने अपने स्कूल प्रांगण में सौ प्रकार के पेड़ों का जंगल तैयार कर दिया है. जिसमें पांगर, अंगा, संतरा, अखरोट, देवदार, सुरई, थुनेर, नीबू, बांजप, बुरांश, मोरु, आंवला, रुद्राक्ष, रिंगाल, किरमोड और भीमल के पेड़ लगाए हुए हैं. जीआईसी गोदली में करीब आधा दर्जन गांवों के बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं.

 

कभी ट्रांसफर के लिए आवेदन नही किया-धन सिंह घरिया
राजनीति विज्ञान पढ़ा रहे धन सिंह बताते हैं कि वे 2006 से इस विद्यालय में पढ़ा रहे हैं. उन्होने कभी भी अपने तबादले के लिए कोशिश नहीं की. उन्होंने कहा कि वे शैक्षणिक कार्य के दौरान वृक्षारोपण नहीं करते हैं. स्कूल में पढ़ाने के बाद छात्र-छात्राओं और ग्रामीणों की मदद से फलदार और चौड़ी पत्ती के वृक्षों को लगाते हैं. धन सिंह कहते हैं कि केदारनाथ वन्य जीव प्रभाग, कल्पतरु, दशोली ग्राम स्वराज मंडल वृक्षारोपण में उनकी काफी मदद करते हैं. इनके ही सहयोग से वे कई वर्षो से वृक्षारोपण कर रहे हैं.

जीआईसी गोदली में प्रदेश की पहली नर्सरी भी की विकसित
जीआईसी गोदली में धन सिंह धरिया ने पहली नर्सरी भी विकसित है. इसमें अखरोट, रीठा, डैंकण, बांज, बुरांश, देवदार, सुरई, पैंया और पंगु वृक्षों की पौध तैयार की जाती है. इस वर्ष भी धन सिंह ने करीब 5 हजार से अधिक वृक्षों को ग्रामीणों और छात्र छात्राओं की मदद से लगाया है. धन सिंह ने नर्सरी की सुरक्षा के लिए गांव के एक आदमी को गार्ड के रुप में तैनात किया है, जिसे वे अपनी जेब से 6 हजार प्रति महीना देते हैं.

धन सिंह हर साल लेते है 5 बच्चो को गोद
धन सिंह धरिया दर्जनों अनाथ बच्चों को भी गोद ले चुके हैं. हर वर्ष 5 लड़कियों को गोद लेते हैं. इस वर्ष भी उन्होंने कक्षा 12 की सीमा, मीनाक्षी और गंगा जबकि इंदु और प्रांजलि कक्षा 11 की बालिकाओं को गोद लिया है. धन सिंह बताते हैं कि प्रांजलि मसोली गांव की छात्रा है, जिसके माता-पिता की बीमारी के बाद मौत हो गई. उन्होंने बताया कि केदारनाथ आपदा के बाद उन्होंने 49 अनाथ बच्चों को ना सिर्फ पढ़ाया है, बल्कि उन्हे सहारा भी दिया है.

पेड़ वाले गुरुजी का हर जगह हो रहा है सम्मान
पर्यावरण के क्षेत्र में धन सिंह घरिया को 2013 में राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. वन विभाग ने इस वर्ष 26 जनवरी को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ठ कार्य के लिए सम्मानित किया है. शिक्षा विभाग ने भी 15 अगस्त को तरुश्री सम्मान दिया गया है. इसमें 1 लाख रुपये का नगद पुरस्कार विद्यालय को दिया गया है. धन सिंह घरिया के सहयोगी शिक्षक प्रदीप बिष्ट बताते हैं कि वे भी 2006 से जीआईसी गोदली में पढ़ा रहे हैं. प्रदीप बिष्ट कहते हैं कि वे स्कूल के समय पढ़ाते है और जब छुट्टी हो जाती है, तो वृक्षारोपण का कार्य करते हैं. उन्होंने सात गांवों की महिला मंगल दल और ग्राम पंचायतों को जोड़ दिया है. पिछले 13 सालों से धन सिंह तुंगनाथ चोपता में सफाई अभियान चला रहे हैं.

रंग ला रही है पेड़ वाले गुरुजी की मुहिम
हाफला घाटी के कलतीर गांव के प्रधान हुकुम सिंह बताते हैं कि पेड़ वाले गुरुजी की मेहनत रंग ला रही है. गांव के आसपास जो जलस्रोत सूख गए थे, वो फिर से रिचार्ज हो गए हैं. पर्यावरण संरक्षण ही नहीं बल्कि जंगलों में आग बुझाने के लिए प्रयास करते है. हुकुम सिंह कहते हैं कि जीआईसी गोदली में कई शिक्षक आए और गए लेकिन पेड़ वाले गुरुजी का भगीरथ प्रयास आज भी जारी है. पिछले 14 सालों की मेहनत का फल अब ग्रामीणों को भी दिख रहा है और अब हाफला घाटी के करीब 1 दर्जन से अधिक ग्रामीण भी पेड़ वाले गुरुजी की मुहिम में जुड़ गए हैं.