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महोबा जिले का चरखारी नगर, जिसे कभी ‘बुन्देली कश्मीर’ की उपाधि मिली थी, आज भी अपनी नैसर्गिक सुंदरता और हजारों साल पुराने वैभवशाली इतिहास की गवाही देता है.
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पर्वतमालाओं से घिरा चरखारी नगर अर्थात बुन्देली कश्मीर 108 श्रीकृष्ण मंदिरों, प्राचीन किलों, विशाल महलों और नयनाभिराम झीलों की संपदा लिये हुए है. चरखारी का पहला उल्लेख चंदेल नरेशों के ताम्रपत्रों में मिलता है, जो इसके समृद्ध अतीत की ओर इशारा करता है
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चरखारी का अतीत बहुत ही वैभवशाली रहा है. यहां का राजमहल चारों ओर नीलकमल के तालाबों से घिरा है और इसकी आंतरिक संरचना अद्भुत है. नगर में विजय सागर, रतन सागर, जय सागर, मलखान सागर, वंशी सागर और कोठी ताल सहित कई झीलें हैं जो इसकी प्राकृतिक भव्यता बढ़ाती हैं.
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108 श्रीकृष्ण मंदिरों के कारण यह क्षेत्र बृज जैसा आभास कराता है. सुदामापुरी का गोपाल बिहारी मंदिर, रायनपुर का गुमान बिहारी, मंगलगढ़ के प्राचीन मंदिर, बांके बिहारी मंदिर और माडव्य ऋषि की गुफा यहां के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक आकर्षण हैं. पास ही बुंदेला राजाओं का प्रसिद्ध आखेट स्थल—टोला तालाब— भी आज दर्शनीय स्थल के रूप में जाना जाता है.
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चरखारी का इतिहास 1765 में शुरू हुआ जब बुन्देलखण्ड राज्य के संस्थापक महाराज छत्रसाल के पुत्र महाराज जगतराज ने मंगल दुर्ग की नींव रखी. दो वर्षों में इसका निर्माण पूरा हुआ. इसके बाद चरखारी के राजाओं ने अपने-अपने शासनकाल में कई तालाबों और मंदिरों का निर्माण कराया.
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- महाराज रतन सिंह ने रतन सागर तालाब का निर्माण कराया - महाराज विजय बहादुर ने विजय सागर तालाब का निर्माण कराया - महाराज जय सिंह ने जय सागर नाम के तालाब का निर्माण कराया - महाराज गंगा सिंह ने गंगा सागर नामक तलााब का निर्माण कराया
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इतिहासकारों के मुताबिक 1930 में चरखारी स्टेट का अपना पावरहाउस था और यहां स्थित उच्च न्यायालय में पूरे बुंदेलखंड के मामलों की सुनवाई होती थी. अंग्रेजी शासन ने यहां के राजा को मृत्युदंड की सजा माफ करने का अधिकार भी दे रखा था.
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1911 में बने थिएटर हॉल में कभी देश के नामी कलाकार अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे. 1920 में यहां बालक और बालिका इंटर कॉलेज की स्थापना की गई, जहां बुंदेलखंड भर से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे. उस समय चरखारी शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करता था.
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1950 में चरखारी नगर पालिका के रिकॉर्ड के मुताबिक यहां की आबादी करीब 50 हजार थी. वह दौर ऐसा था जब यह नगर बड़े शहरों की श्रेणी में गिना जाता था, लेकिन आजादी के बाद लगातार उपेक्षा और राजनीतिक उदासीनता के चलते आज इसकी जनसंख्या घटकर लगभग 29 हजार पर आ गई है.
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आज जब देश तेजी से विकास कर रहा है, चरखारी अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के बीच खोई चमक वापस पाने की प्रतीक्षा में है. यहां के किले, मंदिर, झीलें और तालाब अब संरक्षण की मांग कर रहे हैं. अगर इन धरोहरों को संवारने की व्यापक योजना बनाई जाए, तो चरखारी न केवल बुंदेलखंड बल्कि देश के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में फिर से अपनी जगह बना सकता है.
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लेख में दी गई ये जानकारी सामान्य स्रोतों से इकट्ठा की गई है. इसकी प्रामाणिकता की जिम्मेदारी हमारी नहीं है.एआई के काल्पनिक चित्रण का जी यूपीयूके हूबहू समान होने का दावा या पुष्टि नहीं करता.