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उत्तर प्रदेश: गैर जमानती मुकदमों में भी ले सकेंगे अग्रिम जमानत

यूपी में चार दशक पहले खत्म की गई थी अग्रिम जमानत प्रक्रिया पिछले साल 30 अगस्त को विधानमंडल में पास हुआ था. 'यूपी दंड संहिता संशोधन विधेयक', राज्यपाल के अनुमोदन के बाद राष्ट्रपति भवन भेजा गया था. राष्ट्रपति की अनुमति के बाद यूपी में अग्रिम जमानत के नियम लागू हो गए हैं. 

उत्तर प्रदेश: गैर जमानती मुकदमों में भी ले सकेंगे अग्रिम जमानत
यूपी में अग्रिम जमानत के अधिकार की मांग लंबे समय से हो रही थी.

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी बड़ी खबर आई है. यूपी में गैर-जमानती अपराधों में फिर से अग्रिम जमानत की व्यवस्था शुरू कर दी गई है. अब इस राज्य में भी गैर-जमानती अपराधों में गिरफ्तारी से पहले मिल अग्रिम जमानत ली जा सकेगी. यह व्यवस्था 6 जून 2019 से पूरे प्रदेश में प्रभावी होगी. यूपी में चार दशक पहले खत्म की गई थी अग्रिम जमानत प्रक्रिया पिछले साल 30 अगस्त को विधानमंडल में पास हुआ था. 'यूपी दंड संहिता संशोधन विधेयक', राज्यपाल के अनुमोदन के बाद राष्ट्रपति भवन भेजा गया था. राष्ट्रपति की अनुमति के बाद यूपी में अग्रिम जमानत के नियम लागू हो गए हैं. 

ये होंगी शर्तें-: 
- अग्रिम जमानत की सुनवाई के दौरान अभियुक्त का उपस्थित रहना जरूरी नहीं.

- जिस दौरान पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा अभियुक्त को पुलिस अधिकारी या विवेचक के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा.

-आवेदक मामले से जुड़े गवाहों व अन्य व्यक्तियों को धमका नहीं सकेंगे, न ही किसी तरह का आश्वासन दे सकेंगे.

- SC/ST एक्ट में नहीं मिलेगी अग्रिम जमानत.

इन मुकदमों में नहीं मिलेगी अग्रिम जमानत
अग्रिम जमानत की व्यवस्था एससीएसटी एक्ट समेत कई गंभीर अपराध के मामलों में लागू नहीं होगी. आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामलों (अनलॉफुल एक्टिविटी एक्ट 1967), आफिशियल एक्ट, नारकोटिक्स एक्ट, गैंगस्टर एक्ट व मौत की सजा से जुड़े मुकदमों में अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी.

30 दिन में करना होगा निस्तारण
विधेयक के तहत अग्रिम जमानत के लिए जो भी आवेदन आएंगे उनका आने की तिथि से 30 दिन के अंदर निस्तारण करना होगा. कोर्ट को अंतिम सुनवाई से सात दिन पहले लोक अभियोजक को नोटिस भेजना भी अनिवार्य होगा. अग्रिम जमानत से जुड़े मामलों में कोर्ट अभियोग की प्रकृति और गंभीरता, आवेदक के इतिहास, उसकी न्याय से भागने की प्रवृत्ति और आवेदक को अपमानित करने के उद्देश्य से लगाए गए आरोप पर विचार कर उसके आधार पर फैसला ले सकती है.

यहां आपको बता दें कि 1976 में यूपी में क़ानून में अग्रिम ज़मानत की व्यवस्था ख़त्म कर दी गई थी, जिससे हर मामले में आरोपी को गिरफ़्तारी के बाद या फिर अदालत में सरेंडर के बाद ही ज़मानत की अर्ज़ी लगाने का अधिकार था, फ़रार रहते हुए ज़मानत नहीं मिल पाती थी.