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Lakhimpur Kheri: दुनियाभर में सांपों की हजारों प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें कुछ बेहद जहरीली होती हैं तो कुछ अपनी दुर्लभता और अनोखी बनावट के कारण वैज्ञानिकों के लिए खास महत्व रखती हैं. ऐसी ही एक दुर्लभ प्रजाति है रेड कोरल खुकरी स्नेक, जिसे हिंदी में लाल मूंगा खुकरी सांप कहा जाता है. यह सांप बहुत कम दिखाई देता है, इसलिए जब भी यह किसी जंगल में नजर आता है तो वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों के बीच उत्सुकता बढ़ जाती है.
1936 में पहली बार दर्ज हुई थी मौजूदगी
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार लाल मूंगा खुकरी सांप का रिकॉर्ड सबसे पहले वर्ष 1936 में दुधवा क्षेत्र में दर्ज किया गया था. इसके बाद कई दशकों तक इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आया. करीब 80 साल बाद यह दुर्लभ प्रजाति फिर दुधवा टाइगर रिजर्व के दक्षिण सुनारीपुर रेंज में रेलवे ट्रैक के पास रेंगती हुई दिखाई दी. इस दुर्लभ दृश्य ने वन अधिकारियों और शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रजाति का दोबारा दिखना उस क्षेत्र की जैव विविधता और स्वस्थ वन पारिस्थितिकी का सकारात्मक संकेत है.
चमकदार लाल रंग बनाता है सबसे अलग
लाल मूंगा खुकरी सांप की सबसे बड़ी पहचान इसका पूरा शरीर है, जो एक समान चमकदार मूंगा लाल रंग का होता है. इसके दांत हल्के घुमावदार होते हैं, जो खुकरी की आकृति से मिलते-जुलते हैं. इसी विशेषता के कारण इसे खुकरी सांप कहा जाता है. इसकी अनोखी बनावट इसे अन्य सांपों से अलग पहचान देती है.
जहरीला नहीं, लेकिन बेहद दुर्लभ
भले ही इसका रंग लोगों को डराने वाला लगे, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि लाल मूंगा खुकरी सांप गैर विषैला होता है. यह इंसानों के लिए खतरा नहीं माना जाता. इसका मुख्य भोजन छिपकलियां, छोटे जीव और विभिन्न प्रकार के कीड़े-मकोड़े होते हैं. यह प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला का अहम हिस्सा है और जंगलों में जैव संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाता है.
रात में रहता है एक्टिव
विशेषज्ञों के मुताबिक यह सांप मुख्य रूप से निशाचर (Nocturnal) होता है. दिन के समय यह पत्तों, झाड़ियों या जमीन के भीतर सुरक्षित स्थानों पर आराम करता है, जबकि रात होते ही भोजन की तलाश में सक्रिय हो जाता है. इसकी यही आदत इसे आम लोगों की नजरों से दूर रखती है.
इन इलाकों में मिलता है यह दुर्लभ सांप
लाल मूंगा खुकरी सांप उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के वन क्षेत्रों, नेपाल, बिहार, पश्चिम बंगाल और हिमालयी क्षेत्रों के जंगलों में पाया जाता है. हालांकि इसकी संख्या बेहद सीमित मानी जाती है. यही वजह है कि इसे संरक्षित जीवों की श्रेणी में रखा गया है और इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता है.
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रजाति का दिखाई देना न केवल वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है, बल्कि यह संकेत भी है कि जंगलों में प्राकृतिक संतुलन अभी भी कायम है. ऐसे दुर्लभ जीवों का संरक्षण जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी है.