उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 140वीं जयंती पर जन्मस्थली में पसरा सन्नाटा, जानिए वजह

हर साल मुंशी प्रेमचंद्र की जयंती के अवसर पर तीन दिवसीय लमही महोत्सव का आयोजन हुआ करता था. लेकिन कोरोना के चलते इस कार्यक्रम में रोक लगा दी गई है. जिसके बाद उनकी जन्म स्थली लमही में सन्नाटा छाया हुआ है.

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 140वीं जयंती पर जन्मस्थली में पसरा सन्नाटा, जानिए वजह

वाराणसी: उपन्यास के सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद की आज 14वीं जयंती है. हर साल मुंशी प्रेमचंद्र की जयंती के अवसर पर तीन दिवसीय लमही महोत्सव का आयोजन हुआ करता था. लेकिन कोरोना के चलते इस कार्यक्रम में रोक लगा दी गई है. जिसके बाद उनकी जन्म स्थली लमही में सन्नाटा छाया हुआ है.

इस महोत्सव में मुंशी प्रेम चन्द्र द्वारा लिखित उपन्यास पर कलाकारों द्वारा मंचन किया जाता था. साथ मंचन के माध्यम से प्रेम चन्द्र की उपन्यास की जीवन्तता को लोगों को बताने का प्रयास किया जाता था. 

उपन्यास सम्राट के उपन्यास ईदगाह,दो बैलों की कथा, गोदान, नामक का दरोगा, गोदान, रंगभूमि, कर्मभूमि जैसे उपन्यास आज भी समाज मे प्रासंगिक हैं. बाजारीकरण  के आज  के  मेले  में  जहां वकील और सिपाही खिलौने की तरह न सिर्फ खरीदे और बेचे जा रहे हैं, बल्कि जरा सी चोट पर टूट भी रहे हैं. ऐसे दौर में भी  "हामिद का चिमटा''  शेर से लड़ने का माद्दा लिए हुए आज भी समाज के सामने सवाल  बन कर खड़ा है. आज भी उनके ये पात्र लोगों के लिए सिर्फ मनोरंजन के साधन बन गए हैं. 

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प्रगतिशील लेखक जब ये कहते कि प्रेमचंद हमारे लिए आज भी प्रासंगिक हैं. लेकिन अगर प्रेमचंद आज प्रासंगिक हैं तो निश्चित रूप से समाज में कहीं न कहीं होरी, बूढी, काकी, हामिद, हल्कू, घीसू, माधव, हीरा-मोती जिंदा हैं.

21वीं सदी के इस सभ्य समाज में प्रेमचंद प्रासंगिक न होते तो वो भी खुश होते कि जिस समाज की उन्होंने परिकल्पना की थी वो आज पूरी हो गई. अब कोई भी उनके पात्रों की तरह हताश, महाजनों के कर्ज के चंगुल में जकड़ा और निराश नहीं है.

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