उत्तराखंड: नीति माणा के लोगों ने अपनी संस्कृति को बचाने का उठाया बीड़ा, चल रहे खास अभियान

नीती माणा के लोग अपने बच्चों को खासतौर से पांडव नृत्य जैसे पारंपरिक डांस सिखा रहे हैं.

उत्तराखंड: नीति माणा के लोगों ने अपनी संस्कृति को बचाने का उठाया बीड़ा, चल रहे खास अभियान
देहरादून में भी नीती माणा के लोग एकजुट होकर अपनी बोली, भाषा, संस्कृति को बचाने के लिए अभियान चला रहे हैं.

देहरादून: उत्तराखंड के भारत चीन बॉर्डर के पास नीति माणा घाटी के लोग अब अपनी संस्कृति को बचाने का अभियान चला रहे हैं. नीति माणा घाटी के लोग तोलछा समाज से ताल्लुक रखते हैं. और एक खास बोली, भाषा, संस्कृति को खुद में सदियों से समेट हुए हैं. मगर बदलते दौर में उनकी आने वाली पीढ़ी अपनी संस्कृति से अछूती ना रह जाए, इसलिए वे एक खास अभियान भी चला रहे हैं.

कहते हैं किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, बोली, भाषा और उसके पहनावे से होती है. यही वजह है कि उत्तराखंड के सबसे सुदूर क्षेत्र के तोलछा समाज के लोग अपनी संस्कृति को जिंदा रखने के लिए बच्चों को पारंपरिक वेशभूषा पहना रहे हैं. और उन्हें इसके लिए एक मंच भी दे रहे हैं.

दरअसल, नौकरी की तलाश में नीती माणा के सुदूर क्षेत्रों के लोग अब शहरों में बस गए हैं. मगर, उनकी संस्कृति लुप्त ना हो जाए इसलिए वो इसे बचाने के लिए जद्दोजहद भी कर रहे हैं. नीती माणा के लोग अपने बच्चों को खासतौर से पांडव नृत्य जैसे पारंपरिक डांस सिखा रहे हैं.

वहीं, इसके लिए उन्हें एक मंच भी दे रहे हैं. लोगों का कहना है कि कुछ परंपराएं गांव में जिंदा हैं, जो उनकी अपनी पहचान है. उनकी पहचान ना मिटे इसलिए वो अपने बच्चों को परंपराओं की बारीकियां बता रहे हैं.

उधर, देहरादून में भी नीती माणा के लोग एकजुट होकर अपनी बोली, भाषा, संस्कृति को बचाने के लिए अभियान चला रहे हैं. आज के आधुनिक युग में जहां सामाजिक ताना-बाना टूट रहा है, तो वहीं अब लोग इस बात की चिंता कर रहे हैं कि कैसे शहरों में रखकर अपनी संस्कृति को बचाया जा सके.

उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत का कहना है कि नीती माणा के आदिवासी क्षेत्र के लोगों की संस्कृति को जिंदा रखने के लिए एक रिसर्च सेंटर भी खोला गया है. लोगों का कहना है कि वे अपनी संस्कृति को अपने बच्चों को सिखाना चाहते हैं ताकि उनकी संस्कृति बची रहे.

गौरतलब है कि आज के आधुनिक युग में जिस तरह से इंसान रोजी-रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहा है और एक शहर से दूसरे शहर में भाग रहा है. ऐसे में थोड़ा वक्त ही सही मगर अपनी संस्कृति को बचाने के लिए कोशिश होनी चाहिए. यकीनन ये सराहनीय कदम है. फिलहाल इस तरह से अगर प्रयास होता रहा तो परंपराएं भी जिंदा रहेंगी और गांव का वजूद भी आबाद रहेगा.