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क्रौच पर्वत पर विराजमान हैं भगवान कार्तिक, हर साल लगता है मेला, जुटती है भीड़

कार्तिक स्वामी मंदिर से प्रकृति को जो नयनाविराम दृष्टिगौचर होता है वह मनुष्य के मानस पटल पर छा जाता है. यहां से चैखम्बा व हिमालय की चमचमाती श्वेत चादर यहां के प्राकृतिक सौंदर्य पर चार चांद लगा देती है.

क्रौच पर्वत पर विराजमान हैं भगवान कार्तिक, हर साल लगता है मेला, जुटती है भीड़

जनपद: मुख्यालय से पोखरी-गोपेश्वर मोटरमार्ग पर रुद्रप्रयाग से 36 किमी की दूरी तय करने के बाद कनकचौरी नामक हिल स्टेशन तक बस या निजी वाहनों से पहुंचते हैं, जिसके बाद लगभग पौने चार किमी की हल्की चढाई चढने के बाद कार्तिकेय स्वामी तीर्थ में पहुंचा जाता है. दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को बाल्य रूप में छह तीर्थों में पूजा जाता है. मगर उत्तराखण्ड में भगवान कार्तिकेय का एकमात्र तीर्थ क्रौंच पर्वत पर विराजमान है. 

शिव पुराण के केदारखंड के कुमार खंड में वर्णित है कि एक बार गणेश और कार्तिकेय में पहले विवाह को लेकर मतभेद हो गया था. जब यह बात शिव-पार्वती तक पहुंची तो दोनों ने एक युक्ति निकाली की, जो सर्वप्रथम विश्व परिक्रमा पर पहले आएगा उसका विवाह कर दिया जाएगा. माता पिता की आज्ञा लेकर भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर में विश्व परिक्रमा के लिए चल दिए तथा गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा कर कहा कि माता-पिता को विश्व में सबसे बड़ा माना गया है इसलिए मैंने आप दोनों की परिक्रमा कर ली है. अब आप मेरा विवाह कर दीजिए. 

इसके बाद भगवान गणेश का विवाह विश्वजीत की पुत्रियों ऋद्धि व सिद्धी से कर दिया जाता है. जब भगवान कार्तिकेय विश्व परिक्रमा करके वापस लौट रहे होते हैं तो रास्ते में नारद द्वारा उनको बताया जाता है कि आपके माता-पिता ने भगवान गणेश की शादी आपसे पहले कर दी है. जिससे गुस्साये कार्तिकेय ने अपने शरीर का मांस काटकर माता-पिता को सौंपा और मात्र निर्वाण रूप (हडिडयों का ढांचा) लेकर क्रौंच पर्वत पर पहुंचकर तपस्या में लीन हो गए. 

कार्तिकेय स्वामी मंदिर से प्रकृति को जो नयनाविराम दृष्टिगौचर होता है वह मनुष्य के मानस पटल पर छा जाता है. यहां से चैखम्बा व हिमालय की चमचमाती श्वेत चादर यहां के प्राकृतिक सौंदर्य पर चार चांद लगा देती है. यहां से जनपद रुद्रप्रयाग, चमोली, पौडी की असंख्य पर्वत श्रृंखलाओं को जब सैलानी निहारता हैं तो उसकी आंखों में यह आभास होता है कि हम तीनों जनपदों का भ्रमण इसी तीर्थ से कर रहे हैं. इस तीर्थ में क्षेत्रीय जनता द्वारा लम्बे समय से जून माह में विश्व कल्याण व क्षेत्र की खुशहाली के लिए महायज्ञ तथा पुराण वाचनों का आयोजन किया जाता है. 

इस दौरान बेहड चटृानों के मध्य से निकलने वाली भव्य जल कलश यात्रा के दिन कई सैकड़ों श्रद्धालुओं का हुजूम यहां उमड़कर पुण्य अर्जित करते हैं. कार्तिकेय माह में आने वाली वैकुंठ चतुर्दशी व कार्तिकेय पूर्णिमा पर भी यहां पर दो दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है. यह तीर्थ पुत्र प्राप्ति के लिए भी उत्तम माना गया है. इसलिए जो मानव यहां सच्ची श्रद्धा लेकर इस तीर्थ में आता है उसकी हर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. 

कार्तिकेय स्वामी तीर्थ से यदि किसी को चेखम्बा व हिमालय के दर्शन होते हैं तो इसके लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय उत्तम माना गया है. जबकि अभिष्ट फल देने के लिए कार्तिकेय माह की पूजा विशेष मानी गई हैं क्योंकि कार्तिकेय स्वामी 33 करोड़ देवी-देवताओं के सेनापति होने के कारण कार्तिकेय माह में 33 करोड़ देवी-देवता इनकी पूजा करने के लिए क्रौंच पर्वत पर विराजमान रहते हैं.