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Zee UP-UttarakhandPhotosकहां है एशिया की सबसे पुरानी प्रिंटिंग प्रेस? लंदन तक खोला ऑफिस, घर-घर पहुंचाया था रामचरित मानस
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कहां है एशिया की सबसे पुरानी प्रिंटिंग प्रेस? लंदन तक खोला ऑफिस, घर-घर पहुंचाया था रामचरित मानस

आज सोशल मीडिया का जमाना है. वायरल होने में देर नहीं लगती. इंटरनेट की दुनिया ने सबकुछ आसान कर दिया है.

भारत का पहला स्‍वदेशी प्रिंटिंग प्रेस?

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भारत का पहला स्‍वदेशी प्रिंटिंग प्रेस?

भारत में प्रिंटिंग का इतिहास 1556 में शुरू होता है. हालांकि, इसके 200 साल बाद तक भारत में क‍िसी भारतीय ने प्रिंटिंग प्रेस की दुनिया में कदम नहीं रख पाया था. 

 

प्रिंटिंग प्रेस का जनक

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प्रिंटिंग प्रेस का जनक

1858 में लखनऊ में नवल किशोर नाम से एक प्रिंटिंग प्रेस खोला गया. इसके जनक मुंशी नवल किशोर थे. नवल किशोर ने प्रिंटिंग की दुनिया में ऐसी छाप छोड़ी कि उन्‍हें भारतीय प्रिंटिंग का 'प्रिंस' कहा जाने लगा. 

एशिया का सबसे पुराना छापाखाना?

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एशिया का सबसे पुराना छापाखाना?

मुंशी नवल किशोर ने ही लखनऊ में एशिया का सबसे पुराना छापाखाना स्‍थापित किया. बता दें कि मुंशी नवल किशोर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के रहने वाले थे. वह अमीर भार्गव जमींदार परिवार से आते थे. 

मुगलों के यहां नौकरी की

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मुगलों के यहां नौकरी की

नवल किशोर के परिवार में उनके पुरखों ने मुगलों के यहां अच्छी हैसियत में नौकरियां की थीं. परिवार में संस्कृत पढ़ने लिखने की परंपरा थी. युवा नवल किशोर ने भी इसको अपनाया. इतना ही नहीं उन्‍होंने फारसी भी सीखी. 

आगरा कॉलेज में दाखिला लिया

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आगरा कॉलेज में दाखिला लिया

इसके बाद नवल किशोर ने 1952 में आगरा कॉलेज में दाखिला लिया. फिर 1954 में वह लाहौर चले गए. वहां उन्होंने कोह-ए-नूर प्रेस में नौकरी कर ली. तभी पंजाब का पहला उर्दू अखबार कोह-ए-नूर छापता था. एक साल उन्होंने यहां अप्रेंटिसशिप की. 

लखनऊ में खोला छापाखाना

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लखनऊ में खोला छापाखाना

यहां से लौटने के बाद नवल किशोर ने खुद का अखबार साफिर ए आगरा शुरू किया. कुछ ही दिन बाद लाहौर से वापस आगरा आ गए. इसके बाद नवल किशोर ने अंग्रेजों का दिल जीता. साल 1958 में वह लखनऊ आ गए. 

उत्तर भारत का पहला उर्दू अखबार

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उत्तर भारत का पहला उर्दू अखबार

उसी साल नवंबर महीने में उन्होंने ब्रिटिश अफसरों की मंजूरी से एक प्रेस लगाई. उत्तर भारत का पहला उर्दू अखबार अवध अखबार निकालना शुरू किया. जल्दी ही अंग्रेज प्रशासन उन्हें प्रिंटिंग करने का काम बड़े पैमाने पर देने लगा. 

5 हजार से ज्यादा किताबें टाइटल छापे

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5 हजार से ज्यादा किताबें टाइटल छापे

इस प्रेस ने सबसे पहले ब्लैक एंड व्हाइट छपाई की. फिर धीरे धीरे कलर प्रिंटिंग भी शुरू कर दी. माना जाता है कि नवल प्रिंटिंग प्रेस ने 5000 से अधिक किताबों के टाइटल छापे. इसके बाद एक के बाद कई किताबें छापीं. 

1.5 रुपये में छाप दिया कुरान

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1.5 रुपये में छाप दिया कुरान

इसी दौरान उन्होंने मिर्जा गालिब से संपर्क साधा. उनके प्रकाशन बने. 1869 में उनके प्रेस ने पहला उर्दू का नॉवेल छापा, जो नाजिर अहमद का लिखा था. इसी दौरान उन्होंने फैसला किया कि वो कुरान का संस्करण बहुत सस्ते दामों में छापेंगे. इसका दाम तब डेढ़ रुपये रखा गया. ये खूब बिकी. 

रामचरित मानस की 50 हजार प्रतियां

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रामचरित मानस की 50 हजार प्रतियां

उन्‍होंने तुलसीदास की रामचरित मानस भी छापी, जो 1873 में 50,000 प्रतियां बिकीं. सुरदास की सूर सागर भी उनके प्रेस से छपी. 1880 में उनके प्रेस ने तुलसीदास का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया. 

 

घर घर पहुंचाया रामचरित मानस

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घर घर पहुंचाया रामचरित मानस

रामचरित मानस को भी सबसे पहले छापने का श्रेय इसी नवल किशोर प्रेस को जाता है. बहुत सस्ती कीमत पर पहली बार रामचरित मानस और कुरान को छापकर तब घर-घर में पहुंचाया. लंदन में भी प्रिंटिंग प्रेस का दफ्तर खोला. 

डिस्क्लेमर

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डिस्क्लेमर

लेख में दी गई ये जानकारी सामान्य स्रोतों से इकट्ठा की गई है. इसकी प्रामाणिकता की जिम्मेदारी हमारी नहीं है. एआई के काल्पनिक चित्रण का जी यूपीयूके हूबहू समान होने का दावा या पुष्टि नहीं करता.